कन्हैया है तो क्या, लड़ना होगा चुनाव, गिरिराज को मनाने कोई नहीं आया

पटना। अब ये तय हो गया है कि गिरिराज सिंह बेगूसराय से ही चुनाव लड़ेंगे। चुनाव मैदान से हटने की उनकी गुंजाइश ख़त्म हो गयी है। बीजेपी के किसी नेता ने उन्हें मनाया नहीं, किसी ने उन्हें समझाया नहीं। फिर भी, उन्हें बेगूसराय से चुनाव लड़ना होगा। कारण ये है कि चौकीदार अमित शाह ने एक ट्वीट कर कह दिया है कि गिरिराज सिंह बेगूसराय से ही लड़ेंगे।

कन्हैया है तो क्या, लड़ना होगा चुनाव, गिरिराज को मनाने कोई नहीं आया

उन्होंने शुभकामना भी दे दी है। इस ट्वीट के बाद गिरिराज सिंह की प्रतिक्रिया वही है कि वे कार्यकर्ता थे, हैं, रहेंगे यानी पार्टी जो कुछ कहेगी, वही वो करेंगे। गिरिराज सिंह को बीजेपी का फायरब्रांड नेता माना जाता है। वो बात-बात में विरोधियों को को पाकिस्तान चले जाने को कह देते रहे हैं। ऐसा अक्सर होता रहा है जब महीने में दो से तीन बार उनकी ज़ुबान फिसल जाती है या फिर उनके बयान को विवादस्पद या ज़हरीला बताया जाता है।

मगर, इस बार बेगूसराय में गिरिराज सिंह अपनी ही पार्टी पर गुस्सा दिखाते नज़र आए। चुनाव से पहले चुनाव का माहौल बनाने की उनकी ज़िम्मेदारी थी, इससे उलट वे चुनाव के वक्त ही ख़ामोश हो गये! वे रूठ गये। गिरिराज ने कहा कि वे चुनाव लड़ना ही नहीं चाहते। वे कहने लगे कि बीजेपी ने उनके स्वाभिमान को चोट पहुंचायी है। बिहार में किसी भी सांसद का सीट नहीं बदला गया है।

फिर अकेले उनका ही क्यों बदला गया? अगर बदला गया, तो पहले उनसे चर्चा क्यों नहीं की गयी? गिरिराजजी को अब मन मारकर चुनाव लड़ना पड़ेगा क्योंकि चर्चा अब भी उनसे किसी ने नहीं की है। बीजेपी अध्यक्ष सीधे ट्वीट कर आदेश सुना दिया है। इसकी वजह भी है। बीजेपी नेतृत्व जो बात गिरिराज सिंह को समझाना चाहती है वो ये कि वे जरा उन सांसदों के बारे में सोचें जिनकी सीट सहयोगी दलों को दे दी गयी। आप तो खुशनसीब हैं, एक उदाहरण हैं कि आपकी सीट सहयोगी दलों के पास जाने के बावजूद आपको किसी और सीट से चुनाव लड़ने को मिल रहा है।

अपमान की बात कही, तो बीजेपी ने उन्हें और कठोर शब्दों मे समझाना उचित समझा। गिरिराज सिंह क्यों नहीं सोचते कि क्या बीजेपी में उनके साथ हुआ कथित अपमान लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से भी ज्यादा है जिनसे कहा गया कि वे चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा करें? वे करिया मुंडा, कलराज मिश्र, बीसी खंडूरी और शांता कुमार को भी याद कर सकते हैं जिन्हें फोन पर कह दिया गया कि आप घोषणा कर दें कि नहीं लड़ेंगे लोकसभा का चुनाव।

वास्तव में गिरिराज सिंह ने चुनाव लड़ने से पहले ही हथियार डाल दिए। कन्हैया के नाम पर ही वे डर गये। 2014 के आम चुनाव में यही गिरिराज सिंह बेगूसराय से टिकट मांग रहे थे, नवादा में चुनाव लड़ने से बच रहे थे। इस बार भी उनकी मांग कुछ समय पहले तक यही थी। मगर, जैसे ही बेगूसराय से कन्हैया के चुनाव लड़ने की बात सुनी, उनके सुर बदल गये। कन्हैया से क्यों डर रहे हैं गिरिराज सिंह? बेगूसराय में भूमिहार वोटों की संख्या 5 लाख है।

गिरिराज सिंह और कन्हैया दोनों भूमिहार हैं। लिहाजा यह तय है कि कन्हैया बीजेपी के वोट काटेंगे। विगत 2014 के आम चुनाव में बेगूसराय से बीजेपी महज 60 हज़ार वोटों के अंतर से जीती थी। दूसरे नम्बर रहे तनवीर एक बार फिर महागठबंधन के उम्मीदवार हैं। त्रिकोणीय मुकाबले में भी गिरिराज सिंह को अगर डर लग रहा है तो यह रणनीति महागठबंधन की है जिसे वे भांप चुके हैं।

महागठबंधन चाहता था कि कन्हैया मैदान में आएं और गिरिराज सिंह को नुकसान पहुंचाएं। ताकि उनकी जीत का रास्ता आसान हो सके।
अब कन्हैया भी मजे ले रहे हैं। वे ट्वीट कर रहे हैं "बताइए, लोगों को ज़बरदस्ती पाकिस्तान भेजने वाले 'पाकिस्तान टूर एंड ट्रेवेल्स विभाग’ के वीज़ा-मंत्री जी नवादा से बेगूसराय भेजे जाने पर आहत हो गए हैं"। मंत्री जी ने तो कह दिया “बेगूसराय को वणक्कम”।

देशभक्ति की पिच और वो भी होम टाउन में गिरिराज सिंह दहाड़ नहीं पा रहे हैं। अपनी ही पार्टी से विरोध जताकर, विरोधियों को अपनी खिल्ली उड़ाने का मौका देकर गिरिराज सिंह अब जब चुनाव मैदान में उतरेंगे, तो जबरदस्ती स्कूल भेज दिए जाने वाले छात्र जैसी उनकी स्थिति होगी। स्कूल तो जाना ही होगा की तर्ज पर गिरिराज को चुनाव तो लड़ना ही होगा- ऐसा चौकीदार अमित शाह ने अपने ट्वीट पर साफ-साफ कह दिया है।

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