Mahakumbh 2025: महाकुंभ में अक्षयवट पूजा क्यों जरूरी, 144 वर्ष पहले मुगलकाल में लगा प्रतिबंध अब कैसे हटा?
Prayagraj Akshayavat: अक्षयवट धरती पर सनातन संस्कृति की अटूट धरोहर का प्रतीक है। इसकी पूजा से पहले त्रिवेणी संगम में स्नान करना आवश्यक माना जाता है। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि माता सीता ने वनवास के दौरान अक्षयवट (Akshay Vat) की पूजा की थी और इसे अमरता का वरदान मिला। यह वृक्ष धरती पर सनातन संस्कृति की अटूट धरोहर का प्रतीक है।
प्रयागराज महाकुंभ (Mahakumbh 2025) में अक्षयवट का दर्शन और गंगा जल चढ़ाकर और वट वृक्ष की परिक्रमा का विशेष महत्व है। इस वट की पूजा से शरीर निरोग और दीर्घायु की कामना पूरी होती है, ऐसा माना जाता है। जीवन में अक्षय सुख, शांति और समृद्धि लाने वाले इस वृक्ष के नीचे ध्यान और भक्ति करने से जीवन-मरण के चक्र से भी मुक्ति मिलती है।

कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। अर्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ का आयोजन तब होता है जब ग्रह और नक्षत्र एक विशेष स्थिति में होते हैं। कुंभ का जिक्र चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा वृत्तांत में भी मिलता है। धार्मिक ग्रंथों में कुंभ से ही ब्रह्मांड की शुरुआत मानी गई है।
सीएम योगी ने हटाया अक्षयवट पूजा से प्रतिबंध
संगम के तट पर एक प्राचीन किला है, जिसमें यह अक्षयवट स्थित है। अक्षयवट का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। लेकिन मुगल शासक अकबर ने अक्षयवट के दर्शन और पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया था।
केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद सीडीएस जनरल बिपिन रावत यहां पहली बार पहुंचे थे, जिन्होंने पातालपुरी मंदिर के दर्शन किए। बाद में सीएम योगी आदित्यनाथ के प्रयासों वर्ष 2018 में अक्षयवट दर्शन पर लगी रोक हटा दी गई, जिसके बाद पीएम मोदी ने भी यहां दर्शन पूजन किया।












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