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दिल्ली में हुई भाजपा की फजीहत से नीतीश को मिली ताकत, 20 साल करेंगे राज?

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दिल्ली में हुई भाजपा की फजीहत से नीतीश को मिली ताकत

नई दिल्ली। क्या दिल्ली के सियासी भूकंप का असर बिहार में भी होगा ? दिल्ली की हार ने भाजपा को और कमजोर किया है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मंत्रियों और सांसदों की फौज अकेले केजरवाल का सामना नहीं कर पायी। इस निर्बलता से भाजपा की अपने सहयोगियों पर निर्भरता बढ़ गयी है। करीब आठ महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होना है। नीतीश और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सरकार को बरकरार रखने की है। क्या नीतीश लगातार चौथा चुनाव जीत पाएंगे ? यानी उनको 20 साल राज करने का जनादेश मिलेगा ? भाजपा उनकी कितनी मददगार हो पाएगी ? क्या नीतीश के दवाब में भाजपा सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर खामोश रहेगी?

दिल्ली से अलग होगा बिहार का चुनाव

दिल्ली से अलग होगा बिहार का चुनाव

आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि दिल्ली में भाजपा और नीतीश की मिट्टीपलीद हो गयी। लेकिन यह भी सच है कि दिल्ली और बिहार की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। दिल्ली के शहरी वोटरों और बिहार के ग्रामीण वोटरों के सोचने-समझने के तरीके में बहुत फर्क है। दिल्ली में जाति-धर्म का मुद्दा किसी काम का नहीं। लेकिन बिहार में सामाजिक समीकरण से ही जीत हार तय होती है। दिल्ली में न तो नीतीश का जादू चला न लालू का। अगड़े, पिछड़े और मुसलमानों ने थोक भाव में केजरीवाल को वोट दिये। लेकिन जब बिहार में चुनाव होगा तब परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। टिकट वितरण से लेकर वोट तक, सोशल इंजीनियरिंग से तय होगा। जो सामाजिक संतुलन को साधने में कामयाब होगा उसकी ही गोटी लाल होगी। केजरीवाल ने दिल्ली में जो काम किये उसका भाजपा के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन बिहार में वह नीतीश के नाम और काम पर चुनाव लड़ेगी। विधानसभा चुनाव में नीतीश भाजपा के लिए संबल होंगे।

नीतीश के मुताबिक चलना होगा भाजपा को

नीतीश के मुताबिक चलना होगा भाजपा को

नीतीश बेशक बिहार में सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं। उनका कोई विकल्प नहीं। लेकिन वे अकेले चुनाव नहीं जीत सकते। उन्हें भी जीत के लिए सहयोगी की जरूरत है। अगर भाजपा नीतीश पर निर्भर है तो नीतीश को भी भाजपा की दरकार है। बिहार की सामाजिक संरचना तीन ध्रुवों में बंट गयी है। लालू, नीतीश और भाजपा। इनमें दो जिधर रहेंगे शक्ति का संतुलन उसकी तरफ ही झुका रहेगा। रामविलास भी एक असरदार फैक्टर हैं। नीतीश, भाजपा और रामविलास एक साथ हैं। इस लिहाज से नीतीश का पलड़ा भारी दिख रहा है। दिल्ली चुनाव का बिहार में सिर्फ इतना असर पड़ेगा कि भाजपा नीतीश के बताये रास्ते पर चलने को मजबूर रहेगी। सीट शेयरिंग के समय नीतीश की चलेगी और भाजपा को मन मार कर कबूल करना होगा। हालांकि नीतीश ने अभी तक भाजपा को खुश रखने की कोशिश की है। भाजपा की खुशी के लिए नीतीश ने अपने सबसे प्रिय सहयोगी प्रशांत किशोर को एक झटके में पार्टी से निकाल बाहर कर दिया। लेकिन मौका देख नीतीश भाजपा की कमजोर नस को दबाने से चूकेंगे नहीं। वे अपनी जीत की राह में भाजपा के किसी एजेंडा को रोड़ा नहीं बनने देंगे।

नीतीश के मुकाबले राजद के पास कोई नेता नहीं

नीतीश के मुकाबले राजद के पास कोई नेता नहीं

जैसे केजरीवाल के सामने भाजपा विकल्पहीन थी उसी तरह बिहार में राजद के पास नीतीश की जोड़ का कोई नेता नहीं। राजद तीस साल के तेजस्वी को चुनावी चेहरा बता तो रहा है लेकिन अनुभवी नीतीश से उनका कोई मुकाबला नहीं। दोनों की राजनीतिक योग्यता और परिपक्वता में कोई तुलना ही नहीं है। तेजस्वी का सारा दारोमदार लालू के नाम पर टिका है। राजनीतिक परिडृश्य से गायब लालू अब पहले की तरह असरदार नहीं रहे। 2015 के चुनाव में तो अगड़े-पिछड़े के ध्रुवीकरण ने राजद की नैया पार लगा दी थी लेकिन अब स्थिति बदल गय़ी है। नीतीश और भाजपा के मेल ने एक नया सामाजिक समीकरण गढ़ा है जिसकी काट अभी तक राजद नहीं खोज पाया है। नीतीश के साथ अतिपिछड़े और अल्पसंख्यक वोटर मजबूती से खड़े हैं। भाजपा का अपना परम्परागत वोट बैंक है। इसमें अगड़े-पिछड़े और दलित सभी शामिल हैं।

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नीतीश की ताकत

नीतीश की ताकत

बिहार में सबसे अधिक वोट अति पिछड़े समाज के पास है। पिछले कुछ समय से नीतीश इस समाज को अपने पाले में करने के लिए लगातार कोशिश करते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश ने अति पिछड़ा कार्ड खेल कर सभी दलों को चौंका दिया था। अति पिछड़ा समाज से जदयू के छह सांसद लोकसभा में पहुंचे। यह इस समाज की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक हिस्सेदारी है। नीतीश ने ऐसा कर के पिछड़े समाज का दिल जीत लिया। राजद की तकात माय समीकरण रहा है। लेकिन राजनीति के बदलते दौर में यह समीकरण अब असरदार नहीं रहा। राजद को बहुत देर से अहसास हुआ कि उसे अब अपना चेहरा बदलना चाहिए। राजद में सभी वर्गों के लिए दरवाजे खोल तो दिये गये हैं लेकिन आशंकाएं बरकार हैं। नीतीश कुमार कई मोर्चों पर भले फेल हुए हों लेकिन उन्होंने सामाजिक शांति एक हद ताक कायम रखी है। लालू राज की मनमानी को याद कर तटस्थ लोग भी नीतीश की तरफ झुके चले जा रहे हैं। जदयू के लोग अभी से यह प्रचारित कर हैं कि जनता को कैसा मुख्यमंत्री चाहिए ? एक पढ़ा लिखा इंजीनियर या नौंवी फेल ?

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English summary
Nitish gets strength due to BJP's defeat in Delhi, will rule for 20 years in Bihar?
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