मध्य प्रदेश में लोकसभा के साथ हो सकते हैं फिर से विधानसभा चुनाव!

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    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में तकरीबन 15 साल बाद सत्ता में वापसी करने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि प्रदेश में पार्टी की सरकार लंबे समय तक चल पाएगी। मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि प्रदेश में इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव के साथ एक बार फिर से विधानसभा चुनाव भी कराए जाए। पार्टी के वरिष्ठ नेता के इस बयान के बाद प्रदेश में पार्टी के भीतर चल रही उठापटक एक बार फिर से खुलकर सामने आ गई है।

    प्रदेश सरकार में बैटरी नहीं

    प्रदेश सरकार में बैटरी नहीं

    मध्य प्रदेश से कई बार पार्टी के सांसद और विधायक रहे नेता का कहना है कि प्रदेश सरकार के रिमोट में बैटरी नहीं है। नेता का मानना है कि प्रदेश में पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, यही नहीं पार्टी को इस बात का भी डर है कि उसके खुद के विधायक पार्टी का साथ छोड़ सकते हैं।जिन विधायकों के समर्थन के साथ पार्टी ने प्रदेश में सरकार बनाई है उनके भी साथ छोड़ने का डर पार्टी को प्रदेश में सता रहा है। कांग्रेस नेता ने इस बात के भी संकेत दिए है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल नहीं हो पा रही है, जबकि पार्टी के कुछ विधायक मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज हैं।

    नाराज विधायक छोड़ सकते हैं कांग्रेस का साथ

    नाराज विधायक छोड़ सकते हैं कांग्रेस का साथ

    कांग्रेस पार्टी के नेता ने इस बात के भी संकेत दिए हैं कि जिन विधायकों को मंत्री बनाया गया है, उसमे से कई ऐसे भी हैं जो मनचाहा मंत्रालय नहीं मिलने से नाराज हैं। पार्टी ने नेता ने बताया कि एक विधायको को मंत्री नहीं बनाया गया है लेकिन इस नेता का पार्टी के भीतर काफी हस्तक्षेप है। ऐसे में वह पार्टी से काफी नाराज हैं, लिहाजा वह पार्टी का साथ छोड़ सकते हैं। गौर करने वाली बात है कि प्रदेश में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं है ऐसे में कांग्रेस के लिए एक-एक विधायक की काफी ज्यादा अहमियत है।

    एमपी का सियासी गणित

    एमपी का सियासी गणित

    मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटं हैं, जिसमे से कांग्रेस के खाते में 114 सीटें आई हैं, जबकि पार्टी को बसपा के दो और सपा के एक विधायक और चार निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल है, जिसकी बदौलत प्रदेश में पार्टी की सरकार बनी है। चार में से एक निर्दलीय विधायको को मंत्री बनाया गया है। लेकिन सपा और बसपा के विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया है, जिसकी वजह से दोनों ही पार्टियों में रोष है। सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुद इस बात पर नाराजगी जाहिर की थी।

    आसान नहीं कांग्रेस की राह

    आसान नहीं कांग्रेस की राह

    ना सिर्फ सपा मुखिया बल्कि मायावती ने भी उनके विधायकों को मंत्री नहीं बनाए जाने पर नाराजगी जाहिर की थी। वहीं प्रदेश में भाजपा के पास कुल 109 विधायक हैं। जो विधायक कांग्रेस से नाराज हैं भाजपा उनके लगातार संपर्क में है। लेकिन सियासी हलचल यहीं रुकने का नाम नहीं ले रही है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भी भाजपा के कुछ विधायकों को पार्टी में लाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने तीन विधायकों की पहचान की है जोकि पार्टी के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। बहरहाल कांग्रेस के लिए तत्कालीन चुनौती यह है कि वह प्रदेश में विधानसभा स्पीकर पद का चयन कर सके।

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