दिल्ली वालों के लिए पुरानों के बीच गायक, बॉक्सर और क्रिकेटर का तड़का
नई दिल्ली। पूरे देश में अगर कोई एक राज्य ऐसा रहा जहां के प्रत्याशियों को तय करना दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस के लिए अंतिम समय तक टेढ़ी खीर बना रहा, तो वह दिल्ली के रूप में सामने आया। दिल्ली में अपने प्रत्याशी तय करने में सबसे आगे रही आम आदमी पार्टी (आप) जिसने कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करने की अपनी अकुलाहट के बावजूद कई दिनों पहले ही छह और बाद में एक अन्य उम्मीदवार का ऐलान कर रखा था। कांग्रेस और भाजपा ने तो नामांकन के अंतिम दिन तक प्रत्याशी तय किए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के लिए दिल्ली कितनी जटिल रही है। सबसे ज्यादा मुश्किल उस भाजपा में नजर आई जिसने पिछले चुनाव में सभी सातों सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार कई सीटों को लेकर भाजपा के भीतर अच्छा खासा असमंजस नजर आया और आखिर कुछ सांसदों के टिकट काटने पड़े और सेलेब्रिटीज का सहारा तक लेने को मजबूर होना पड़ा।

सेलेब्रिटीज का सहारा तक लेने को मजबूर
कांग्रेस के सामने संभवतः सबसे बड़ा सवाल यह रहा होगा कि वह ऐसा क्या कर सकती है जिससे पिछली हार की कुछ भरपाई इस चुनाव में की जा सके। बीते चुनाव में कांग्रेस को दिल्ली में न केवल सभी सीटों पर हार मिली थी बल्कि कई सीटों पर वह तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी। ऐसा तब हुआ था जब उससे पहले दिल्ली में वह सत्ता में रही थी और भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली दिल्ली में लोकसभा चुनावों में भी कम से कम एक-दो सीटें जीतती रही है। आम आदमी पार्टी कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिखाने की कोशिश में लगी थी, लेकिन इस प्रयास में भी लगी थी कि कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए। उसका अपना तर्क रहा है कि भाजपा को हराने के लिए यह आवश्यक है क्योंकि अकेले-अकेले चुनाव में जाने से इसका खतरा बरकरार रहेगा कि भाजपा को जीत मिल जाए। कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन अंतिम समय तक गठबंधन नहीं हो पाया और परिणाम इस रूप में आया कि फिलहाल दिल्ली में तिकोना मुकाबला तय हो गया है। पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में आप एक भी सीट पर नहीं जीत सकी थी, लेकिन कई सीटों पर वह दूसरे नंबर रही थी। इस बार वह मान कर चल रही है कि दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन करेगी।

बॉक्सर बिजेंद्र सिंह को कांग्रेस ने दक्षिण दिल्ली से उतारा
अब जबकि नामांकन दाखिल हो चुके हैं, यह देख लेना दिलचस्प होगा कि चुनावी दौड़ से किन खास चेहरों को बाहर होना पड़ा है और वे कौन से सेलेब्रिटीज हैं जिनके सहारे दोनों बड़े दल अपनी नैया पार लगाने की जुगत में लगे दिख रहे हैं। यद्यपि इन दोनों दलों ने अपने कुछ पुराने चेहरों शीला दीक्षित, हर्षवर्धन, रमेश बिधूड़ी, मीनाक्षी लेखी, मनोज तिवारी पर भरोसा जताया है, लेकिन कुछ सीटों के लिए उन्हें ऐसे चेहरे खोजने पड़े जिनके बल पर शायद चीजें उनके पक्ष में जा सकें। इनमें से एक हैं बाक्सर बिजेंद्र सिंह जिन्हें कांग्रेस ने दक्षिण दिल्ली से उतारा है। बिजेंद्र एक जाना-पहचाना नाम है और लोगों के बीच उनकी खास तरह की लोकप्रियता भी है। इसके पीछे उनका 2008 में बीजिंग ओलंपिक में ब्रॉंज मेडल जीतना था। इसके अलावा भी उनकी झोली में कई खिताब रहे हैं। यहां से भाजपा ने अपने पुराने सांसद रमश बिधूड़ी को ही फिर से टिकट दिया है। आप की ओर से राघव चड्ढा हैं।

उत्तर पश्चिम दिल्ली सीट पर भाजपा हंसराज हंस पर आजमाया दांव
इसके अलावा, उत्तर पश्चिम दिल्ली सीट पर भी भाजपा को प्रत्याशी तय करने में मुश्किल नजर आई। आखिरकार अंतिम समय पर एक प्रसिद्ध गायक हंसराज हंस पर पार्टी ने दांव आजमाया। इस सीट को लेकर पहले से इस तरह की चर्चाएं थीं कि यहां से दलित सांसद उदित राज का टिकट काटा जा सकता है। यह भी चर्चाएं थीं कि भाजपा हंसराज हंस को अपना उम्मीदवार बना सकती है। आखिर में यह दोनों हो गया। उदित राज का टिकट कट गया और हंस को टिकट दे दिया गया। इस तरह यह सीट भी एक तरह से सेलेब्रिटी हो गई। पूर्वी दिल्ली सीट भी एक तरह से एक अन्य सेलेब्रिटी की वजह से रोचक हो चुकी है। इसे भाजपा ने अपने प्रत्याशी क्रिकेटर गौतम गंभीर के जरिये चर्चाओं में ला दिया है। यहां से महेश गिरी पिछला चुनाव जीते थे। लेकिन इस बार पार्टी ने शायद उन्हें टिकट के लायक नहीं समझा। कहा जाता है कि क्षेत्र के लोगों में गिरी के प्रति बड़ी नाराजगी की वजह से उन्हें टिकट नहीं दिया गया। ऐसा स्थिति में भाजपा को ऐसे प्रत्याशी की तलाश थी जिसके माध्यम से जीत सुनिश्चित की जा सके और इस खोज में क्रिकेटर गौतम गंभीर पर भरोसा किया गया। हालांकि यह बहुत पहले से कहा जा रहा था कि गंभीर भाजपा में शामिल होंगे और उन्हें चुनाव लड़ाया जा सकता है। इस सीट पर उनका मुकाबला कांग्रेस के अरविंदर सिंह लवली और आम आदमी पार्टी की आतिशी के साथ होगा।

पूर्वी दिल्ली में गौतम गंभीर पर जताया भरोसा
दिल्ली में तीनों ही दलों के समक्ष बड़ी चुनौतियां हैं। भाजपा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपना पुराना इतिहास दोहराने की है। उसकी पूरी कोशिश इसी बात को लेकर होगी कि इस चुनाव में सभी सातों सीटों पर फिर से जीत दर्ज कर सके। कांग्रेस के समक्ष इससे भी बड़ी चुनौती यह हो सकती है कि क्या वह इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएगी क्योंकि 2014 में तीसरे स्थान पर पहुंच जाने से उसका प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। अगर इस बार उसे सीटें नहीं मिलीं, तो एक तरह से यह तो जाएगा कि दिल्ली में भी वह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की तरह तीसरी ताकत बन कर रह गई है। आप के समक्ष और भी बड़ी चुनौतियां हैं। उसने दिल्ली में भारी बहुमत से सरकार भले ही बनाई हो, पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट पर विजय नहीं मिली थी। यह अलग बात है कि कई सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार वह मानकर चल रही है कि अपने कार्यकाल में उसने दिल्ली में जितने काम किए हैं और जितने वादे पूरे किए हैं, उसका लाभ अवश्य मिलेगा। लेकिन कहीं न कहीं यह भी माना जा रहा है कि उसे अपेक्षित सफलता शायद ही मिल सके। इसी वजह से आप की लगातार यह कोशिश थी कि किसी तरह कांग्रेस के साथ समझौता हो जाए जो आखिर तक नहीं हो सका। भले ही आप की ओर से यह कहा जाता रहा हो कि वह भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन चाहती है। लेकिन राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा था कि अपनी पार्टी की कमजोर स्थिति को मजबूत करने के लिए उसे कांग्रेस के साथ की दरकार थी। लेकिन अब तो सब कुछ साफ हो चुका है और दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबला तय हो गया। अब यह देखना होगा कि दिल्ली का मतदाता इनमें से किसे और कितना तवज्जो देता है।
पढ़ें, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे जरूरी मसलों पर अलग-अलग पार्टियों का क्या नजरिया है?
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