मुंबई कूच: महाराष्ट्र के किसान गुस्से में क्यों हैं?

मुंबई कूच: महाराष्ट्र के किसान गुस्से में क्यों हैं?

महाराष्ट्र में 'भारतीय किसान संघ' नासिक से लेकर मुंबई तक किसानों के एक लंबे मार्च का आयोजन कर रहा है. सात दिन तक चलने वाली इस मार्च में शिरकत करने के लिए पूरे महाराष्ट्र से किसान आगे आए हैं.

7 मार्च तो नासिक से शुरू हुआ किसानों का ये मार्च सोमवार यानी 12 तारीख़ को राज्य की राजधानी मुंबई पहुंचेगा. किसानों ने एलान किया है कि वो मुंबई में राज्य की विधानसभा का घेराव करेंगे और अपनी आवाज़ राजनेताओं के कानों तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे.

किसानों की मांग है कि बीते साल सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का जो वादा किसानों से किया था उसे पूरी तरह से लागू किया जाए. किसानों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए और गरीब और मझौले किसानों के कर्ज़ माफ़ किए जाएं.

इसके साथ ही किसान आदिवासी वनभूमि के आवंटन से जुड़ी समस्याओं के निपटारे की भी मांग कर रहे हैं ताकि आदिवासी किसानों को उनकी ज़मीनों का मालिकाना हक मिल सके.

महाराष्ट्र में हड़ताल पर किसान

ये सिफ़ारिशें लागू होती तो नहीं होता मंदसौर कांड!

किसानों की नाराज़गी के पीछे क्या कारण हैं?

इस लंबे मार्च पर ख़बर करने के लिए पहुंचे पत्रकार पार्थ एम निखिल कहते हैं, "मार्च के पहले दिन पच्चीस हज़ार किसानों में इसमें हिस्सा लिया है. मुंबई पहुंचते-पहुंचते इनकी संख्या बढ़ेगी और पचास हज़ार से अधिक हो जाएगी. समाज के हर तबके से लोग आकर इस मार्च में हिस्सा ले रहे हैं. इसमें आम किसानों के साथ 96 साल के वरिष्ठ नागरिक और महिलाएं भी शामिल हैं."

किसानों के इस मार्च ने एक बार फिर प्रदेश में उनकी स्थिति की ओर सबका ध्यान खींचा है. बीबीसी ने इस बारे में खेती से जुड़े जानकार, पत्रकारों और किसान नेताओं से बात की और जानने की कोशिश की कि इस तादाद में जमा होकर अपनी आवाज़ पहुंचाने की किसानों की वजहें क्या हैं.

मंदसौर: किसान आंदोलन में हिंसा, 6 की मौत

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान क्यों हैं नाराज़

1. कर्ज़ माफ़ी का काम है अधूरा

मराठवाड़ा इलाके में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजीव उनहाले कहते हैं, "कर्ज़ माफ़ी के संबंध में जो आंकड़े दिए गए हैं को बढ़ा-चढ़ा कर बताए गए हैं. जिला स्तर पर बैंक खस्ताहाल हैं और इस कारण कर्ज़ माफ़ी का काम अधूरा रह गया है. इस तरह की स्थिति में बैंकों को जितने किसानों को लोन देना चाहिए उसका दस फीसद भी अभी नहीं हो पाया है."

"कर्ज़ माफ़ी की प्रक्रिया इंटरनेट के ज़रिए हो रही है लेकिन डिजिटल साक्षरता किसानों को दी ही नहीं गई है, तो वो इसका लाभ कैसे ले पाएंगे? क्या उन्होंने इसके संबंध में आंकड़ों की पड़ताल की है?"

संजीव उनहाले कहते हैं, "उन्हें इस कार्यक्रम को लागू करने से पहले इसका पायलट प्रोजेक्ट करना था लेकिन ऐसा किया नहीं गया. किसानों ने पंजीकरण केंद्र के लिए लगाए गए शिविरों में जाकर ये पता लगाया कि उनका नाम लाभार्थियों की सूची में शामिल किया गया है या नहीं. ये लोग इंटरनेट नहीं समझते. किसानों के साथ क्रूर मज़ाक किया गया है."

संघ की ही उपज हैं मंदसौर के विद्रोही किसान नेता कक्का जी

मंदसौर: किसानों की मौत मामले में डीएम-एसपी सस्पेंड

2. उचित समर्थन मूल्य का मुद्दा

वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत भालेराव उचित समर्थन मूल्य से जुड़ी समस्या के बारे में विस्तार से समझाते हैं. वो कहते हैं, "किसानों की समस्या का समाधान करने के लिए उन्हें उचित समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए. सिर्फ़ न्यूनतम समर्थन मूल्य दे देना काफी नहीं. उन्हें मदद चाहिए, उनकी स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ रही है. प्रकृति की नाराज़गी के साथ-साथ राज्य सरकार के फ़ैसलों ने किसानों की समस्या को केवल बढ़ाया ही है."

किसानों की मांग है कि उन्हें स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार C2+50% यानी कॉस्ट ऑफ कल्टिवेशन (यानी खेती में होने वाले खर्चे) के साथ-साथ उसका पचास फीसदी और दाम समर्थन मूल्य के तौर पर मिलना चाहिए. किसान नेता मानते हैं कि ऐसा करने पर किसानों की आय की स्थिति को सुधारा जा सकता है.

संजीव उनहाले कहते हैं, "सरकार और किसान दोनों का ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर कोई नियंत्रण नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतों की गिरावट का सीधा असर किसानों पर पड़ता है जिससे वो बुरी तरह प्रभावित होते हैं. अगर सरकार कृषि से जुड़ी चीज़ों के प्रोसेसिंग यूनिट लगाती है तो किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए."

क्या मोदी सरकार भी किसानों को छल रही है?

राजस्थान में सरकार-किसान आमने-सामने

3. आय कम, रामभरोसे है ग्रामीण अर्थव्यवस्था

राज्य के आर्थिक सर्वे की बात करें तो बीते सालों में कृषि विकास दर कम हुई है. किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं, "संविधान के अनुसार कृषि राज्य का विषय है. लेकिन इस दिशा में जो भी महत्वपूर्ण फ़ैसले होते हैं वो केंद्र सरकार करती है. न्यूनतम समर्थन मूल्य से लेकर आयात-निर्यात के फ़ैसले केंद्र सरकार के होते हैं."

वो कहते हैं, "इसका असर अब दिखने लगा है. खेती से होने वाली आय 44 फीसदी तक कम हो गई है. कपास, अनाज और दलहन से होने वाली आय दिन प्रतिदिन कम हो रही है. और इस कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था से पैसा लगातार बाहर जा रहा है."

खेत में लगी फ़सल बचा रही हैं सनी लियोनी

BUDGET SPECIAL: क्या देश के किसान भी देंगे टैक्स?

4. कीटनाशक के इस्तेमाल का विरोध

निशिकांत भालेराव कहते हैं, "कपास की खेती पर कीड़ों ने कहर बरपाया हुआ है. इसकी खेती को कीड़े प्रभावित करते रहेंगे. इसीलिए नए और उन्नत किस्म के कपास के बीजों की ज़रूरत है. इस वक्त यही इस समस्या का समाधान दिखता है. हमने पहले भी सूखा और बीमारी से बचने वाली कपास की किस्मों के विकास पर अधिक ध्यान नहीं दिया है."

वो कहते हैं, "औरंगाबाद स्थित माहिको कंपनी इस विषय पर शोध करने के लिए हर साल 150 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. लेकिन कुछ लोग, ख़ासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ लोग उन्नत किस्म के बीजों के लिए तैयार नहीं हैं. खाद्य उत्पाद तो नहीं, लेकिन कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग केमिकल्स के ज़रिए की जा सकती है."

"माहिको के पास उन्नत किस्म के बीज हैं. लेकिन केंद्रीय सरकार इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. ऐसे बीज इस्तेमाल करने से कीड़ों की समस्या से निजात मिल सकती है."

इस खेती के दौरान पत्नी से अलग सोते हैं किसान

गुजरात का पोलियोग्रस्त किसान जो लाया अनार की बहार

5. ज़मीन का हक आदिवासियों को

इस मार्च में हजारों की संख्या में आदिवासी हिस्सा ले रहे हैं. वास्तव में, मार्च में सबसे अधिक संख्या में आदिवासी ही शामिल हैं. मीना निखिल कहते हैं, "नाशिक क्षेत्र में जनजातीय भूमि वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है. यहां किसान आदिवासी हैं और वो खेती करते हैं लेकिन उनके पास इन ज़मीनों का मालिकाना हक नहीं है. इसीलिए आदिवासी अपनी उस ज़मीन पर अपना हक मांग रहे हैं जिसकी वो पूजा करते हैं."

कई आदिवासियों ने बीबीसी के साथ अपनी समस्याएं साझा कीं. उन्होंने बताया, "कई बार वन अधिकारी हमारे खेत खोद देते हैं. वो जब चाहें तब ऐसा कर सकते हैं. हमें अपनी ज़मीन पर अपना हक चहिए. हमें हमेशा दूसरे की दया पर जीना पड़ता है."

आदिवासी किसान अपने लिए कर्ज़ माफी , उचित समर्थन मूल्य और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं.

यूपी: कर्ज़ ने ली एक और किसान की जान

'देश में किसान और किसानी की हत्या हो रही है'

6. 'कौन बर्दाश्त कर सकेगा अधिक खर्चा?'

विजय जावंधिया राज्य पर ऋणभार की स्थिति के बारे में विस्तार से बताते हैं. वो कहते हैं, "जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी तक राज्य पर ढाई लाख करोड़ रुपये के ऋणभार था. ये ऋणभार अब बढ़कर 4 लाख 13 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है."

वो पूछते हैं, "ये पैसा आख़िर किसने खर्च किया? इससे आम आदमी को क्या लाभ मिला? किसानों को इससे क्या मिला है? वक्त के साथ ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच की खाई बढ़ती गई है. इस कारण किसानों के इर्द-गिर्द घूमने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है."

'फ़ैसले पीएम मोदी के हैं, सवाल उन्हीं से करेंगे ना?'

तेल के दाम और किसान की क़ीमत

7. प्राथमिक पशु देखभाल केंद्रों की दुर्दशा

लाल्या-खुर्कट जैसी बिमारियों ने पशुओं पर काफी हद तक प्रभावित किया है. कुछ किसानों के पशुओं की मौत हो गई है. पत्रकार भालेराव कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक पशु देखभाल केंद्र मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्थिति दयनीय है. ये केंद्र पशुओं समय पर जानवरों का उपचार नहीं करते."

"मीडिया ने भी कभी यहां के मुद्दे को नहीं उठाया है और इस कारण ये मुद्दा काफी हद तक उपेक्षित रहा है."

ज़मीन में क्यों धंसे बैठे हैं ये किसान?

'किसान से प्रीमियम 1800 और मुआवज़ा 100 रुपये'

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+