Lok Sabha Speaker: लोकसभा अध्यक्ष पद पर खींचतान! जानें कैसे होता है चुनाव? मोदी सरकार के लिए क्यों है अहम?
Lok Sabha Speaker: 18वीं लोकसभा 26 जून को अपने नए अध्यक्ष का चुनाव करने वाली है। 'लोकसभा अध्यक्ष' भारत के संसद के निचले सदन, लोकसभा, का प्रमुख होता है। लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव उस समय होता है, जब लोकसभा का नया सत्र आरंभ होता है या पिछले अध्यक्ष के पद से हटने पर। सभी सदस्यगण अध्यक्ष के लिए नामांकन प्रस्तुत कर सकते हैं। नामांकन में प्रस्तावक और समर्थक दोनों का होना अनिवार्य है।
हालांकि, इस बार अध्यक्ष पद को लेकर काफी खींचतान नजर आ सकती है। क्योंकि, केंद्र में बैठी मोदी सरकार को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों का हाथ रहा है। जिसमें, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और जेडीयू मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है। दोनों ही दल अपने पाले में अध्यक्ष पद रखना चाहते हैं। वहीं, बीजेपी इसे अपने खेमे में ही रखने के मूड में है। आइए जानते हैं कैसे होता है अध्यक्ष पद का चुनाव ? क्या है शक्तियां और मोदी सरकार के लिए क्यों है अहम?

कैसे चुना जाता है लोकसभा अध्यक्ष ?
अध्यक्ष के चुनाव के नियम संविधान के अनुच्छेद 93 में निर्धारित किए गए हैं। प्रक्रिया के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव नए सत्र के पहले या पिछले अध्यक्ष के पद खाली होने पर होता है। किसी भी सदस्य को अध्यक्ष पद के लिए नामांकित किया जा सकता है। नामांकन पत्र को सदन के कम से कम 50 सदस्यों द्वारा समर्थित और प्रस्तावित होना चाहिए। अगर एक से अधिक उम्मीदवार हैं, तो मतदान द्वारा चुनाव होता है। मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होता है। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत मिलते हैं, वह अध्यक्ष चुन लिया जाता है। अगर केवल एक उम्मीदवार है, तो उसे निर्विरोध अध्यक्ष घोषित किया जाता है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका संसद में तटस्थ और निष्पक्ष होती है। वह सदन के सदस्यों और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखता है। अध्यक्ष की प्रभावी नेतृत्व क्षमता संसद की कार्यवाही को सुचारू और प्रभावी बनाती है, जिससे लोकतंत्र की नींव मजबूत होती है।
लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियां और कर्तव्य
- सदन की कार्यवाही का संचालन: अध्यक्ष सदन की बैठक संचालित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि सदन की कार्यवाही नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार चले। वह सदन की चर्चा और बहस को दिशा देता है और सदस्यों को बोलने का अवसर प्रदान करता है।
- अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखना: अध्यक्ष का कर्तव्य है कि सदन में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखे। वह अशोभनीय आचरण करने वाले सदस्यों को चेतावनी दे सकता है, निष्कासित कर सकता है या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है।
- प्रश्नकाल और अन्य कार्य: अध्यक्ष प्रश्नकाल, शून्यकाल और अन्य कार्यसूची की प्राथमिकता तय करता है। वह महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए समय निर्धारित करता है।
- वोटिंग का अधिकार: सामान्य परिस्थितियों में अध्यक्ष मतदान में भाग नहीं लेता। हालांकि, टाई होने की स्थिति में उसे निर्णायक मत देने का अधिकार होता है।
- नियमों की व्याख्या: अध्यक्ष सदन के नियमों और प्रक्रियाओं की व्याख्या करता है और विवादास्पद मामलों पर निर्णय लेता है। उनके निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होते हैं।
- समितियों का गठन: अध्यक्ष विभिन्न संसदीय समितियों का गठन करता है और उनके सदस्यों की नियुक्ति करता है। वह समितियों के कार्य की निगरानी करता है और उनकी रिपोर्ट सदन के समक्ष प्रस्तुत करता है।
मोदी सरकार के लिए क्यों अहम है पद?
दरअसल, लोकसभा चुनाव के नतीजे इस बार बीजेपी के मनमुताबिक नहीं रहे। बीजेपी बहुमत का आंकड़ा 272 हासिल करने में असफल रही। सिर्फ 240 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। वहीं, बीजेपी नीत वाली एनडीए ने बहुमत हासिल किया। एनडीए के घटक दलों की मदद से नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने।
एनडीए के घटक दलों में टीडीपी और जेडीयू दोनों ही पार्टी मजबूत धरातल बनकर उभरे। उधर, कांग्रेस नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन इस बार चुनाव में 234 सीटों के साथ लाइमलाइट में आ गया। ऐसे में सियासी गलियारों में चर्चा है कि कहीं घटक दलों ने बीच में मन बदल लिया और समर्थन वापस ले लिया तो, केंद्र में मोदी सरकार धराशायी हो जाएगी। ऐसे में बीजेपी के लिए अध्यक्ष पद अपने खेमे में रखना बेहद जरूरी है। आपको बता दें कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत लोकसभा अध्यक्ष के पास अनियंत्रित व्यवहार को दंडित और दल बदल के आधार पर सदस्यों को अयोग्य ठहराने का भी पूरा अधिकार होता है।












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