Manipur: सुप्रीम कोर्ट के 6 जजों का मणिपुर दौरा सरकार के लिए क्यों होगी बड़ी चुनौती, जबकि एक जज भी हैं मणिपुरी
Manipur: मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में इस हफ्ते हुई हिंसा ने एक बार फिर राज्य की जातीय और राजनीतिक स्थिति को चर्चा में ला दिया है। इस संवेदनशील माहौल के बीच सुप्रीम कोर्ट के 6 जजों का मणिपुर दौरा सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
खासकर तब जब चुराचांदपुर बार एसोसिएशन ने 'मेइतेई' समुदाय के किसी जज के इस दौरे में शामिल होने पर आपत्ति जताई है। इस प्रतिनिधिमंडल में जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह एकमात्र जज हैं, जो मणिपुरी हैं और राज्य के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के जज बने हैं।

Manipur News Today: मणिपुर में जातीय संघर्ष और मौजूदा राजनीतिक स्थिति
मणिपुर में 3 मई,2023 से ही मेइतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय संघर्ष चल रहा है। इस हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। ताजा हिंसा चुराचांदपुर जिले में हमार और जोमी समुदायों (दोनों आदिवासी) के बीच हुई है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई।
पिछले महीने मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद से राज्य विधानसभा निलंबित अवस्था में है और संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी केंद्र पर आ गई है। केंद्र सरकार ने 13 फरवरी, 2025 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।
Manipur News: सुप्रीम कोर्ट के 6 जजों के मणिपुर दौरे का महत्व
सुप्रीम कोर्ट जजों के 22 मार्च, 2025 से होने वाले इस दौरे का मुख्य उद्देश्य राहत कैंपों में रह रहे हिंसा प्रभावित लोगों से मिलकर न्यायिक और मानवीय सहायता को पुख्ता करना है। प्रतिनिधिमंडल में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह शामिल होंगे। जस्टिस गवई इसकी अगुवाई कर रहे हैं।
नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (NALSA) के तहत यह दौरा हिंसा पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें उचित कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, इस दौरे को लेकर स्थानीय संगठनों की आपत्तियां सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं।
Manipur: 'मेइतेई' समुदाय के जज को लेकर आपत्ति
दरअसल, चुराचांदपुर बार एसोसिएशन ने 'मेइतेई' समुदाय के किसी जज के अपने जिले में प्रवेश पर आपत्ति जताई है। बार एसोसिएशन का कहना है कि 'मेइतेई समुदाय के लॉर्डशिप शांति और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में हमारे जिले में कदम नहीं रखेंगे, भले ही उनके नाम कार्यक्रम में हों।'
इस बयान से यह साफ हो जाता है कि मणिपुर में जातीय तनाव इतना गहरा है कि देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश को भी इससे अछूता नहीं रहने दिया जा रहा है। अगर देश की सर्वोच्च अदालत के जज को जातीय विवादों में घसीटा जाता है, तो यह राज्य की स्थिति को और जटिल बना सकता है।
Manipur violence: केंद्र सरकार के लिए चुनौती
यह मामला केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती इसलिए है क्योंकि:
1.जातीय तनाव को कैसे शांत किया जाए: मणिपुर में पहले से ही जातीय विभाजन काफी बढ़ चुका है। जज को लेकर जताई गई यह आपत्ति इस तनाव को और बढ़ा सकती है।
2.सुप्रीम कोर्ट की गरिमा बनाए रखना: अगर चुराचांदपुर बार एसोसिएशन की आपत्ति को मान लिया जाता है, तो यह संदेश जा सकता है कि न्यायपालिका जातीय राजनीति से प्रभावित हो रही है।
3.शांति प्रयासों को सफल बनाना: सुप्रीम कोर्ट के जजों का दौरा मणिपुर के हिंसा प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की किरण हो सकता है, लेकिन अगर यह विवादों में घिर गया तो इसका विपरीत प्रभाव हो सकता है।
4.न्याय और प्रशासनिक मजबूती का प्रदर्शन: राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद केंद्र सरकार के पास राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण है। अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों के दौरे में कोई बाधा आती है या इसमें कोई विवाद होता है, तो इससे सरकार की साख पर भी असर पड़ सकता है।
Manipur Today: आगे की क्या होगी राह?
केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर बेहद संतुलित रवैया अपनाना होगा।
स्थानीय संगठनों को विश्वास में लेना होगा, ताकि सुप्रीम कोर्ट के जजों का दौरा सुचारू रूप से संपन्न हो सके।
जातीय तनाव को कम करने के लिए सख्त प्रशासनिक कदम उठाने होंगे, ताकि किसी भी समुदाय को यह न लगे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों की गरिमा और निष्पक्षता को सुनिश्चित करना होगा, जिससे यह संदेश जाए कि भारतीय न्यायपालिका किसी जातीय या राजनीतिक प्रभाव की मोहताज नहीं है।












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