West UP में कंफ्यूजन में मुसलमान, नगीना-बिजनौर में बढ़ रही है बेचैनी, किस ओर जाएगा वोट?
UP Lok Sabha Chunav 2024 First Phase: उत्तर प्रदेश में पहले चरण में पश्चिमी यूपी की नगीना और बिजनौर लोकसभा दोनों ही सीटों पर भी चुनाव होने हैं। इन दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाता अच्छी खासी तादाद में है। लेकिन, इस बार उनके लिए ये तय करना मुश्किल है कि बीजेपी को हराने के लिए किस पार्टी को वोट दें।
2019 में बसपा-सपा का गठबंधन था और दोनों ही सीटें मायावती की पार्टी के खाते में गई थीं। दोनों ही सीटों पर दलितों की भी काफी जनसंख्या है और मुसलमानों की भी आबादी बड़ी है। लिहाजा, बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों का काम आसान हो गया था। लेकिन, इस बार वे बड़ी दुविधा में हैं।

बिजनौर-नगीना में कंफ्यूजन में मुसलमान
नगीना और बिजनौर में पहले चरण में 19 अप्रैल को चुनाव हो रहा है। बीएसपी के इंडिया ब्लॉक से अलग लड़ने से कांग्रेस और सपा से ज्यादा इस इलाके के मुस्लिम मतदाता परेशान नजर आ रहे हैं। ईटी ने स्थानीय मुस्लिम मतदाताओं के हवाले से एक रिपोर्ट दी है, उसमें चुनाव से ठीक पहले के उनका असमंजस सामने आ गया है।
बीजेपी को हराने लायक उम्मीदवारों को लेकर कंफ्यूजन
एक स्थानीय मतदाता नासिर हुसैन के मुताबिक, 'अगर बीएसपी गठबंधन में होती तो नगीना और बिजनौर के मुसलमान वोटरों में कोई कंफ्यूजन नहीं होता। 2019 से उलट मुस्लिम वोट लगातार उस संभावित उम्मीदवार की क्षमता को तोलने में लगे हैं, जो दोनों ही सीटों पर बीजेपी को हरा सकते हैं।'
नगीना में मुस्लिम वोट बंटना तय!
आमतौर पर माना जाता है कि मुसलमान बहुत ही ठोस रणनीति के तहत एकजुट होकर वोट करते हैं। लेकिन, लगता है कि इस बार दुविधा इतनी ज्यादा हो गई है कि यह परंपरा भी टूटती नजर आ रही है। मसलन, जाहिद नाम के एक व्यक्ति का कहना है कि नगीना सीट पर मुस्लिम वोटरों में आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार और भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद की लोकप्रियता बढ़ रही है।
उनका कहना है, 'मुझे यकीन है कि इस चुनाव में उन्हें मुस्लिम वोट का भी एक हिस्सा मिलेगा।' नगीना अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है। सपा ने यहा से पूर्व जिला जज मनोज कुमार को उतारा है। वहीं बीएसपी ने मौजूदा सांसद गिरीश चंद्र की जगह सुरेंद्र पाल सिंह को टिकट दिया है। वहीं बीजेपी ने नहटौर के अपने एमएलए ओम कुमार को उतारा है।
गैर-मुस्लिम मतदाताओं का रुख टटोल रहे हैं मुसलमान
कुल मिलाकर नगीना के मुसलमान मतदाता अभी भी यह समझने की कोशिश में हैं कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार को गैर-मुस्लिम वोटरों का समर्थन किस हद तक मिल रहा है।
मुमताज नाम के एक स्थानीय मतदाता ने बताया, 'हम सपा को वोट देते रहे हैं। लेकिन, बीजेपी ने ओबीसी और एमबीसी वोटरों में अपना जनाधार बढ़ा लिया है, जो कि पहले बसपा या सपा के साथ थे। इसलिए, अगर मुस्लिम वोटर सपा के पक्ष में ही एकजुट रहे तो इससे बीजेपी को गैर-मुस्लिम वोटरों के ध्रुवीकरण में मदद मिल जाएगी।'
बिजनौर में जातिगत समीकरणों के उलटफेर ने बढ़ाई उलझन
पड़ोस की बिजनौर सीट सामान्य श्रेणी की सीट है। यहां समाजवादी पार्टी ने नूरपुर के अपने विधायक राम अवतार सैनी के बेटे दीपक सैनी को टिकट दिया है। पार्टी की रणनीति है कि उसे दोनों सीटों पर सैनियों (ओबीस) का समर्थन मिलेगा। वहीं बसपा ने अपने स्थानीय सांसद मलूक नागर की जगह चौधरी बिजेंद्र सिंह पर दांव लगाया है, जो कि जाट हैं।
बीजेपी ने यह सीट अपनी नई सहयोगी आरएलडी को दी है, जिसने गुर्जर चेहरे चंदन चौहान को उतारा है। वहीं मलूक नागर भी अब जयंत चौधरी के आरएलडी में शामिल हो चुके हैं। उम्मीदवारों के इस नए जातिगत समीकरण ने इस सीट पर भी मुसलमानों की उलझन बढ़ा दी है।
बीएसपी के एक नेता राजेंद्र सिंह का कहना है, 'हम इस सीट पर दलित वोट को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। हमें मुसलमान वोट मिलने की भी उम्मीद है।'
बीजेपी को जातिगत समीकरण और लाभार्थी कार्ड का भरोसा
भाजपा खेमे को इन दोनों सीटों पर जातिगत समीकरणों के साथ-साथ लाभार्थी कार्ड चलने का पूरा भरोसा है। नगीना के एक बीजेपी नेता राकेश चौधरी ने कहा, 'नगीना और बिजनौर में राजनीतिक रूप से लाभार्थी हमारे लिए मायने रखते हैं। इससे बीजेपी को सभी जातियों से जुड़े रहने में मदद मिलती है, सामान्य वर्ग से लेकर ओबीसी, एमसीसी और अनुसूचित जातियों तक।'
भाजपा की उम्मीदों में 2014 वाला समीकरण भी जोड़ मार रहा है। तब भी सपा और बसपा इस बार की तरह ही अलग-अलग लड़ी थी और बीजेपी दोनों की सीटें जीत गई थी।












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