Lok Sabha Election: ओडिशा में बीजेपी-बीजेडी गठबंधन दोनों के लिए मजबूरी क्यों है?
Lok Sabha Election News: करीब डेढ़ दशक बाद बीजू जनता दल (बीजेडी) के फिर से एनडीए में शामिल होने की चर्चा काफी तेज है। जानकारी के मुताबिक इस बाचतीच में बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व खुद शामिल है, इसलिए स्थानीय नेताओं के विरोध कोई खास मायने नहीं रख रहा है।
ओडिशा में लोकसभा चुनावों के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव भी होंगे। सवाल है कि राज्य में सत्ताधारी पार्टी बीजेडी और मुख्य विपक्षी बीजेपी को एकसाथ चुनाव लड़ने की नौबत क्यों आ गई है? इस गठबंधन से किसे ज्यादा फायदा होगा? इसके लिए पिछले एक दशक में वहां हुए कुल चार चुनावों का विश्लेषण करना होगा।

2009 में टूट गया था बीजेपी-बीजेडी गठबंधन
बीजेडी करीब 11 साल तक बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का हिस्सा रह चुका है। 2009 में नवीन पटनाटक की अगुवाई वाली पार्टी ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था। दोनों पार्टियां 1998, 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव के अलावा 2000 और 2004 में विधानसभा चुनाव एकसाथ लड़ चुके हैं।
बीजेडी-बीजेपी अलग क्यों हुए थे?
वह वो दौड़ था, जब बीजू जनता दल, भारतीय जनता पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी माना जाता था। लेकिन, 2009 में सीटों के बंटवारे पर ऐसा मन मुटाव हुआ कि दोनों पार्टियां अलग हो गईं।
इसकी वजह मुख्य तौर पर यह बताई गई कि बीजेडी ने भाजपा को सीट बंटवारे में लोकसभा में 9 की जगह 6 सीटें और विधानसभा चुनाव में 63 से घटाकर 40 सीटों को ऑफर दिया।
बताया गया कि बीजेडी का यह बर्ताव भाजपा नेतृत्व को नागवार गुजरा और उन्होंने सीएम नवीन पटनायक सरकार से समर्थन वापस ले लिया। जिसे बीजेडी ने 'विश्वासघात' करार दिया।
बीजेपी-बीजेडी के बीच गठबंधन क्यों है जरूरी?
इसके बाद तीन चुनावों यानी 2009, 2014 और 2019 में दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं। अगर पिछले दोनों चुनावों का विश्लेषण करें तो इस बात का अंदाजा लग सकता है कि बीजेडी-बीजेपी गठबंधन की चर्चा फिर से क्यों हो रही है। दरअसल, यह मौजूदा परिस्थितियों में दोनों ही दलों के लिए जरूरी लग रहा है।
2014 में बीजेडी को मिली थी बड़ी जीत
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की 21 लोकसभा सीटों में से 20 जीत लिया था और उसे 44.77% वोट मिले थे। जबकि, मोदी लहर के बावजूद भाजपा सिर्फ 1 सीट जीत पायी, अलबत्ता उसे 21.88% वोट जरूर मिले था।
वहीं साथ-साथ हुए विधानसभा चुनावों में तब बीजेडी का वोट शेयर 43.35% रहा था और उसने 147 सीटों में से 117 सीटें जीतकर शानदार सफलता दर्ज की थी। वहीं भाजपा को सिर्फ 10 सीटें मिल पायीं और वोट शेयर मात्र 17.99% रहा था।
लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा तेजी से बनने लगी पसंद
वोट शेयर को संकेत समझें तो भाजपा को ओडिशा के मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव के मुकाबले लोकसभा चुनाव में ज्यादा पसंद किया था।
2019 में के लोकसभा चुनावों में परिस्थितियां और तेजी बदल गईं। केंद्र के 5 साल के मोदी सरकार के कार्यकाल से प्रदेश में भाजपा का ग्राफ काफी तेजी से बढ़ा। पार्टी को न सिर्फ 8 सीटें मिलीं, बल्कि उसका वोट शेयर भी बढ़कर करीब 39% हो गया।
लोकसभा चुनावों में गिरने लगा बीजेडी का ग्राफ
लेकिन, पांच साल पहले के मुकाबले लोकसभा चुनाव में बीजू जनता दल का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। न सिर्फ उसकी सीटें घटकर 12 रह गईं, बल्कि उसका वोट शेयर भी घट कर करीब 43% पहुंच गया।
विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन सुधरा, लेकिन बीजेडी का दबदबा कायम रहा
वहीं, 2019 के ओडिशा विधानसभा में भाजपा के प्रदर्शन में सुधार हुआ, लेकिन वह सत्ता से काफी दूर रही। जबकि, बीजेडी का प्रदर्शन मिला-जुला रहा। उसकी सीटें 2014 के मुकाबले घट गईं, लेकिन वोट शेयर में मामूली बढ़ोतरी हो गई।
2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 23 सीटें मिलीं और उसका वोट शेयर 32.49% रहा। जबकि, बीजेडी को 112 सीटें मिलीं, लेकिन वोट शेयर करीब 45% हो गया।
ओडिशा के मतदाताओं के रुझान से गठबंधन का आधार तैयार
इन दो चुनावों में ओडिशा के मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि लोकसभा चुनाव में उनका झुकाव भाजपा की ओर बढ़ रहा है, जबकि प्रदेश स्तर पर बीजेडी की पकड़ लगातार मजबूत बनी हुई है।
भाजपा के लिए केंद्र की सत्ता जरूरी, पटनायक के लिए ओडिशा की कुर्सी मजबूरी
भाजपा को 'अबकी बार 400' पार का लक्ष्य पूरा करना है। इसमें ओडिशा की सभी 21 सीटों पर कब्जे के लिए उसके पास बीजेडी से हाथ मिलाने से अच्छा विकल्प क्या हो सकता है।
वहीं करीब 24 साल की एंटी-इंकंबेंसी के संभावित खतरे को 'गारंटी' के साथ दूर रखने के लिए बीजेडी को फिर से एनडीए में वापसी में क्या दिक्कत है। यूं भी राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दलों की लगातार अच्छी ट्यूनिंग रही है।
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