निर्भया केस: फांसी देते वक्त मुजरिम के कान में क्या कहता है जल्लाद
नई दिल्ली। निर्भया गैंगरेप के दोषी विनय शर्मा को दिल्ली की तिहाड़ जेल में शिफ्ट किया गया है, इससे पहले विनय मंडोली जेल में बंद था। विनय को तिहाड़ में शिफ्ट करने के साथ ही अब लगभग ये तय माना जा रहा है कि चारों दरिंदों को जल्द ही फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा। सभी दोषियों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास है और जैसे ही वो इसे खारिज करेंगे चारों को तिहाड़ जेल के फांसी कोठी में शिफ्ट कर दिया जाएगा। जानकारी के मुताबिक तिहाड़ में दोषियों को फांसी पर लटकाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। जेल प्रशासन ने तख्त तैयार करके एक डमी का ट्रायल किया है। निर्भया मामले को कोर्ट ने 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' माना था और उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी। अब फांसी का वक्त करीब आ रहा है तो आईए जानते हैं भारत में फांसी के क्या नियम हैं। फांसी देते वक्त मुजरिम के कान में क्या कहता है जल्लाद।
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इन नियमों का पालन किए बिना फांसी की प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है
किसी को फांसी देते समय कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है। जिसके बिना फांसी की प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है। फांसी की सजा फाइनल होने के बाद डेथ वारंट का इंतजार होता है। दया याचिका खारिज होने के बाद ये वारंट कभी भी आ सकता है। वॉरंट में फांसी की तारीख और समय लिखा होता है। डेथ वॉरंट जारी होने के बाद कैदी को बताया जाता है कि उसे फांसी होने वाली है। उसके बाद कैदी के परिवार को फांसी से 10-15 दिन पहले सूचना दे दी जाती है ताकि आखिरी बार परिवार के लोग कैदी से मिल सकें। जेल में कैदी की पूरी चेकिंग होती है। उसे बाकी कैदियों से अलग सेल में रखा जाता है।

आखिरी वक्त में पास होता है जल्लाद, मुजरिम में कान में कहता है ये बात
आगे की बात करने से पहले आपको बता दें कि फांसी के वक्त मुजरिम के साथ जल्लाद के अलावा तीन अधिकारी होते हैं जिनमें जेल सुप्रीटेंडेंट, मेडिकल ऑफिसर और मजिस्ट्रेट शामिल हैं। लेकिन फांसी के फंदे तक ले जाने का काम जल्लाद का है और मौत से ठीक पहले आखिरी वक्त में वो ही मुजरिम के पास होता है। बता दें कि इस पूरे नियम-कानून के बीच सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल काम जल्लाद का ही होता है। फांसी देने से पहले जल्लाद अपराधी के कानों में कुछ बोलता है जिसके बाद वह चबूतरे से जुड़ा लीवर खींच देता हैं। अगर अपराधी हिंदू है तो जल्लाद उसके कान में राम-राम कहता है और अगर मुस्लिम है तो सलाम। उसके बाद वो कहता है मैं अपने फर्ज के आगे मजबूर हूं, मैं आपके सत्य की राह पर चलने की कामना करता हूं।

इसलिए भोर में दी जाती है फांसी
फांसी अमूमन सूर्योदय के वक्त दी जाती है। इसकी कई वजह हैं। मसलन फांसी के बाद मुजरिम की मृत देह का दिन के उजाले में ही उसके धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार उसका अंतिम संस्कार हो सके। परिवार वाले अगर शव को साथ ले जाना चाहें तो उन्हें इसमें बे-वजह परेशानी न उठानी पड़े। अगर फांसी लगाने के वक्त इत्तिफाकन आरोपी की मौत न हो सके, और उसकी सांसें चलती रह जाए तो, उसकी जिंदगी बचाने की हर संभव कोशिशें फौरन अमल में लाई जा सकें। हालांकि अब तक कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया है, जब फांसी पर लटकाया गया कोई मुजरिम ज़ख्मी हालत में बच गया हो। इसके अलावा जो सबसे खास वजह है वो ये कि अपराधी को पूरे दिन मौत का इंतजार न करना पड़े।

निर्भय कांड से हिल गया था पूरा देश
गौरतलब है कि 16 दिसंबर, 2012 को दक्षिणी दिल्ली के मुनेरका में एक प्राइवेट बस में अपने एक दोस्त के साथ चढ़ी 23 साल की पैरा मेडिकल छात्रा के साथ एक नाबालिग सहित छह लोगों ने चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म और लोहे के रॉड से क्रूरतम आघात किया गया था। इसके बाद गंभीर रूप से घायल पीड़िता और उसके पुरुष साथी को चलती बस से महिपालपुर में बस से नीचे फेंक दिया गया था। पीड़िता का इलाज पहले सफदरजंग अस्पताल में चला, उसके बाद तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार ने बेहतर इलाज के लिए उसे विशेष विमान से सिंगापुर भेजा था, जहां वारदात के 13वें दिन उसने दम तोड़ दिया था। छह आरोपियों में से एक नागालिग था जो अब छूट गया है। वहीं मुख्य आरोपी राम सिंह ने तिहाड़ में ही आत्महत्या कर ली थी।












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