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    पत्नी का हिंदू रिवाज के अनुसार श्राद्ध करने के लिए मुस्लिम पति ने इस तरह किया संघर्ष

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    नई दिल्ली। देश में अक्सर हिंदू और मुस्लिम के मुद्दे को लेकर आपने टीवी चैनल्स पर बहस सुनी होगी। तमाम सोशल मीडिया पर दोनों समुदाय के बीत तकरार की भी खबरें सामने आती हैं, लेकिन इन सबके बीच कोलकाता के एक परिवार ने हिंदू मुस्लिम के बीच खाई को कम करने का काम किया है। दरअसल यहां एक हिंदू महिला ने मुस्लिम युवक से शादी की थी। दोनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे, इसी दौरान दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया। हिंदू महिला निवेदिता ने यहां से बंगाली भाषा में मास्टर की डिग्री ली थी जबकि मोहम्म्द इम्तियाजुर ने यहां पारसी भाषा की पढ़ाई की थी। दोनों को विश्वविद्यालय में एक दूसरे से प्यार हो गया था और 1998 में दोनों ने एक दूसरे से शादी कर ली थी। शादी के बाद भी दोनों ने अपने धर्म को नहीं छोड़ा। लेकिन पिछले हफ्ते ही निवेदिता घाटक रहमान के शरीर के तमाम अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी।

    मंदिर प्रशासन ने अनुमति नहीं दी

    मंदिर प्रशासन ने अनुमति नहीं दी

    निवेदिता की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार निगम बोध घाट पर उसी दिन कर दिया गया था। लेकिन निवेदिता का परिवार उनका श्राध नहीं कर सका था क्योंकि मंदिर प्रशासन ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। लेकिन बुधवार को सामाजिक और सांस्कृति संस्था ने परिवार की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया और श्राध करने के लिए परिवार की मदद की। कोलकाता में रहने वाले मोहम्मद इम्तियाजुर रहमान ने बताया कि हमने चितरंजन पार्क काली मंदिर समाज को 6 अगस्त को बुक किया था और उन्हें 1300 रुपए इसके लिए दिया था। लेकिन एक घंटे के बाद हमारे पास एक उनके ऑफिस से फोन आया और उन्होंने बार-बार मेरा नाम पूछा, इसके बाद उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम मंदिर में नहीं किया जा सकता है, जब मैंने इसकी वजह पूछी तो उसने बंगाली भाषा में कहा कि तुम बेहतर समझ सकते हो और हमसे पैसे वापस लेने के लिए कहा गया। लेकिन मैंने यह स्वीकार नहीं किया। मैंने उनसे कहा कि मैंने यह पैसा अपनी अपनी पत्नी के श्राध के लिए जमा किया है और आप लोग उसे रख सकते हैं।

    मंदिर प्रशासन ने दी ये सफाई

    मंदिर प्रशासन ने दी ये सफाई

    इम्तियाजुर रहमान पश्चिम बंगाल में डायरेक्टरेट ऑफ कॉमर्शियल टैक्सेस विभाग में असिस्टैंट कमिश्नर के पद पर कार्यकरत हैं, जबकि निवेदिता कोलकाता के स्कूल में बंगाली संस्कृत पढ़ाती थीं। मंदिर के भीतर इस कार्यक्रम की अनुमति नहीं देने के बारे में जब काली मंदिर समाज के अध्यक्ष अशित्व भौमिक से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हम मंदिर के संरक्षक हैं और हर दो वर्ष बाद इसका चुनाव होता है। हम हिंदू धर्म के नियम को बदल नहीं सकते हैं। लेकिन मैं इस मामले की जांच करुंगा और पता करुंगा कि आखिर में क्यों यह बुकिंग रद्द की गई।

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    मुस्लिम परिवार ने किया अंतिम संस्कार

    मुस्लिम परिवार ने किया अंतिम संस्कार

    निवेदिता की बहन कृतिका ने अपना लीवर बहन को दान दिया था जिससे की निवेदिता के लीवर को ट्रांसप्लॉट किया जा सके। उन्होंने कहा कि हालांकि मंदिर ने श्राध करने से मना कर दिया था, लेकिन इसके बाद भी निवेदिता का अंतिम संस्कार बिना किसी दिक्कत के हुआ था। मेरे अलावा इस दौरान परिवार के सभी लोग यहां मौजूद थे्। जिन लोगों ने अंतिम संस्कार किया वह मुस्लिम थे, इस दौरान किसी ने कोई सवाल नहीं पूछा। वहीं इम्तियाजुर ने बताया कि धर्म मेरा व्यक्तिगत मसला है, मेरी पत्नी का धर्म हिंदू था और उसी के रीति रिवाज का पालन करती थी, मैं चाहता था कि मेरी पत्नी वो सबकुछ करे जो वह चाहती थी। कृतिका ने बताया कि दोनों ने एक दूसरे के धर्म का हमेशा सम्मान किया।

    आखिरकार मिली मदद

    आखिरकार मिली मदद

    वहीं निवेदिता की बेटी इहिनी अंबरीन जोकि कक्षा 12 की छात्रा है का कहना है कि मेरी मां की उम्र 46 वर्ष थी, अपनी आखिरी इच्छा बताने के लिए उनकी उम्र बहुत कम थी, लेकिन जिस तरह का जीवन उन्होंने जीया था, उससे साफ था कि वह हमेशा यह चाहती थीं कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रिवाज से किया जाए। इम्तियाज और उनका परिवार कोलकाता में ही रहता है। दो महीने पहले निवेदिता का इलाज कराने के लिए उन्होंने दिल्ली में एक फ्लैट किराए पर लिया था। कृतिका और इम्तियाज ने निवेदिता का अंतिम संस्कार हिंदू रिवाज से पूरा करने के लिए लगातार तमाम कोशिश की जिसके बाद आखिरकार उन्हें बंगाली सामाजिक सांस्कृतिक संस्था ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। कृतिका ने बताया कि संस्था की ओर से हमे फोन आया और उन लोगों ने हमे श्राध करने की अनुमति दे दी है।

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    English summary
    Muslim husband run here and there for her hindu wife last right finally got success. Temple authorities refused to perform the rituals in the temple.
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