'मर्णिकर्णिका' रानी लक्ष्मीबाई झांसी के लिए लड़ीं या भारत की आज़ादी के लिए?

रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर बनी फ़िल्म मणिकर्णिका में कंगना रनौत मुख्य भूमिका में हैं.

भारत की आज़ादी की लड़ाई में लक्ष्मीबाई ने हिस्सा लिया था. लेकिन कुछ ऐसे लोग ऐसे भी रहे, जिन्होंने लक्ष्मीबाई की लड़ाई को भारत नहीं, सिर्फ़ झांसी को बचाने की लड़ाई माना.

लक्ष्मीबाई झांसी के लिए लड़ी थीं या देश के लिए ये सवाल बार-बार उठाया गया है. वीडी सावरकर ने इस युद्द को 1857 का स्वतंत्रता संग्राम कहा था.

पर ब्रितानी इतिहासकारों ने इसे स्वतंत्रता की लड़ाई कहने से नकारा है वो इसे ग़दर या बग़ावत कहते हैं.

लक्ष्मीबाई की भूमिका को समझने के लिए इतिहास की ओर चलना होगा.

लक्ष्मीबाई की वो छवि....

झांसी का शंकर किला. आग की लहरों में लिपटा हुआ झांसी.

किले से अंग्रेज़ों पर होता हमला और अंग्रेज़ों का जवाबी हमला. रानी लक्ष्मीबाई गोद लिए हुए बच्चे को पीठ पर बांधे हुए. घोड़े पर सवार.

झांसी की रानी का नाम लेते ही हमारी आंखों के सामने ये तस्वीर आती है. इसी लड़ाई में लक्ष्मीबाई ने आख़िरी सांस ली थी.

लेकिन कहानी सिर्फ़ इस तस्वीर भर की नहीं है. रानी लक्ष्मीबाई पर क्या बीती थी, इसको समझने के लिए हमें 1857-58 के दौर को देखना पड़ेगा.

मोरोपंत ताम्बे पेशवाओं के यहां नौकरी करते थे. मोरोपंत के घर बिटिया ने जन्म लिया. नाम रखा गया- मणिकर्णिका.

मणिकर्णिका की शादी झांसी के राजा गंगाधर नेवालकर के साथ हुई. शादी के बाद मणिकर्णिका को लक्ष्मीबाई के नाम से जाना जाने लगा.

1851 में लक्ष्मीबाई और गंगाधर को बच्चा हुआ लेकिन सिर्फ़ तीन महीने में उस नवजात शिशु की मौत हो गई. कुछ वक़्त बाद गंगाधर राव की तबीयत बिगड़ गई.

20 नवंबर 1853 में गंगाधर राव ने एक बच्चे को गोद लिया. गोद लेने के दूसरे ही दिन गंगाधर राव की मौत हो गई.

अंग्रेज़ी हुकूमत ने नागपुर, तंजावर, सतारा, जैसे मराठों के प्रिंसली स्टेट को समाप्त कर दिया और ब्रिटिश कंपनी का हिस्सा बना लिया.

लक्ष्मीबाई
BBC
लक्ष्मीबाई

डलहाउज़ी की वो साजिश....

गंगाधर राव की मौत के बाद झांसी को भी ख़त्म करने की लॉर्ड डलहाउज़ी की साजिश थी.

उन्होंने दामोदर राव को झांसी का वारिस मानने से इंकार कर दिया था और झांसी को विलय करने का आदेश जारी कर दिया.

13 मार्च 1854 को रानी लक्ष्मीबाई को ये आदेश मिला.

तब लक्ष्मीबाई ने कहा- मेरी झांसी नहीं दूंगी. इस वाक्य की वजह से लक्ष्मीबाई का इतिहास में नाम अमर हो गया.

इस स्थिति में क्या किया जाए ये पूछने के लिए लक्ष्मीबाई ने बैरिस्टर जॉन लैंग से सलाह मांगी.

जॉन लैंग ने उन्हें इस मामले में फ़िलहाल चुप रहने की सलाह दी. इसलिए शुरू के दौर में लक्ष्मीबाई ने ब्रितानियों के साथ बातचीत से मसला सुलझाने की कोशिश करने लगीं.

लेकिन जब उन्हें विश्वास हो गया कि बातचीत से मसले का हल नहीं होगा तो रानी लक्ष्मीबाई ने बाणपूर के राजा मर्दान सिंह को ख़त लिखकर अपनी इच्छा ज़ाहिर की.

अंग्रेज़ों से लड़ाई
Getty Images
अंग्रेज़ों से लड़ाई

लक्ष्मीबाई के लिखे ख़त में क्या था?

'भारत अपना देश है. विदेशियों की ग़ुलामी में रहना अच्छा नहीं है. उनसे लड़ना अच्छा है. हमारी राय है कि विदेशियों का शासन भारत पर न हो. हमको अपने आप पर बड़ा भरोसा है और हम फौज की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि अंग्रेजों से लड़ना बहुत ज़रूरी है...'

इतिहासकार यशोधन जोशी ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि बग़ावत के दौरान सिर्फ़ अपने राज्य के बारे में न सोचकर अंग्रेज़ों को इस देश से उखाड़ फेंकने की मंशा दिखती है.

लक्ष्मीबाई पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए झांसी की रानी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. लक्ष्मीबाई से पहले नानासाहब पेशवा ने भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी थी.

https://www.youtube.com/watch?v=vcX_0m8RYSc

'अपने हक़ के लिए लड़ी थीं लक्ष्मीबाई'

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई किताब की लेखिका प्रतिभा रानाडे कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई का मानना था कि झांसी रियासत पर उनका हक़ है और अपने हक़ के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी थी.

लेखिका के हिसाब से झांसी की रानी की रियासत ही उनका राष्ट्र था. राष्ट्रीयता को आज जिस तरह से समझा जाता है 1857 के समय इस तरह नहीं समझा जाता था.

दिल्ली के तख़्त पर कोई भी हो पर हर राजा अपने आप को एक स्वतंत्र राजा समझता था और यही उनके लिए राष्ट्रीयता थी.

इतिहासकार डॉक्टर सुरेंद्र नाथ सेन और आरसी मजुमदार ने कहा था कि अंग्रेज़ों से दुश्मनी के कारण ये बग़ावत हुई थी. दक्षिण भारत में कहीं भी बग़ावत नहीं हुई थी. इसी आधार पर कई लोगों की धारणा है कि झांसी की रानी केवल अपने स्वार्थ के लिए लड़ रही थीं.

झांसी की रानी के वंशज प्रमोद झांसीवाले ने बीबीसी मराठी से बातचीत करते हुए कहा कि रानी लक्ष्मीबाई पर लगे आरोप राजनीतिक कारणों से होते हैं अगर उन्हें सिर्फ़ झांसी के लिए लड़ना होता तो अपनी जान जोखिम में नहीं डालती.

उनकी लड़ाई देश के लिए थी. 17 जून 1858 को अंग्रेज़ों से लड़ते हुए ग्वालियर के पास उनकी मौत हो गई.

आज उसी जगह पर झांसी की रानी का एक स्मारक है.

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