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जो बंद होने वाला था Parle-G, कोरोना के चलते उसकी हुई 82 साल में रिकॉर्ड बिक्री

नई दिल्ली- दो महीने से ज्यादा चले लॉकडाउन की वजह से देश की कई कंपनियों की हालत पतली हो गई है। लेकिन, 82 साल से देश में सामान्य लोगों के लिए सबसे पसंदीदा बिस्किट पारले-जी ने इस दौरान बिक्री का अपना सारा रिकॉर्ड तोड़ दिया है। लॉकडाउन के दौरान पारले-जी ब्रांड की बिस्किट की सबसे ज्यादा बिक्री हुई है। लोगों ने घरों में बंद रहकर भी इसे दबाकर खाया है और कई लोगों ने इसी के सहारे पूरा लॉकडाउन गुजार दिया है। जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए लॉकडाउन के वक्त में सरकारों ने भी पारले-जी की जमकर खरीदारी की है तो स्वयं सेवी संस्थाओं ने भी इसे लोगों के बीच खूब बांटा है।

पारले-जी की बिक्री में 82 साल का रिकॉर्ड टूटा

पारले-जी की बिक्री में 82 साल का रिकॉर्ड टूटा

पारले-जी मैनेजमेंट ने यह बताने से तो इनकार कर दिया है कि मार्च-अप्रैल और मई महीने में इस ब्रांड की कितनी बिस्किट बिकी हैं, लेकिन उन्होंने ये जरूर माना है कि कंपनी के लिए लॉकडाउन का महीना 1932 में इसका प्रोडक्शन शुरू होने के बाद से सबसे अच्छा साबित हुआ है। पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह ने कहा है कि 'ओवरऑल मार्केट शेयर में हमारा करीब 5% इजाफा हुआ है.....और इसका 80-90% इजाफा पारले-जी की बिक्री के चलते हुआ है। यह अभूतपूर्व है।' इसकी वजह ये रही है कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान देश में कम कीमत वाली बिस्किट लोगों की पहली पंसद बन गए, क्योंकि यह रेडिमेड खाने की चीज के तौर पर आसानी से उपलब्ध रहा और लोगों ने इसका खूब स्टॉक करके रख लिया था।

लॉकडाउन में बहुत ही आसान खाना बन गया था

लॉकडाउन में बहुत ही आसान खाना बन गया था

पारले-जी बिस्किट की इतनी बिक्री के बारे में एफएमसीजी प्लेयर्स पर स्टडी करने वाले क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर अनुज सेठी का कहना है कि, 'लोग हर चीजें खरीद रहे थे, जो मिल रहे थे, चाहे वो प्रीमियम हों या इकोनॉमी। .......पिछले 18 से 24 महीनों में कुछ कंपनियां अपना वितरण बढ़ाने पर फोकस कर रही थीं, खासकर ग्रामीण इलाकों में; और महामारी के दौरान वही उनके लिए फायदे का सौदा साबित हो गया।' सबसे बड़ी बात ये है कि पारले कंपनी ने 7 दिन के अंदर ही अपने डिस्ट्रिब्यूशन चैनल को रिस्टॉक कर लिया, ताकि छोटी से छोटी दुकानों पर भी उसकी कमी न आने पाए। मयंक शाह के मुताबिक, 'लॉकडाउन के दौरान बहुत लोगों के लिए पारले-जी बड़ा ही आसान खाना बन गया; और कई सारे लोगों के लिए तो यही उनका भोजन ही बन गया था। यह आम जनों की बिस्किट है, जो लोग ब्रेड नहीं खरीद सकते वो पारले-जी खरीदते हैं।'

राज्य सरकारें भी खरीद रही थीं पारले-जी

राज्य सरकारें भी खरीद रही थीं पारले-जी

लॉकडाउन के दौरान पारले-जी के खरीदार सिर्फ सामान्य लोग ही नहीं थे, कई राज्य सरकारें और गैर-सरकारी संस्थाएं भी इसकी बहुत बड़ी खरीद बन गई थीं। पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह के अनुसार, 'इस बिस्किट के लिए हमारे पास कई राज्य सरकारों से मांगें आ रही थीं, वे हमसे लगातार संपर्क में थे और स्टॉक की स्थिति पूछते रहते थे। कई सारे एनजीओ ने बहुत बड़ी मात्रा में हमसे बिस्किट खरीदा। हम भाग्यशाली थे कि हमने 25 मार्च से ही इसका उत्पादन फिर से शुरू कर दिया था।

बिस्किट की बिक्री में 50% से ज्यादा की हिस्सेदारी

बिस्किट की बिक्री में 50% से ज्यादा की हिस्सेदारी

पारले प्रोडक्ट्स के पास इस समय देशभर में 130 फैक्ट्रियां हैं। पारले-जी ब्रांड 100 रुपये प्रति किलो से कम वाली श्रेणी में आते हैं, लेकिन उसके पास इस उद्योग का एक-तिहाई राजस्व आता है। जबकि, बिक्री में इसकी हिस्सेदारी तमाम ब्रांड की तुलना में 50 फीसदी से ज्यादा है। बता दें कि कोरोना से पहले के महीनों में आर्थिक सुस्ती के चलते पारले-जी फैक्ट्री के बंद होने की खबरें मीडिया में आईं। सोशल मीडिया पर भी बचपन के सबसे पसंदीदा बिस्किट को लेकर लोगों ने अपनी यादें शेयर करना शुरू कर दिया था। वैसे पारले-जी प्रबंधन ने बाद में इस तरह की आशंकाओं को खारिज कर दिया था।

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