भारत में सूर्योदय से पहले ही क्यों दी जाती है फांसी, जानिए असली वजह?
नई दिल्ली। भारत में लंबे समय से फांसी सूर्योदय से पहले ही दी जाती है। लेकिन अकसर लोगों के दिमाग में ये सवाल उठता है कि आखिर फांसी सूर्योदय से पहले ही क्यों दी जाती है। ब्रिटिश राज के समय में भी सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही फांसी की सजा दी जाती थी। देश में आखिरी बार फांसी पुणे जेल में साल 2012 में हुई थी।
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आखिरी बार कसाब को मिली थी फांसी
उस वक्त आतंकवादी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया गया था। लेकिन आपको बता दें कि ऐसा केवल भारत में ही नहीं होता बल्कि दुनियाभर के सभी देशों में भी यही रिवाज है। वहां भी फांसी सुबह तड़के ही जाती है। भारत के जेल मैन्यूल में यूं तो फांसी के समय के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं हैं। इसमें भी यही कहा गया है कि फांसी सूर्योदय से पहले ही दी जानी चाहिए।

सूरज की पहली किरण निकलने से पहले
मतलब सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ये संपन्न हो जानी चाहिए। हालांकि मौसम के हिसाब से फांसी का समय सुबह बदल जाता है। जिसे तय करने का काम केंद्र और राज्य सरकारें करती हैं। सूर्योदय से पहले फांसी देने के पीछे की तीन वजह हैं, ये तीनों ही वजह प्रशासनिक, व्यवहारिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी हुई हैं।

इसलिए दिन में नहीं दी जाती फांसी
माना जाता है कि फांसी अगर दिन के दौरान दी जाए तो पूरी जेल का ध्यान इसी पर टिका रहता है। जिससे बचने की कोशिश हमेशा की जाती है। ताकि फांसी का असर जेल के अन्य कार्यों पर ना पड़े। और सारा काम सुचारू रूप से होता रहे। इसके अलावा फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण भी होता है। साथ ही कई तरह की कागजी कार्रवाई भी होती है। इस सब कामों में भी समय लग जाता है।

ये भी है एक कारण?
इसके पीछे का एक कारण ये भी है कि जिस शख्स को सुबह के समय फांसी दी जाती है, उस वक्त उसका मन ज्यादा शांत होता है। वो सुबह उठने के बाद फांसी देने पर शारीरिक तनाव भी महसूस नहीं करता है। इसके अलावा अगर दिन के समय उस शख्स को फांसी पर चढ़ाया जाए तो शारीरिक और मानसिक तनाव बिगड़ सकता है।

3 बजे उठता है अपराधी
जिसे फांसी दी जानी है, उसे सुबह 3 बजे उठकर अपने सभी काम फांसी से पहले निपटाने होते हैं। इस दौरान वह प्रार्थना कर सकता है या फिर सोच विचार कर सकता है। फांसी के बाद अपराधी के शव को उसके परिजनों को सौंप दिया जाता है। ताकि वह समय रहते दिन में ही उसका अंतिम संस्कार कर सकें।

सामाजिक पहलू भी है
इसके अलावा फांसी का सामाजिक पहलू ये भी है कि ये बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। इससे जेल के बाहर लोगों की भीड़ इकट्ठा होने का अंदेशा भी बना रहता है। जिस वजह से कोशिश की जाती है कि जब तक लोग उठें तब तक अपराधी को फांसी दे दी जाए। वहीं अगर इस सजा की तैयारियों की बात करें तो फांसी सी सजा देने के लिए तैयारियां करीब 15 दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। इसके लिए खास प्लैटफॉर्म तैयार किया जाता है, जो करीब चार फुट ऊंचा होता है।

जल्लाद अपराधी को फांसी देता है
इसी प्लैटफॉर्म से जल्लाद अपराधी को फांसी देता है। बताया जाता है कि जिस टी शेप खंबे से रस्सी का फंदा लटकाया जाता है, वो करीब 10 फीट ऊंचा होता है। फांसी के गर्दन में फंसते ही शरीर का पूरा वजन नीचे की ओर जाने लगता है। थोड़ी देर बाद सजायाफ्ता कैदी अचेत हो जाता है। सांस लेने की प्रक्रिया गला घुटने से बंद हो जाती है। माना जाता है कि फांसी लगने के बाद पांच मिनट से लेकर बीस मिनट के भीतर की मौत हो जाती है। जिसके बाद डॉक्टर ये जांच करके बताता है कि अपराधी की मौत हुई है या नहीं।
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