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कांग्रेस, जिन्ना और माउंटबेटन पर भारत-पाक बंटवारे का ठीकरा! NCERT के 2 नए मॉड्यूल पर सियासत तेज

NCERT module on Partition horrors: भारत की आजादी और विभाजन की यादों पर एक बार फिर से सियासत गरमा गई है। एनसीईआरटी (NCERT) ने Partition Horrors Remembrance Day के लिए नया विशेष मॉड्यूल जारी किया है, जिसमें बंटवारे की जिम्मेदारी तीन पक्षों-जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबेटन-पर डाली गई है। एनसीईआरटी ने दो नए मॉड्यूल जारी किए हैं-एक मिडिल स्टेज (कक्षा 6-8) और दूसरा सेकेंडरी स्टेज (कक्षा 9-12) के छात्रों के लिए।

NCERT के विभाजन की विभीषिका के नए माड्यूल में कहा गया है कि भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण किसी भी तरह से अनिवार्य नहीं था। बंटवारा किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था, बल्कि तीन ताकतों की देन था, जिन्ना, जिन्होंने लगातार बंटवारे का प्रचार किया, कांग्रेस, जिसने बंटवारे को स्वीकार किया, और लॉर्ड माउंटबेटन, जिन्हें इसे लागू करने के लिए भेजा गया था।

NCERT releases 2 new modules on India-Pakistan Partition Horrors

जिन्ना का बयान "या तो बंटा हुआ भारत या तबाह भारत"

मॉड्यूल में कहा गया है कि मुस्लिम लीग का "डायरेक्ट एक्शन डे" (अगस्त 1946) और उससे जुड़ी हिंसा निर्णायक मोड़ साबित हुई। जिन्ना का बयान "या तो बंटा हुआ भारत या तबाह भारत" कांग्रेस नेताओं पर दबाव बना और आखिरकर नेहरू और पटेल को झुकना पड़ा।

मॉड्यूल्स विभाजन को "विश्व इतिहास में अद्वितीय मानवीय त्रासदी" बताते हैं। इनमें दर्ज है कि लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए, बड़े पैमाने पर हत्याएं और यौन हिंसा हुई, और शरणार्थियों से भरी ट्रेनें लाशों से भरी हुई पहुंचीं।

मॉड्यूल में यह भी दर्ज है कि विभाजन के औपचारिक होने से पहले ही भयावह घटनाएं शुरू हो गई थीं-नोआखाली और कलकत्ता (1946), तथा रावलपिंडी, थोहा और बेवल (मार्च 1947) इसके उदाहरण हैं।

गांधी, नेहरू और पटेल की भूमिका पर क्या कहा गया है?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मॉड्यूल में सरदार पटेल को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि "देश गृहयुद्ध की कगार पर था, इसलिए बंटवारा बेहतर विकल्प था।"

महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए कहा गया कि उन्होंने विभाजन का विरोध किया, लेकिन कांग्रेस के फैसले को हिंसा से रोकना नहीं चाहा। पाठ में कहा गया है: "उन्होंने (गांधी) कहा कि वे विभाजन में पक्ष नहीं हो सकते, लेकिन वे हिंसा के बल पर कांग्रेस को इसे स्वीकार करने से नहीं रोकेंगे।"

वहीं जवाहरलाल नेहरू और पटेल ने अंतत बंटवारे को स्वीकार कर लिया। बाद में गांधी जी ने 14 जून 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति को भी विभाजन पर सहमत होने के लिए राजी कर लिया।

माउंटबेटन पर बड़ा आरोप

मॉड्यूल ने लॉर्ड माउंटबेटन पर भी कड़ी टिप्पणी की है। इसमें कहा गया है कि उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की तारीख जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 कर दी, जिससे हड़बड़ी में सीमाओं का निर्धारण हुआ और लाखों लोग असमंजस में पड़ गए कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में।

कश्मीर से सुरक्षा संकट तक

पाठ्यक्रम में यह भी कहा गया है कि विभाजन ने कश्मीर को एक नए सुरक्षा संकट में बदल दिया। तब से पड़ोसी देश भारत पर दबाव बनाने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करते रहे हैं।

पाठ्यक्रम में लिखा है, "पाकिस्तान ने कश्मीर को मिलाने के लिए तीन युद्ध लड़े और हारने के बाद आतंकवाद को निर्यात करने की नीति अपनाई। यह सब विभाजन का ही परिणाम है।"

अनुभवहीन नेतृत्व और जल्दबाजी

सेकेंडरी मॉड्यूल में यह टिप्पणी भी की गई है कि भारतीय नेताओं को राष्ट्रीय या प्रांतीय स्तर पर प्रशासन, सेना या पुलिस चलाने का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि इतनी जल्दी सत्ता हस्तांतरण के बाद किस स्तर की समस्याएं पैदा होंगी। इसमें लिखा है कि "अन्यथा इतनी जल्दबाजी नहीं की जाती।"

मॉड्यूल का निष्कर्ष यह है कि विभाजन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी है, "शासकों की दूरदृष्टि की कमी राष्ट्रीय आपदा बन सकती है। शांति के लिए हिंसक समूहों को रियायत देना, उनकी हिंसा की भूख को और बढ़ा देता है।"

यह मॉड्यूल जोर देता है कि विभाजन की भयावहता को याद करना तभी सार्थक है, जब भारत इससे सबक ले-सांप्रदायिक राजनीति से दूरी बनाए और ऐसा नेतृत्व चुने जो व्यक्तिगत या पार्टी स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दे।

कांग्रेस का तीखा विरोध, कहा- इसे जला दीजिए ये सच नहीं है

कांग्रेस ने इस मॉड्यूल को झूठा करार देते हुए आग में झोंकने की मांग की। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, "इसे जला दीजिए, यह सच नहीं बताता। बंटवारे की जड़ हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की मिलीभगत में थी।"

कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने भी चुनौती दी कि, "आज BJP के कब्जे में NCERT है, लेकिन उन्हें बंटवारे का सही इतिहास पता ही नहीं।"

इस मॉड्यूल ने विपक्ष और सत्ताधारी दल के बीच नई बहस छेड़ दी है-आखिर बंटवारे की जिम्मेदारी किसकी थी और देश के इतिहास को स्कूलों में किस नजरिए से पढ़ाया जाना चाहिए?

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