लैंसेट ने एंटिबायोटिक के भारत में इस्तेमाल को लेकर कही बड़ी बात, जानिए क्यों हैं यह खतरनाक
नई दिल्ली, 07 सितंबर। भारतीयों में एंटिबायोटिक दवा का अधिक इस्तेमाल को लेकर हालिया रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है। लैंसेट रीजनल हेस्थ साउथईस्ट एशिया की रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना काल में और कोरोना से पहले भारतीय लोगों में एजिथ्रोमाइसिन जैसी एंटिबॉयोटिक दवाओं का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकतर दवाएं जिनका इस्तेमाल किया जाता है उन्हें केंद्रीय ड्रग रेग्युलेटरी की ओर से अनुमति भी नहीं मिली है। यह अध्ययन 1 सितंबर के जर्नल में छपी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह अध्ययन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत में एंटिबायोटिक दवाओं के गलत इस्तेमाल एंटिबायोटिक प्रतिरोध में सबसे अहम है।

शोध में कहा गया है कि राज्य और केंद्र की एजेंसियों के बीच नियामक शक्तियों में मतभेद के चलते एंटिबायोटिक दवाओं की उपलब्धता, इसकी बिक्री और खपत मुश्किल हो जाती है। हालांकि भारत में एंटिबायोटिक दवाओं की खपर पर कैपिटा प्राइवेट सेक्टर खपत कई देशों की तुलना में कम है। भारत में बड़े स्तर पर एंटिबायोटिक का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन सही मायनों में इसका इस्तेमाल कम होना चाहिए। स्टडी में दिल्ली के पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आशना मेहता के योगदान को भी दर्शाया गया है।
शोध में कहा गया है कि हमने फार्मा कंपनियों के डेटा, प्राइवेट सेक्टर ड्रग की बिक्री का अध्ययन किया। इसमे 9000 सेल्स प्रतिनिधिनियों ने हिस्सा लिया। शोध में यह बात सामने आई कि 2019 में 5071 मिलियन डेली डोज का इस्तेमाल किया गया। यानि प्रति दिन 1000 लोगों पर 10.4 एंटिबायोटिक का इस्तेमाल किया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में एंटिबायोटिक के कुल 10100 यूनिक ब्रांड और 1098 फॉर्मुलेशन हैं। सबसे ज्यादा एंजिथ्रेमाइसिन दवा का इस्तेमाल किया जाता है।












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