जानें रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजने के पीछे क्या है मकसद, आखिर क्यों लिया मोदी सरकार ने जोखिम
बेंगलुरु। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा के लिए नामित किया है। भारत के 46 वें मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई पिछले साल 17 नवंबर को पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनको राज्यसभा के लिए मनोनीत किए जाने के फैसले के पर सवाल उठ रहें हैं विपक्षी पार्टियों के नेताओं बल्कि कई पूर्व मंत्रियों, पूर्व जजों और संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं।

इन सवालों के पीछे गोगोई द्वारा चीफ जस्टिस के पद रहते हुए आयोध्या राम मंदिर और राफेल मामलों पर सुनाए गए फैसले हैं। तो आइए जानते हैं जब सरकार को पता था कि रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने पर विवाद होना निश्चित है तो वह इस फैसले पर आगे क्यों बढ़ी आखिर मोदी सरकार ने क्यों लिया इतना बड़ा जोखिम, गोगोई को राज्यसभा भेजने के पीछे क्या मकसद है?

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से मोदी सरकार भी आई थी लपेटे में
बता दें गोगोई वो ही न्यायाधीश हैं जिन्होंने देश के सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा बनाए रखने के लिए भी आवाज उठाई। 12 जनवरी 2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्य प्रणाली से नाराज गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य जजों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब सुप्रीम कोर्ट के जज एक साथ न्यायालय के आंतरिक मामलों को लेकर मीडिया के सामने सार्वजनिक रूप से आए थे। गोगोई ने न्यायाधीशों के साथ मिलकर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर पक्षपात के आरोप लगाए थे। इसके बाद रंजन गोगोई एक तरह से नायक बनकर सामने आए क्योंकि माना जा रहा था कि इसके बाद उन्हें चीफ जस्टिस बनने का मौका खो देगे। इतना ही नहीं इन चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस एक तरह से मोदी सरकार को लपेटे में लिया था और यह पीएम मोदी के आलोचकों के लिए एक तरह से हथियार साबित हुई। जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायर होते होने के बाद रंजन गोगोई ही देश के प्रधान न्यायाधीश बने।

गोगोई के फैसलों के कारण विपक्ष उठा रहा ये सवाल
चीफ जस्टिस नियुक्त किए जाने के बाद अपने रिटायरमेंट के पहले अयोध्या केस में राम मंदिर के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था इतना ही नहीं राफेल से जुड़े दो मामलों में उनकी अगुवाई में दिए गए फैसले मोदी सरकार के विपक्षियों को रास नहीं आए। इतना ही नहीं गोगोइर के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट बहुत ही कम या शायद ही किसी टिप्पणी या फैसले आए जिससे मोदी सरकार की परेशानी का सबब बने। ऐसे में उनका राज्यसभा में जाने पर विपक्षियों के सवालों के घेरे में आना लाजमी ही हैं। विरोधियों का कहना हैं कि इन्हीं का उपहार गोगोई को मिला है।

राज्यसभा में गोगाई को भेजने के पीछे ये मकसद
सूत्रों का कहना है कि राज्य सभा में मनोनीत सांसदों में विभिन्न फील्ड और प्रोफेशन के लोग हैं लेकिन कोई प्रसिद्ध न्यायधीश नहीं है गोगोई को इसीलिए लाया गया है क्योंकि वे मुख्य न्यायाधीश रहे है। देश के प्रसिद्ध और हमेशा चर्चा में रहने वाले न्यायविद हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत से महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए है जो सदा के लिए नाजीर बन चुके हैं। उनके आने से राज्यभा में बहस को नई धार मिलेगी और 'हाउस ऑफ़ ऐल्डर्स' को उनके अनुभवों का लाभ मिलेगा।

भाजपा कर रही ये टारगेट
वहीं भाजपा के नेता गोगोई के राज्यसभा में मनोनीत होने को असम में होने वाले चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं बता दें असम राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं। जस्टिस गोगोई जिस समुदाय से आते हैं उसका वहां उनका ख़ासा प्रभाव हैफ। इतना ही नहीं वो पूर्वोत्तर राज्य के पहले न्यायाधीस हैं जो न्यापालिका के सर्वोच्च पद पर पहुंचे। आपको याद हो तो भाजपा इससे पहले भूपेन्द्र हज़ारिका को भारत रत्न भी दे चुकी है। रंजन गोगोई ने दशकों से लंबित अयोध्या विवाद पर उनकी अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ के ने आयोध्या केस पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह फैसला राम मंदिर के हक़ में था। इस फैसले के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहा। इतना ही नहीं राम मंदिर के पक्ष में फैसला को सभी ने दिल से स्वीकारा।

कांग्रेस का ऐतरात जताना गलत हैं क्योंकि
जानकारों का कहना है कि कांग्रेस समेत मोदी सरकार के अन्य विपक्षियों को इस पर ऐतराज जताना बिलकुल गलत है। कांग्रेस ने बहरुल इस्लाम को पहले 1962-1972 दस साल तक राज्य सभा में रखा फिर हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाया था। इतना ही नहीं रिटायर होने पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज भी बनाया था। फिर उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया। इसी तरह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा को पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। फिर उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया। सरकारी सूत्रों का दावा हैं कि उन्होंने ही चौरासी के दंगों में कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट दी थी। कांग्रेस की कृपा दृष्टि चुनाव आयुक्तों पर भी रही। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एमएस गिल को राज्यसभा भेजा और केंद्रीय मंत्री तक बनाया। विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को बाद में कांग्रेस ने गांधीनगर से लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव भी लड़ाया था।

जानिए गोगोई के मनोनीत होने पर किसने किसने और क्या कहा
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा उनको (रंजन गोगोई) ईमानदारी से समझौता करने के लिए याद किया जाएगा'।
एआईएमआईएस प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पर हमला करते हुए कहा कि पूर्व सीजेआई वो खुद मना करें नहीं तो एक्सपोज हो जाएंगे। ओवैसी ने कहा, ''जस्टिस लोकुर ने जो कहा मैं उससे सहमत हूं। मैं सवाल उठा रहा हूं। न्यायालय पर सवाल उठते है। उनके फैसले से सरकार को लाभ हुआ है। वो खुद मना करें नही तो एक्सपोज हो जाएंगे। संविधान और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
इतना ही नहीं पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने बेहद कड़े शब्दों में हमला बोलते हुए कहा कि गोगई से बेशर्म और हल्का इंसान मैंने अपने करियर में नहीं देखा है। 40 साल के करियर के आधार पर कह सकता हूं कि ये आदमी बेहद घटिया है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने रंजन गोगोई पर तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि गोगोई ने ये ऑफर स्वीकार करके न्यायपालिका की ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है।
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