Death Penalty: फांसी की सजा को लटकाने में अब सफल नहीं हो पाएंगे अपराधी, जानिए क्यों?
बेंगलुरू। 7 वर्ष 4 माह और 3 दिन बाद अंततः निर्भया के चारो दोषी फांसी के फंदे पर लटका दिए। अहले सुबह 5:30 बजे तिहाड़ जेल में फांसी पर चढ़ाए गए चारों अपराधियों के बाद निर्भया और उसके परिवार को मिली आत्मिक शांति का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है, जिन्हें पिछले तीन महीने से कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करके निर्भया के चारो अपराधी वकील एपी सिंह की मदद से लगातार चोट पर चोट पहुंचा रहे थे।

यह चोट तब मृतका निर्भया की मां आशा देवी और उसके पिता बद्रीनाथ को अधिक लगती थी जब अपराधी फांसी को टालने के लिए उन्हीं कानून का इस्तेमाल कर रहे थे, जिनके भरोसे इंसाफ पाने के लिए पूरे परिवार ने जीवन के अनवरत 7 साल गुजार दिए थे। हालांकि अब चारों को फांसी पर झूलने की खबर मिलने के बाद निर्भया और उसके परिवार को शांति और इंसाफ दोनों मिल चुका है।

लेकिन निर्भया मामले में दोषियों की फांसी मिलने के बाद अब भविष्य पर चिंतन शुरू हो गया है। भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार और विद इन द लॉ लूप होल्स पर बहस छिड़नी स्वाभाविक है, जिसका सहारा लेकर चारों दोषियों का वकील लगातार तीन बार डेथ वारेंट को रद्द करवाने में सफल रहा और चौथे डेथ वारेंट को कैंसिल कराने की जुगत में था।

यही कारण था कि चौथ वारेंट कैंसिल न हो इसके लिए चारो दोषियो के वकील द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक 19 फरवरी देर रात तक कोर्ट खोलकर सुनवाई के लिए बैठना पड़ गया। तब जाकर निर्भया के दोषियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया जा सका। अब बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में भी कभी ऐसी स्थिति आई तो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका उसका सामना कैसे करेगी।

सवाल मौजू है, तो इसका जवाब भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा के पक्ष में जारी की नई गाइडलाइन में मिल जाएगा। केंद्र सरकार की गुजारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फांसी की सजा के मामले में नई गाइड लाइन जारी की थी।
नई गाइडलान के मुताबिक अब फांसी की सजा पाए दोषियों की अपील की सुनवाई महज 6 महीने के अंदर कोर्ट को निपटा लेना होगा। यानी भविष्य में फांसी की सजा पाने वाला दोषी का 6 महीने बाद फांसी पर लटकना तय हो गया है, जिसके बाद कोई भी लेकिन, परंतु और किन्तु पर विचार नहीं किया जाएगा।

शुक्रवार, 13 फरवरी को जारी नए दिशा-निर्देश में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ छह माह के भीतर अपील पर सुनवाई तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के सर्कुलर में कहा गया है कि किसी मामले में जब हाईकोर्ट मौत की सजा की पुष्टि करता है या उसे बरकरार रखता है।

और अगर सुप्रीम कोर्ट भी उस पर सुनवाई की सहमति जताता है तो आपराधिक अपील पर सहमति की तारीख से छह माह के भीतर मामले को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया जाएगा, भले ही यह अपील तैयार हो पाई हो या नहीं। यह निः संदेह इंसाफ की राह देख रहे पीड़ित और उसके परिवार के लिए राहत की बात है।
गाइडलाइन के मुताबिक, मौत की सजा के मामले में जैसे ही सुप्रीम कोर्ट विशेष अनुमति याचिका दाखिल की जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री मामले के सूचीबद्ध होने की सूचना मौत की सजा सुनाने वाली अदालत को देगी। इसके 60 दिनों के भीतर केस संबंधी सारा मूल रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट भेजा जाएगा या जो समय अदालत तय करे उस अवधि में उक्त रिकॉर्ड देने होंगे। अगर इस संबंध में कोई अतिरिक्त दस्तावेज या स्थानीय भाषा के दस्तावेजों का अनुवाद देना है तो वह भी देना होगा।

गौरतलब है निर्भया के गुनहगारों की फांसी में हो रही देरी को देखते हुए गत 22 जनवरी को केंद्र की मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में मांग की थी कि मौत की सजा पर सुधारात्मक याचिका दाखिल करने के लिए समय-सीमा तय की जाए।
क्योंकि मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी भी दोषी की कोई भी याचिका लंबित होने पर उस केस से जुड़े बाकी दोषियों को भी फांसी नहीं दी जा सकती थी, जिसका कनेक्शन वर्ष 2018 में संशोधित किए दिल्ली जेल के मैनुअल से जुड़ा है, जिसे केजरीवाल सरकार के दौरान संशोधित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए नए सर्कुलर यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने की सूचना के बाद रजिस्ट्री पक्षकारों को अतिरिक्त दस्तावेज कोर्ट में देने के लिए 30 दिन का और समय मिल सकता है। अगर तय समय में अतिरिक्त दस्तावेज देने की यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो मामले को रजिस्ट्रार के पास जाने से पहले जज के चैंबर में सूचीबद्ध किया जाएगा और फिर जज इस संबंध में आदेश जारी करेंगे। मालूम हो, सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किया गया नया सर्कुलर 12 फरवरी को ही जारी हुआ था, लेकिन यह 13 फरवरी को ही सामने आ सका था।

उल्लेखनीय है राजधानी दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षीय पैरा मेडिकल छात्रा के साथ गैंगरेप और मर्डर के चारों दोषी पिछले 3 महीन से कानूनी विकल्पों को फांसी टालने का टूल बनाकर लगातार फांसी की सजा का टालते आ रहे थे। कभी पुनर्विचार याचिका के नाम पर, कभी क्यूरेटिव याचिका के नाम पर।

कभी दया याचिका के नाम पर और फिर दया याचिका के नाम पर और फिर खारिज हो चुके दया याचिका को फिर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर लगातार चारो दोषी और उसका वकील न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहे थे। साथ ही वो न्याय की बाट जोह रहे निर्भया के मां-बाप की धैर्य की परीक्षा भी ले रहे थे। हालांकि तीन महीने के लंबे खिंचे समय उनके सारे कानूनी विकल्प खत्म हो गए तो उन्हें अब उनके जुर्मो की सजा मिल चुकी है।
यह भी पढ़ें- निर्भया मामला: फांसी से पहले दोषी मुकेश और विनय ने कहा-हमारी ये चीजें संभाल कर रखना

केंद्र सरकार ने की थी गाइडलाइन तय करने की मांग
निर्भया के गुनहगारों की फांसी में हो रही देरी को देखते हुए इस साल 22 जनवरी को केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। गृह मंत्रालय ने अपनी याचिका में यह मांग की थी कि मौत की सजा पर सुधारात्मक याचिका दाखिल करने के लिए समयसीमा तय की जाए। मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी भी दोषी की कोई भी याचिका लंबित होने पर उस केस से जुड़े बाकी दोषियों को भी फांसी नहीं दी जा सकती।

मौत की सजा पर अब छह महीने के भीतर अपील पर सुनवाई होगी पूरी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुक्रवार को जारी दिशा-निर्देश में मौत की सजा के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ छह माह के भीतर अपील पर सुनवाई तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के सर्कुलर में कहा गया है कि किसी मामले में जब हाईकोर्ट मौत की सजा की पुष्टि करता है या उसे बरकरार रखता है और अगर सुप्रीम कोर्ट भी उस पर सुनवाई की सहमति जताता है तो आपराधिक अपील पर सहमति की तारीख से छह माह के भीतर मामले को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया जाएगा, भले ही यह अपील तैयार हो पाई हो या नहीं। यह निः संदेह इंसाफ की राह देख रहे पीड़ित और उसके परिवार के लिए राहत की बात है।

7 वर्षों से न्याय की आस लगाए बोझिल हुए जा रहे हैं निर्भया के मां-बाप
न्याय की आस में 7 वर्ष से अधिक इंतजार में बोझिल हुए जा रहे निर्भया के मां-बाप समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उनकी गलती क्या है। हालांकि निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह और मां आशा देवी का भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा कल भी कायम था और अब जब निर्भया के चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ाया जा चुका है तो उनका भरोसा न्यायपालिका पर और बढ़ गया है। यानी देर भले हुई, लेकिन निर्भया को इंसाफ मिल गया।

संशोधित जेल मैनुअल को टूल बनाकर फांसी से बचते आ रहे थे दोषी
दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2018 में संशोधित जेल मैनुअल ही वह टूल था, जिसको हथियार बनाकर निर्भया गैंगरेप और मर्डर के दोषी चारो दोषी क्रमशः अक्षय सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश सिह मौत के साथ आंख मिचोली खेलते आ रहे थे। दोषियों और उनके वकील के कानूनी विकल्पों के चलते लगातार तीन महीने दोषी फांसी को टालने में सफल हुए थे।

कुछ मामलों में पक्षकारों को 30 दिन की और मिल सकती है मोहलत
सर्कुलर में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने की सूचना के बाद रजिस्ट्री पक्षकारों को अतिरिक्त दस्तावेज कोर्ट में देने के लिए 30 दिन का और समय दे सकती है। अगर तय समय में अतिरिक्त दस्तावेज देने की यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो मामले को रजिस्ट्रार के पास जाने से पहले जज के चैंबर में सूचीबद्ध किया जाएगा और फिर जज इस संबंध में आदेश जारी करेंगे। सर्कुलर 12 फरवरी को ही जारी हुआ था, जो अब सामने आया है।
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