परदेसी एनआरआई भेजते देश में बड़ी रकम
नई दिल्ली। एक दौर में कहा जाता था कि एक बार देश छोड़ने के बाद भारतीय नागरिक यानी एनआरआई अपने वतन को भूल जाते हैं। अब इस आरोप को प्रवासी भारतीय झुठला रहे हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक भारत को 2014 में इस स्रोत से 71 अरब डॉलर की रकम मिलेगी।

यानी कि विदेशों में बसे भारतीय मोटा पैसा अपने वतन भेज रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत विकासशील देशों में इस साल पहले स्थान पर रहेगा। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक भारत को 2014 में इस स्रोत से 71 अरब डॉलर की रकम मिलेगी।
रिपोर्ट के अनुसार इस साल विकास शील देशों को प्रवासियों से कुल मिलाकर 435 अरब डॉलर मिलने की संभावना है जो कि 2013 के मुकाबले पांच फीसदी अधिक है।
विश्व बैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट ‘उत्प्रवासन और विकास का सार' में कहा है कि दुनिया में सबसे अधिक उत्प्रवासी भारत के हैं और इनकी संख्या एक करोड 40 लाख है।
71 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा
भारत को इनसे इस साल 71 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा मिलने का अनुमान है और इस मामले में देश सबसे ऊपर रहेगा। जानकारों ने बताया कि भारत के खाड़ी के देशों में बसे लोग हर साल अपने बहुत मोटी राशि भेजते हैं।
हालांकि इन देशों के भारतीय अमेरिका या विकसित देशों में बसे भारतीयों की तुलना में कम कमाते हैं।
विश्व बैंक समूह के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने कहा, विकासशील देशों को अपने परदेसी नागरिकों से मिला धन इस साल पांच फीसदी बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, मिस्र, हैती, होंडूरास और नेपाल जैसे देशों के कुल आयात खर्च का एक बड़ा हिस्सा परदेशियों द्वारा भेजे गए धन से निपटाया जाता है। उन्होंने कहा कि प्रवासियों से प्राप्त कमाई के मामले में भारत और चीन 71 और 64 अरब डॉलर की अनुमानित प्राप्ति के साथ सबसे ऊपर हैं।
फिलिपींस को परदेस में रह रहे अपने लोगों से इस साल 28 अरब डालर, मैक्सिको को 24 अरब डॉलर, नाइजीरिया 21 अरब डॉलर, मिस्र को 18 अरब डॉलर, पाकिसतान को 17 अरब डॉलर, बांग्लादेश को 15 अरब डॉलर, वियतनाम को 11 अरब डॉलर और उक्रेन को 9 अरब डॉलर की रकम मिलने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2013 के मुकाबले इस साल वृद्धि दर काफी तेज है। एशिया और लातिन अमेरिकी देशों को इस स्रोत से अपेक्षाकृत अधिक धन मिलने से यह संभव हुआ है।
जानकारों का कहना है कि पहली पीढ़ी के एनआर आ भारत में मोटा पैसा भेजते रहते हैं। पर उनके बाद की पीढ़ी का अपने वतन को लेकर लगाव कम होता रहता है।












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