यौन उत्पीड़न का शिकार बेटे को मां ने ऐसे दिलाया न्याय

यौन उत्पीड़न
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16 अगस्त 2019, देश अभी भी स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना ही रहा था कि यह दिन मेरे जीवन के यादगार दिनों में शामिल हो गया.

मेरे पास पुणे पुलिस स्टेशन से एक कॉल आया.

"मैम, अभियुक्त को दोषी ठहराया गया है."

मैं कुछ देर के लिए जैसे थम सी गई. सबकुछ समझने में मुझे कुछ सेकंड का वक़्त लगा. यह मेरे बेटे को न्याय दिलाने की चार साल की लंबी लड़ाई की जीत थी, जिसके साथ उसके स्कूल के एक चपरासी ने यौन उत्पीड़न किया था.

यह अप्रैल 2015 की बात है. मेरा बेटा कुछ हफ़्ते पहले ही 13 साल का हुआ था. हमने उसका एडमिशन पुणे के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में करवाया था.

मुझे आज भी वो पहला दिन याद है जब मैं उसे छोड़कर घर वापस आ रही थी. वो 100 किलोमीटर की दूरी एक अनंतकाल की तरह लग रही थी.

मैं बहुत भारी दिल के साथ वापस लौटी थी. यह पहली बार था जब मैं अपने बच्चे से दूर थी. सबकुछ सामान्य ही हो रहा था कि मुझे मेरे बेटे का एक ईमेल मिला, जिसमें उसने बताया कि उसके स्कूल के एक चपरासी ने उसका यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की.

"मम्मा... इस स्कूल के चपरासी बहुत अजीब हैं. उनमें से एक ने मुझे पीछे से पकड़ने की कोशिश की और अपना हाथ मेरी पैंट के अंदर डाल दिया."

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न्याय की लड़ाई

बोर्डिंग स्कूल में उसे छोड़े बमुश्किल से चार दिन ही हुए थे. मैं इस घटना के बाद सन्न थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं.

तभी उनके पिता ने मुझे फोन किया. उन्हें भी वो ईमेल मिला था, जो मेरे बेटे ने मुझे भेजा था. हमने तुरंत अपने घर नवी मुंबई से उसके बोर्डिंग स्कूल जाने का फ़ैसला किया.

मैंने अपने बेटे के स्कूल के इलाक़े के पुलिस स्टेशन को फ़ोन मिलाया और घटना के बारे में बताया. पुलिस अधिकारी बेहद मददगार लगे, जिन्होंने न केवल मुझे आराम से सुना बल्कि बात पूरी होने के बाद तुरंत स्कूल के लिए रवाना हो गए.

15 मिनट के भीतर मुझे फिर से उसी पुलिस अधिकारी का फ़ोन आता है, वो बताते हैं कि मेरा बेटा उनके साथ है और सुरक्षित है. यह सुनकर मुझे कुछ राहत मिली.

यहां तक कि उन्होंने मुझे मेरे बेटे से बात भी कराई और तब मेरी जान में जान आई.

बोर्डिंग स्कूल पहुंचने के बाद हम उसके प्रिंसिपल से मिले और मैंने कहा कि मैं उस शख़्स को सज़ा दिलाकर रहूंगी. वो मेरी इस बात से नाराज़ हुए.

प्रिंसिपल ने पहले ही चपरासी को नौकरी से निकाल दिया था और उसे अपने परिवार के साथ स्कूल परिसर से जाने को कह दिया था. शायद उन्होंने सोचा होगा कि यह सज़ा के रूप में पर्याप्त है लेकिन मेरे अंदर की मां संतुष्ट नहीं थी.

मैं एक यौन अपराधी को ऐसे नहीं छोड़ सकती थी.

स्कूल के प्रिंसिपल के पास अपनी मजबूरियां थीं. उनके स्कूल की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती और आज मैं उनकी इस दुविधा को पूरी तरह से समझ सकती हूं. मैंने स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कराई. चपरासी को गिरफ़्तार कर लिया गया और वहीं से मेरे बेटे को न्याय दिलाने की लड़ाई शुरू हुई, जिसका अंत चार साल बाद हुआ है.

अपने बेटे से बात करते समय मुझे पता चला कि उस चपरासी ने कुछ और बच्चों के साथ ऐसे दुर्व्यवहार किए थे. उत्पीड़न के शिकार उन बच्चों में मेरे बेटे के कुछ दोस्त भी शामिल थे.

जब मैंने अपने बेटे से पूछा कि क्या उन बच्चों ने कभी अपने माता-पिता को इन दुर्व्यवहारों के बारे में बताया, और अगर उन्होंने ऐसा किया तो उनके माता-पिता ने क्या किया. मैं अपने बेटे का जवाब सुन कर सन्न रह गई. उसने बताया कि उनके अभिभावकों ने अपने बच्चों को इस बारे में प्रिंसिपल से शिकायत करने के लिए कहा. बच्चों ने शिकायत की भी लेकिन प्रिंसिपल को पता था कि क्या करना उचित है. मैं इस बारे में सोचती रही कि कोई भी अभिभावक चुप कैसे रह सकता है. या फिर मैं ही तो ग़लत नहीं कर रही हूं और मामले को बड़ा बना रही हूं.

बेटे का ईमेल पढ़ने के बाद जब मैं उसके स्कूल जा रही थी तो मेरे अंदर मिली-जुली भावना पनप रही थी. एक तरफ़ मुझे गुस्सा आ रहा था तो दूसरी तरफ़ में असहाय महसूस कर रही थी.

मुझे लगा कि मैं अपने बच्चे की रक्षा नहीं कर पाई. मेरे आंखों से आंसू बह रहे थे और ये गुस्से के आंसू थे.

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बेटा ही तो है...

मैं इस लड़ाई में बिल्कुल अकेली थी. मेरे पति ने कहा था कि कोर्ट जाने के झंझट में क्यों फंसना. बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो जाएगी और हम लोगों को परेशानी होगी सो अलग. मेरे रिश्तेदार जानना चाहते थे कि मैं इस मामले को बड़ा मुद्दा क्यों बना रही हूं क्योंकि यह मेरे बेटे के साथ हुआ था न कि बेटी के साथ.

लेकिन मुझे पता है कि एक मां की अपने बच्चों के लिए जो भावनाएं होती हैं, उन्हें उसके पति या रिश्तेदार समझ नहीं सकते.

मामले को अदालत आने में क़रीब दो साल लग गए और हमारा केस सरकारी वकील लड़ रहा था. कोर्ट की कार्यवाही, तारीख़ों और अन्य क़ानूनी प्रक्रियाओं के बारे में समझने के लिए हमें उनसे मिलने जाना पड़ता था.

चार घंटे की थकान भरी ड्राइव के बाद मैं उनसे मिलने पहुंचती थी. मैं अपने छोटे बेटे को भी साथ ले जाती थी क्योंकि वो बहुत छोटा था और उसे घर में अकेले नहीं छोड़ा जा सकता था. और इसके बाद तपती गर्मी और धूप में कोर्ट परिसर में दिनभर खड़ा रहना पड़ता था. यह मेरे छोटे बेटे के लिए किसी यातना से कम नहीं था, लेकिन हम दोनों ने साथ मिलकर इसे मैनेज किया.

इस पूरी कवायद में एक अच्छी बात यह थी कि जो पुलिस अधिकारी मेरे बेटे का केस देख रहे थे, वो काफ़ी मददगार थे. वो हर सुनवाई पर न केवल हमारे पास आते थे बल्कि पूरे समय तक हमारे साथ रहते थे. उस सज्जन की वजह से पुलिस विभाग के प्रति मेरा विश्वास बढ़ा है.

दिसंबर 2018 में मेरे बेटे को बयान के लिए कोर्ट के कठघरे में बुलाया गया. मुझे नहीं पता था कि यह कैसे होगा क्योंकि जीवन में पहली बार मैं कोर्ट रूम गई थी.

मेरे लिए यह सबसे भयावह अनुभव था. उस वक़्त मेरा बेटा 16 साल का हो चुका था और दोषियों, अपराधियों और अभियुक्तों से भरे कोर्ट रूम में उसे कठघरे में खड़ा होना पड़ा.

जब मेरा बेटा कोर्ट रूम के अंदर था, मुझे बाहर रहने को कहा गया क्योंकि जज साहब को यह लगता था कि मां की मौजूदगी से बच्चे के जवाब प्रभावित होंगे. कोर्ट रूम के बाहर खड़े होकर मैं अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी. अंदर क्या चल रहा था, मैं बहुत कुछ नहीं सुन पा रही थी लेकिन मैंने अपने बेटे को अंदर शांत और शालीनता के साथ खड़ा देखा.

मैं अपने बेटे के उस चेहरे को कभी नहीं भूल सकती. वो न तो डरा हुआ था और न ही भयभीत दिख रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर दर्द था.

मुझे इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि हम बंद कमरे में सुनवाई के लिए आवेदन कर सकते थे, लेकिन मेरे वकील ने इस बारे में मुझे बताया नहीं था.

दो घंटे तक मेरे बेटे से पूछताछ की गई और बाद में मुझे पता चला कि उसको असहज करने वाले कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ा था.

मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी, और पहली बार मैं सबके सामने बुरी तरह रोई. मैंने अपने बेटे को गले लगा लिया और उससे कहा कि मैं अब और नहीं लड़ना चाहती अगर उसे यह सब झेलना होगा तो.

मेरे बेटे ने मुझे गले लगाते हुए कहा, "आप फ़ाइटर हैं. बिना लड़े आप कैसे हार मान सकती हैं? क्या हम इतनी दूर लड़ाई को बीच में छोड़ देने के लिए आए थे?"

मुझे मेरी मां की याद आ गई जो मुझसे हमेशा कहा करती थी, "मज़बूत मांएं ही मज़बूत परिवार बनाती हैं."

कमज़ोर मां बनना कोई विकल्प नहीं था. मुझे ख़ुद को साहस देना पड़ा और लड़ाई लड़ने के लिए फिर से खड़ा होना पड़ा.

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अब मेरी बारी थी. मुझे बचाव पक्ष के वकील के सवालों का जवाब देना था. मुझे भी कुछ ऐसे सवालों से गुज़रना पड़ा जिन्होंने मुझे गुस्से से भर दिया. लेकिन आंसुओं से भरी आंखों से मेरे बेटे ने मेरी तरफ़ देखा और एक मुस्कान के साथ मुझे गुड लक का इशारा किया.

बचाव पक्ष के वकील यह मामला बनाने की कोशिश कर रहे थे कि चूंकि मेरा बेटा पहली बार अपनी मां से दूर था इसलिए उसने घर वापस जाने के लिए झूठी कहानी बनाई. उन्होंने मेरे बेटे से भी यह सवाल पूछा था.

लेकिन उसने बहुत ही आराम से जवाब दिया, "13 साल की उम्र में ज़्यादातर बच्चे 'यौन शोषण' शब्द से अनजान होते हैं और अगर मुझे किसी बहाने की ज़रूरत होती तो बीमार महसूस करने का बहाना सबसे आसान होता."

यहां मुझे इस बात का उल्लेख करना होगा कि हमारे मामले की सुनवाई एक दयालु जज कर रहे थे, जिन्होंने न केवल धैर्यपूर्वक हमारी बातें सुनीं बल्कि कई बार बचाव पक्ष के वकीलों के बुरे सवालों पर आपत्ति भी जताई.

अंततः यह अग्नि परीक्षा इस साल मार्च के अंत में ख़त्म हुई और हमें अंतिम फ़ैसले के लिए इंतजार करने को कहा गया. हालांकि मुझे पता था कि मेरा केस कमजोर नहीं है लेकिन मेरे पक्ष में फ़ैसला आएगा, इसको लेकर आशांवित नहीं थी और ऊपरी अदालत में जाने की भी योजना बना रही थी.

मेरी सारी दुआएं 16 अगस्त को कुबूल हुईं. अदालत ने उस यौन अपराधी को तीन साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई और पॉक्सो एक्ट के तहत जुर्माना भी लगाया गया.

मैं इस फ़ैसले से खुश हूं लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मैं उन कई बच्चों की मदद नहीं कर पाई, जिन्होंने यौन दुर्व्यवहार झेले हैं. उनके लिए कोई खड़ा नहीं हुआ, यहां तक की उनकी मांएं भी नहीं.

शायद मेरी यह कहानी उन्हें इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस दे पाएं, वो उत्पीड़न और अपराध के ख़िलाफ़ खड़े हों तो हम निश्चित रूप से इस समाज को अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर बना सकते हैं.

आज आपकी बारी है कि आप कैसा कल बनाना चाहते हैं.

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