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पंडी राम मंडावी की 'बांसुरी मैन से पद्मश्री' तक की पूरी कहानी, कैंब्रिज म्यूजियम में क्‍यों होती इनकी चर्चा?

Pandi Ram Mandavi Padma Shri: मंगलवार, 27 मई को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मु ने 71 हस्तियों को पद्म श्री से सम्मानित किया। इस दौरान जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खिंचा वो थे पंडी राम मंडावी। हाफ नीली लुंगी, सफेद कमीज और सिर पर पारंपरिक पगड़ी यह पहनावा किसी फेमस ब्रांड का नहीं, बल्कि आदिवासी मिट्टी से जुड़ी अस्मिता का प्रतीक था।

उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं। लोग न केवल उनकी कला के, बल्कि उनकी सादगी के भी मुरीद हो गए। आईए जानते हैं कैसे बस्तर के बांस पर बुनी बांसुरी की विरासत को पद्म श्री पंडी राम मंडावी ने दिलाया अंतरराष्ट्रीय मंच...

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छत्तीसगढ़ के घने जंगलों और गूंजते लोकगीतों के बीच पले-बढ़े एक साधारण से आदिवासी कलाकार ने अपनी सादगी, लगन और विलक्षण प्रतिभा से वो कर दिखाया जिसे दुनिया सलाम कर रही है। वे हैं पंडी राम मंडावी, बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा, जिन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनकी कला में न केवल सुर हैं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और आदिवासी अस्मिता की गूंज भी है।

Pandi Ram Mandavi ने 'सुलुर' के सुरों से सहेजी एक विरासत

पंडी राम मंडावी की सबसे बड़ी पहचान है बस्तर की पारंपरिक बांसुरी, जिसे स्थानीय भाषा में 'सुलुर' कहा जाता है। यह साधारण सी दिखने वाली बांसुरी दरअसल बस्तर की धड़कन है। पंडी जी इसे महज एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि संस्कृति का संवाहक मानते हैं। उनकी बनाई बांसुरियां भारत ही नहीं, विदेशों में भी सराही गई हैं।

पंडी मंडावी ने महज 12 साल की उम्र में इस अद्भुत कला की शुरुआत की थी। उनके जीवन में गरीबी थी, संसाधनों की कमी थी, लेकिन उनके पास था पुरखों की विरासत, जिज्ञासा और हौसला जिसे उन्होंने अपना सपना बनाया। उन्होंने अपने पूर्वजों से चित्रकारी, मूर्तिकला और बांसुरी निर्माण की तकनीक सीखी और फिर पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि लोककला भी वैश्विक मंचों पर चमक सकती है।

बस्तर की इस कला को दिलाया वैश्विक मंच

पंडी राम मंडावी अब तक 8 से अधिक देशों में भारत की पारंपरिक लोककला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने लकड़ी के पैनलों पर उभरी कलाकृतियां, मूर्तियां और परंपरागत शिल्पकृतियों के माध्यम से बस्तर की आत्मा को उकेरा है। वह सिर्फ कलाकार नहीं, संस्कृति के संरक्षक हैं, जिन्होंने अपने काम के जरिए एक खोती हुई विरासत को फिर से जिंदा कर दिया है।

Pandi Ram Mandavi गढ़ रहे कला का नया भविष्य

पंडी राम मंडावी केवल खुद तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने अपने अनुभव और इस आदिवासी कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का जिम्मा भी उठाया। वे विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित करते हैं, जिनमें युवाओं को पारंपरिक कला और शिल्प सिखाई जाती है। उनके मार्गदर्शन में कई नए कारीगरों ने अपनी पहचान बनाई है और बस्तर की कला को आगे बढ़ाया है।

Padma Shri Ram Mandavi को 68 की उम्र में मिला 5 दशक की साधना का फल

68 वर्षीय पंडी राम मंडावी पिछले 50 वर्षों से बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर को न केवल जीवित रखे हुए हैं, बल्कि उसे पहचान भी दिला रहे हैं। उनकी मेहनत, समर्पण और जमीनी जुड़ाव ही है जिसने उन्हें आज देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक तक पहुंचाया है।

पंडी राम मंडावी की कहानी उन हजारों कलाकारों की प्रेरणा है जो अपने गाँव, अपनी माटी और अपने हुनर से जुड़े रहते हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि संस्कृति की जड़ें जितनी गहरी हों, उड़ान उतनी ऊंची होती है। पंडी जी की बांसुरी में केवल सुर नहीं, संघर्ष, श्रद्धा और स्वाभिमान भी बजता है।

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