मोदी की बुलेट ट्रेन पर राज ठाकरे के हमले की पीछे ये है असल वजह
महाराष्ट्र की राजनीति की बात करें तो कांग्रेस के हालात अच्छे नहीं हैं। शरद पवार की पार्टी एनसीपी कभी केंद्र सरकार के साथ दिखती है तो कभी विरोध में।
नई दिल्ली। मुंबई में एलफिंस्टन स्टेशन के ओवर ब्रिज पर मची भगदड़ को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है। इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अगर रेलवे ने यहां बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं किया, तो वह मुंबई में बुलेट ट्रेन का काम शुरू नहीं होने देंगे। ठाकरे ने साफ किया कि मोदी चाहे तो गुजरात में बुलेट ट्रेन चलाएं लेकिन मुंबई में बुलेट ट्रेन तभी चलेगा जब वो चाहेंगे। सवाल है अचानक राज ठाकरे में पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन को निशाना क्यों बनाया है? जानकारों के मुताबिर राजनीति में हाशिए पर चल रहे राज ठाकरे पीएम मोदी की खिलाफत कर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं।

राजनीति चमकाना चाहतें हैं राज ठाकरे
महाराष्ट्र की राजनीति की बात करें तो कांग्रेस के हालात अच्छे नहीं हैं। शरद पवार की पार्टी एनसीपी कभी केंद्र सरकार के साथ दिखती है तो कभी विरोध में। शिवसेना सरकार में रहकर ही सरकार का विरोध करती रहती है। ऐसे में मनसे चीफ राज ठाकरे को लग रहा है कि वो पीएम मोदी और बीजेपी का विरोध कर राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। संभव है कि राज लड़ाई तेज करते है तो अन्य विपक्षी दल राज के साथ आ जाए।

राज के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं
राज ठाकरे के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में करारी शिकस्त के साथ महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे और उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के लिए अस्तित्व का संकट आ गया है। ऐसे में राज को एक मुद्दा चाहिए जिससे में चर्चा में बने रहे। अपनी प्लानिंग के मुताबिक राज ठाकरे में पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन को निशाना बनाया है।

पुराने पैंतरे पर लौटी मनसे
पार्टी के मराठी राग ने सीमित किया दायरा राज ठाकरे ने साल 2006 में शिवसेना से अलग होकर जब मनसे की घोषणा की तभी से उनका राग सिर्फ मराठी ही था। महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों (खास कर उत्तर भारत के लोगों) के प्रति पार्टी का रवैया जगजाहिर है। मनसे के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने यूपी और बिहार के लोगों से काफी दुर्व्यवहार किया। धीरे-धीरे पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और राजनीतिक तौर पर प्रतिनिधित्व के मामले में पार्टी सिमटती गई। आलम यह हुआ कि पिछले चुनाव में बीएमसी में 28 सीटें जीतने वाली मनसे सात सीटों पर सिमट गई।

मनसे के अस्तित्व पर संकट
लगातार मिली हार और कम होती सीटों की वजह से मनसे के सामने अपने ही गढ़ में अस्तित्व का संकट आ गया है। पार्टी के अगुवा राज ठाकरे और उनके सहयोगियों ने राज्य में जिस तरह अपना वर्चस्व कायम करने के लिए कदम उठाए उससे कई बार सवाल उठे और आलोचना भी झेलनी पड़ी। पार्टी के लिए 2014 का चुनाव बेहद अहम था। पिछले चुनावों में शिवसेना और मनसे के करीब आने भी काफी चर्चा रही लेकिन यह गठबंधन नहीं हो सका और इसका पतन जारी रहा।












Click it and Unblock the Notifications