कभी जेपी के शिष्य लालू ने इंदिरा को उखाड़ा था, आज तेजस्वी हैं राहुल के मोहताज

पटना। राजनीति भी अजीब शै है। आज राहुल गांधी और तेजस्वी यादव एक दूसरे करीब हैं। मिल-जुल कर राजनीति करते हैं। लेकिन 46 साल पहले हालात बिल्कुल जुदा थे। 18 मार्च को ही तेजस्वी के पिता लालू यादव ने राहुल की दादी इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फेंकने का पटना में शंखनाद किया था। इंदिरा विरोध के नाम पर ही लालू नेता बने थे। अब तेजस्वी नेता बनने के लिए राहुल गांधी के समर्थन पर आश्रित हैं। वक्त के साथ रंग बदलने की फितरत का नाम ही शायद राजनीति है। 18 मार्च 1974 को पटना में हजारों छात्र तत्कालीन अब्दुल गफूर सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कपर उतरे थे। बिहार विधानसभा के घेराव के लिए छात्र आगे बढ़ रहे थे। इस आंदोलन में तब लालू यादव, सुशील मोदी, शिवानंद तिवारी, रविशंकर प्रसाद, नरेन्द्र सिंह, रामजतन सिन्हा जैसे छात्र नेता बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। आंदोलनकारी छात्रों ने जब राज्यपाल की गाड़ी रोकने की कोशिश की तो पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। कई छात्र घायल हो गये। भगदड़ मच गयी। कुछ देर में भीड़ बेकाबू हो गयी। अराजक तत्व भी भीड़ में शामिल हो गये। देखते-देखते पटना में हिंसा और आगजनी शुरू हो गयी। तब जयप्रकाश नारायण ने ही छात्रों को अहिंसक आंदोलन के लिए प्रेरित किया। छात्रों के सहयोग जेपी ने जिस आंदोलन की नींव रखी उसने चार साल बाद ही इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता उखाड़ फेंका। लालू यादव इसी जेपी आंदोलन की उपज हैं।

18 मार्च 1974
1973 में अब्दुल गफूर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उस समय इंदिरा गांधी की मर्जी पर राज्यों में मुख्यमंत्री बनते या हटते थे। अब्दुल गफूर सरकार में विद्याकर कवि शिक्षा मंत्री थे। 1973 में ही गुजरात के अहमदाबाद स्थित एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में मेस की फीस बढ़ाये जाने पर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था। धीरे-धीरे छात्रों का यह आंदोलन पूरे गुजरात में फैल गया। उसकी धमक बिहार में भी हुई। पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी शिक्षा में सुधार और सहूलियतों के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। अब्दुल गफूर सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। शिक्षा मंत्री विद्याकर कवि सवालों के घेरे में आ गये। पटना विश्वविद्यालय के छात्र मेस और होस्टल की फीस में कमी, बेहतर पुस्तकालय, नियमित पढ़ाई की मांग करने लगे। इस बीच फरवरी में अब्दुल गफूर सरकार ने सभी कॉलेजों को बंद करने का फरमान जारी कर दिया। छात्र संघ की गतिविधियों पर रोक लगा दी गयी। इससे छात्र और भड़क गये। गफूर सरकार के तानाशाही फरमान के कुछ दिनों बाद एक दिन जेपी ने छात्रों के सम्बोधित किया। 17 फरवरी को छात्र शिक्षा मंत्री विद्याकर कवि से मिल कर अपनी मांगों का ज्ञापन देना चाहते थे। लेकिन उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। उसी दिन छात्रों के समूह ने 18 मार्च 1974 को विधानसभा घेराव का फैसला कर लिया।

हिंसक हो गया था आंदोलन
18 मार्च 1974 को बिहार विधान मंडल का सत्र शुरू होने वाला था। तत्कालीन राज्यपाल आर डी भंडारे को दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करना था। छात्रों ने राज्यपाल की गाड़ी को घेरने की योजना बनायी। छात्रों का विशाल जुलूस बिहार विधानसभा की ओर बढ़ रहा था। छात्रों ने जब राज्यपाल आर डी भंडारे की गाड़ी को रोकने की कोशिश की तो पुलिस ने लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। इसके बाद अफरा तफरी मच गयी। कई छात्रों का सिर फूट गया। उस समय छात्रों का यह जुलूस संगठित नहीं था। कई छात्र नेता उसे सामूहिक रूप से संचालित कर रहे थे। भीड़ पर किसी का एक नियंत्रण नहीं होने से स्थिति बेकाबू हो गयी। पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ने लगी तो अनियंत्रित भीड़ रोड़ेबाजी करने लगी। इसका फायदा असामाजिक तत्वों ने उठाया।

जेपी आंदोलन की नींव
अचानक आंदोलन का रूप बदल गया। तोड़फोड़ और हिंसा शुरू हो गयी। अखबार के दफ्तर और कई भवनों में आग लगा दी गयी। लूटपाट से स्थिति अराजक हो गयी। स्थिति बेकाबू होने पर सेना को बुलाना पड़ा। कर्फ्यू की नौबत आ गयी। ऐसे में आंदोलन के फेल होने का अंदेशा बढ़ गया। हिंसा से जब आंदोलन सवालों के घेरे में आ गया तो निराश छात्र जेपी से मिले। अहिंसक आंदोलन की शर्त पर जेपी इसके नेतृत्व के लिए तैयार हुए। जेपी के नेतृत्व में छात्र आंदोलन सुचारू रूप से आगे बढ़ने लगा। आखिरकार इंदिरा गांधी, अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए मजबूर हुईं। लेकिन जेपी का यह आंदोलन बिहार से निकल कर पूरे देश में फैल गया जिसके डर से इंदिरा गांधी को 1975 में इमरजेंसी लगानी पड़ी। इमरजेंसी के खिलाफ भी जेपी ने जोरदार लड़ाई लड़ी जिसकी वजह से 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से रुखसत होना पड़ा। बिहार के हुंकार से एक ऐसी क्रांति का जन्म हुआ था जिसने देश को दूसरी आजादी दिलायी।
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