लोकसभा सीटों के परिसीमन पर क्यों है विवाद? किसे होगा फायदा, किसकी घटेगी हिस्सेदारी, कांग्रेस ने उठाए सवाल
Lok Sabha Seat Delimitation: संसद के आगामी सेशन में पेश होने जा रहे संविधान संशोधन और परिसीमन (Delimitation) से जुड़े प्रस्ताव देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। अगर ये प्रस्ताव कानून बन जाते हैं तो लोकसभा में राज्यों की सीटों का बंटवारा बदल सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर हिंदी पट्टी के राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ सकती है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी घटने की संभावना है।
मसौदे के मुताबिक हिंदी पट्टी की हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो सकती है, जबकि दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी 24.3% से घटकर 20.7% रह सकती है।

संसद में पेश होंगे दो अहम बिल
संसद का बजट सेशन 16 अप्रैल 2026 को फिर से शुरू हो रहा है। इस दौरान सरकार संविधान (131वां) संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक पर चर्चा कराने की तैयारी में है। सरकार का कहना है कि इन विधेयकों का मकसद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को तेज करना है।
विपक्ष का आरोप: महिलाओं के आरक्षण की आड़ में सीटों का नया बंटवारा
कांग्रेस ने इन प्रस्तावों की आलोचना करते हुए कहा है कि महिलाओं के आरक्षण के नाम पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का नया बंटवारा किया जा रहा है और इस पर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी (Abhishek Manu Singhvi) ने कहा कि उनकी पार्टी इस कदम का विरोध करेगी।
उन्होंने कहा कि, 'हम इस 'बैकडोर परिसीमन' का विरोध करेंगे। हम महिलाओं के आरक्षण के पूरी तरह समर्थन में हैं और चाहते हैं कि इसे तुरंत मौजूदा लोकसभा और विधानसभा की सीटों के भीतर ही लागू किया जाए।'
प्रस्ताव लागू हुए तो सीटों का नया गणित
अगर ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो लोकसभा में राज्यों की हिस्सेदारी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
- हिंदी पट्टी: 38.1% से बढ़कर 43.1%
- दक्षिण भारत: 24.3% से घटकर 20.7%
अभी कैसे तय होती हैं लोकसभा सीटें
मौजूदा व्यवस्था के अनुसार लोकसभा सीटों का राज्यों के बीच बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर तय किया गया था।राज्यों के अंदर सीटों का विभाजन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया है। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी जब तक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के परिणाम जारी नहीं हो जाते।
CPM ने कहा: देश की व्यवस्था के लिए खतरा
सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास (John Brittas) ने इन प्रस्तावों की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं के आरक्षण के नाम पर लाए जा रहे ये विधेयक देश की मौजूदा व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने कहा, 'महिलाओं के आरक्षण के नाम पर लाए जा रहे ये बिल देश की मौजूदा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं।'
लोकसभा की कुल सीटें 850 तक बढ़ाने का प्रस्ताव
इन विधेयकों में लोकसभा की कुल सीटों को बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इनमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। साथ ही इन सीटों में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का भी प्रस्ताव है।
अटल बिहारी वाजपेयी के समय हुआ था समझौता
लोकसभा सीटों में बदलाव पर रोक का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत किया गया था। यह फैसलाअटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 2001 में बनी राजनीतिक सहमति के बाद संवैधानिक संशोधन के जरिए लागू किया गया था। अब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार इस व्यवस्था को हटाने और उपलब्ध नवीनतम जनगणना यानी 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का नया बंटवारा करने का प्रस्ताव दे रही है।
दक्षिणी राज्यों की मांग नहीं मानी गई
दक्षिण भारत के कई राज्यों- जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब ने मांग की थी कि लोकसभा सीटों में बदलाव पर लगी रोक को 2026 के बाद भी 25 साल तक बढ़ाया जाए। लेकिन केंद्र सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और संसद से तुरंत नए परिसीमन को मंजूरी देने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस का आरोप: 2029 चुनाव की तैयारी
कांग्रेस का कहना है कि संसद के दोबारा शुरू होने से सिर्फ 36 घंटे पहले ये प्रस्ताव सामने आए हैं और इस पर कोई सर्वदलीय बैठक भी नहीं हुई। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, 'इसका महिलाओं के आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। यह 2029 के चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा परिसीमन है।'
कुछ राज्यों में सीटें तेजी से बढ़ेंगी
अगर लोकसभा की 815 सीटों का बंटवारा 2011 की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है तो कई बड़े राज्यों की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी होगी।
- उत्तर प्रदेश: 80 से बढ़कर 138 सीटें (58 सीटों की बढ़ोतरी)
- केरल: 20 से बढ़कर 23 सीटें
- बिहार: 40 से बढ़कर 72 सीटें
- महाराष्ट्र: 48 से बढ़कर 78 सीटें
- तमिलनाडु: 39 से बढ़कर 50 सीटें
राज्यों की हिस्सेदारी में भी बदलाव
इन प्रस्तावों के लागू होने पर राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी में भी बदलाव होगा।
- उत्तर प्रदेश: 14.73% से बढ़कर 16.24%
- केरल: 3.68% से घटकर 2.7%
- बिहार: 7.37% से बढ़कर 8.47%
- तमिलनाडु: 7.18% से घटकर 5.88%
क्षेत्रवार सीटों में बढ़ोतरी का अनुमान
14.4%
| क्षेत्र | राज्य | सीटों में बढ़ोतरी (%) | 543 सीटों में हिस्सेदारी | 850 सीटों में हिस्सेदारी |
| उत्तर-पूर्व | असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम | 33.3% | 4.4% | 3.8% |
| उत्तर (गैर-हिंदी) | पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख | 58.3% | 4.4% | 4.5% |
| पूर्व | झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल | 48.7% | 14.4% | 13.7% |
| पश्चिम | महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा | 56.4% | 14.3% | 14.4% |
| दक्षिण | तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | 33.3% | 24.3% | 20.7% |
| हिंदी पट्टी | बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड | 76.8% | 38.1% | 43.1% |
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