क्या कांग्रेस जातिगत जनगणना को मुद्दा बनाकर राहुल गांधी को बना सकेगी प्रधानमंत्री? आंकड़े दे रहे हैं गवाही

कांग्रेस इस समय अपने नेता राहुल गांधी के नए नारे 'जितनी आबादी, उतना हक' के दम पर चुनावी बिसात बिछाने में जुटी हुई है। आजादी के बाद से कांग्रेस के अबतक के इतिहास में पार्टी ने पिछड़ी जातियों की राजनीतिक को जितनी अहमियत कभी नहीं थी, वह सारी सीमाएं अभी पार कर रही है।

राहुल गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक समय में जात-पात को मिटाने का संकल्प आम सभाओं में दिलाती थीं। खुद राहुल भी कुछ समय पहले तक जाति के विषयों से कन्नी काटते नजर आते थे। लेकिन, आज राहुल के बदले राजनीतिक तेवर की वजह से जाति आधारित राजनीति के मामले में कांग्रेस जाति के आधार पर बनीं तमाम क्षेत्रीय पार्टियों को भी पीछे छोड़ती नजर आ रही है।

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कांग्रेस-विरोध से ही पैदा हुई हैं कई जाति-आधारित पार्टियां
अगर हम इतिहास में झांककर देखें तो जाति-आधारित जितनी भी क्षेत्रीय पार्टियां आज देश में हैं, उनकी बुनियाद कहीं ना कहीं कांग्रेस-विरोध पर ही पड़ी थी। चाहे 1960 और 1970 के दशक में लोहियावादी राजनीति का उत्थान हो या फिर 1980 के दशक के आखिरी वर्षों और 1990 के दशक की शुरुआत में हुई मंडल वाली पार्टियों का जन्म। इन सबकी राजनीति का कोर एजेंडा ही कांग्रेस का विरोध रहा है।

मुस्लिम-दलित और सवर्णों की राजनीति कांग्रेस का इतिहास
अगर तथ्य की बात करें तो देश में ओबीसी राजनीति की पैदाइश और ओबीसी आधारित क्षेत्रीय पार्टियों के जन्म में काका कालेलकर और मंडल आयोगों की रिपोर्ट पर कांग्रेस सरकारों के कुंडली मारकर बैठे रहने का बहुत बड़ा योगदान है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल तक कांग्रेसी राजनीति का आधार वोट बैंक देश के ज्यादातर हिस्सों में मुसलमान, दलित और ऊंची जातियों (खासकर ब्राह्मण) पर टिका हुआ था।

ओबीसी पार्टियों से हाथ मिलाने के बाद भी घटता गया कांग्रेस का जनाधार
2004 के लोकसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस की नीति में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला और उसने यूपीए में तमाम ऐसे दलों को जोड़ा, जिनका जन्म ओबीसी राजनीति की वजह से ही हुआ था। लेकिन, हकीकत ये है कि उसके बावजूद कांग्रेस के हाथ से पिछड़ी जातियों और खासकर अति-पिछड़ी जातियों का वोट बैंक फिसलता ही चला गया है।

भाजपा ने ओबीसी-ईबीसी वोट बैंक में लगाई है जबर्दस्त छलांग
यही नहीं, लोकनीति-सीएसडीएस की ओर से किए गए नेशनल इलेक्शन स्टडीज (NES)के आंकड़ों को देखें तो तथ्य ये है कि 2009 से लेकर 2019 तक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी-एमबीसी) वाले वोट बैंक में भाजपा ने जबर्सदस्त सेंध लगाई है। कांग्रेस ही नहीं, मंडल आधारित पार्टियों का वोट बैंक भी बुरी तरह से डगमगा चुका है।

10 वर्षों में दोगुना हुआ बीजेपी का ओबीसी वोट शेयर
अगर बड़ी ओबीसी जातियों के वोट शेयर को देखें तो कांग्रेस का वोट शेयर 2009 के मुकाबले 2019 में काफी घट गया है। वहीं क्षेत्रीय दलों को भी भारी नुकसान हुआ है। इसके ठीक उलट बीजेपी का ओबीसी वोट बैंक लगातार बढ़ता गया है और इन 10 वर्षों में करीब दो गुना हो चुका है।

अत्यंत पिछड़े वर्ग के वोट शेयर में कांग्रेस को भारी नुकसान, भाजपा को मिला बड़ा उछाल
वहीं अति-पिछड़ी जातियों के वोट शेयर के मामले में इन 10 वर्षों में कांग्रेस का वोट बैंक लगभग आधा रह गया है। वहीं क्षेत्रीय दलों का वोट बैंक भी भाजपा की तरह जोरदार तरीके से शिफ्ट होता नजर आ रहा है। जबकि, इन 10 वर्षों में अत्यंत-पिछड़ा वोट के मामले में बीजेपी का वोट शेयर दोगुना से भी ज्यादा बढ़ चुका है।

किधर गया पिछड़ी जातियों का वोट?

2009 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 43%
  • कांग्रेस: 23%
  • बीजेपी: 22%

2014 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 47
  • कांग्रेस: 14%
  • बीजेपी: 30%

2019 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 29
  • कांग्रेस: 15%
  • बीजेपी: 41%

किधर गया अति-पिछड़ी जातियों का वोट?

2009 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 30
  • कांग्रेस: 27%
  • बीजेपी: 22%

2014 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 33%
  • कांग्रेस: 16
  • बीजेपी: 43%

2019 लोकसभा चुनाव

  • क्षेत्रीय दल: 22%
  • कांग्रेस: 15
  • बीजेपी: 48%

(स्रोत-लोकनीति-सीएसडीएस)

यानी ओबीसी राजनीति के इतिहास में कांग्रेस का पिच बहुत ही कमोजर लग रहा है। राहुल गांधी वह नारा लगाने लगे हैं, जो बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की राजनीति का केंद्र हुआ करता था।

ऐसे में सिर्फ इस नारे के दम पर कांग्रेस बीजेपी से मुकाबले में उतरी है, जो पिछले दो लोकसभा चुनावों में से इस मामले में यूपी-बिहार और बाकी हिंदी भाषी राज्यों में मंडलवादी पार्टियों से न सिर्फ लोहा ले रही है, बल्कि उन्हें एक-एक सीटों के लिए तरसने की आदत डाल दी है।

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