लोकसभा चुनाव 2019: कांग्रेस से क्यों चिपकना चाहती है आम आदमी पार्टी?

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में ऐसा क्या है कि दोनों पार्टियों को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए? यह सवाल उन लोगों के लिए अप्रिय हो सकता है जो हर हाल में बीजेपी को हराने का मकसद हासिल करना चाहते हैं। मगर, कभी कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट विपक्ष में ऐसा हुआ था कि वामदल और बीजेपी मिलकर चुनाव लड़ ले?

कांग्रेस से क्यों चिपकना चाहती है आम आदमी पार्टी?

आप और कांग्रेस की तुलना लेफ्ट और बीजेपी से करना भी अटपटा लग सकता है। मगर, यह अटपटा नहीं है। जिस आम आदमी पार्टी का जन्म कांग्रेस के ख़िलाफ़ संघर्ष से हुआ हो, जिस आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार चलाने को कभी स्वीकार नहीं किया हो और मौका मिलते ही अपनी पहली ही सरकार को त्यागपत्र देकर ख़त्म कर दिया हो, वही आम आदमी पार्टी इतना कैसे बदल सकती है!

कांग्रेस क्यों करे आम आदमी पार्टी से गठबंधन?

कांग्रेस क्यों करे आम आदमी पार्टी से गठबंधन?

आखिर कांग्रेस को अपनी ही सरकार उखाड़ फेंकने वालों के साथ गठबंधन क्यों करना चाहिए? क्या इसलिए कि अब बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकना है? यही वजह है कि कांग्रेस के नेताओं ने राजनीतिक जीवन में आम आदमी पार्टी को वर्जित कर रखा है। अरविन्द केजरीवाल का आरोप ही यही है कि राहुल गांधी उनसे बात नहीं करते, उनके फोन नहीं उठाते। ऊपर बतायी गयी पृष्ठभूमि वास्तव में फ़ोन उठाने वाली नहीं है।

‘बीजेपी को हराना' मतलब क्या?- अन्ना आंदोलन को भूल जाना, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा से समझौता कर लेना? आम आदमी पार्टी के लिए मुद्दों से समझौता करना कोई बड़ी बात नहीं रही है, यह बात साबित हो चुकी है। पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने बीजेपी के किस-किस नेता से माफी नहीं मांगी हैं। बहाना भी कितना तगड़ा था- "दिल्ली के लोगों को वक्त देना है"।

प्रायश्चित करे आम आदमी पार्टी

प्रायश्चित करे आम आदमी पार्टी

अगर दिल्ली के लोगों को वक्त देना ही प्राथमिकता है तो लोकसभा चुनाव में समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं अरविन्द केजरीवाल? बीजेपी को हराने का मकसद बहुत आसान हो जाता है अगर वे एकतरफा कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा कर देते हैं। आम आदमी पार्टी को ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि राजनीतिक रूप से वे ‘प्रायश्चित' कर सकें।

प्रायश्चित उस गलती का, जिसमें उसने कांग्रेस की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अन्ना आंदोलन में बीजेपी और आरएसएस का समर्थन लिया। प्रायश्चित इस गलती का भी करना चाहिए कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर ग़लत इल्ज़ाम लगाए। ग़लत इसलिए क्योंकि अब वह इल्ज़ाम पार्टी खुद भी भुला चुकी है और इस हद तक भुला चुकी है कि कांग्रेस से गठबंधन को तैयार है।

कांग्रेस से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता ‘बीजेपी विरोध'
बीजेपी को हराने की ज़रूरत बताकर आम आदमी पार्टी कोस रही है कांग्रेस को। सवाल ये है कि ‘बीजेपी को हराने की ज़रूरत' कांग्रेस से ज्यादा कोई पार्टी समझती है? कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर यह फॉर्मूला रखा है कि कांग्रेस 3 और आम आदमी पार्टी 4 सीटों पर गठबंधन के तहत चुनाव लड़े। इस फॉर्मूले के लिए भी कांग्रेस को बहुत कुछ भूलना पड़ा है।

ऐसे U टर्न लेते हैं अरविन्द केजरीवाल

ऐसे U टर्न लेते हैं अरविन्द केजरीवाल

यह सुनते-सुनते कि कांग्रेस से किसी सूरत में गठबंधन नहीं करना है अर्सा हो गया। अब यह सुनते-सुनते कान पक गये हैं कि कांग्रेस जिद्दी है, वह नहीं चाहती है कि बीजेपी को हराया जाए, हम एक होकर लड़ें तो बीजेपी से दिल्ली की 7 ही नहीं, हरियाणा और पंजाब समेत 30 से ज्यादा सीटें जीत लें। राजनीति का क,ख,ग,घ नहीं समझने वाला व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि ‘बीजेपी को हराना' आम आदमी पार्टी का मकसद है या कि संसद में अपनी संख्या बढ़ाना।

आखिर क्यों अरविन्द केजरीवाल अपनी उस ट्वीट को ही भुला बैठे हैं जो उन्होंने 29 अगस्त 2018 को की थी, "दिल्ली में कांग्रेस को वोट देने का मतलब है, आम आदमी पार्टी के वोट काटकर भाजपा को जिताना।" अरविन्द केजरीवाल को अपना 7 जनवरी 2019 का बयान भी याद रखना चाहिए, "कांग्रेस के लिए बिल्कुल भी वोट नहीं करें, क्योंकि अगर आप कांग्रेस को वोट करेंगे तो यह नरेंद्र मोदी को ही मजबूत करेगी। आप अपने वोट बंटने न दें। सभी सात सांसद ‘आप' के ही चुनें।" 12 मार्च को भी उन्होंने लगभग यही बयान दोहराया था, "कांग्रेस को दिल्ली की सभी 7 सीटें जीतनी हैं। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को यह सुनिश्चित करना होगा।"

कटु भावनाओं के साथ गठबंधन क्यों हो?

कटु भावनाओं के साथ गठबंधन क्यों हो?

राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल के बीच अप्रैल के तीसरे हफ्ते में ट्वीट पर हुई लड़ाई के बाद भी गठबंधन की चर्चा हो रही है। ऐसी कटुता लेकर अगर गठबंधन होता है तो हासिल क्या होगा? नतीजे में चंद सीटें। ऐसी सीटें लेकर करेंगे क्या? यह कटुता तो सत्ता की ताकत आने पर और बढ़ जाएगी। तब क्या एक और सरकार को हटाने के लिए किसी और गठबंधन के लिए सहयोगी की तलाश की जाएगी?

अगर वामदलों ने कांग्रेस सरकार को हटाने के लिए अनैतिक गठबंधन का साथ नहीं दिया होता, यानी उस राष्ट्रीय मोर्चा का साथ जो बीजेपी के साथ भी तालमेल कर रही थी तो बीजेपी कभी इतनी मजबूत होती ही नहीं। यह काम तब किया गया जब बीजेपी का चेहरा पूरी तरह से सांप्रदायिक स्वरूप में उजागर हो चुका था। आज वाम दल कहां हैं? आम आदमी पार्टी का भी यही हश्र होना चाहिए क्योंकि इसने भी कांग्रेस को हटाने के नाम पर वही गलती की है जो वामदलों ने की थी।

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