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मोदी सरकार ने दिया था बादल को देश का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान, जानिए पद्म विभूषण लौटाने के पीछे की सियासत

नई दिल्ली- तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों का विरोध-प्रदर्शन आज देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान की वापसी तक पहुंच गया। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर कहा है कि इस मसले पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के रवैए से वह इतने आहत हुए हैं कि उनके लिए किसानों के दुख-दर्द के सामने इस सम्मान का कोई महत्त्व नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि बुजुर्ग बादल को यह सम्मान मोदी सरकार ने ही दिया था और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें पिता की तरह का सम्मान देते आए हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि अवार्ड आपसी का यह पार्ट कितना किसानों के हित के लिए है और इसमें सियासत की चासनी कितनी लिपटी हुई है।

कृषि कानूनों पर अकाली दल अबतक

कृषि कानूनों पर अकाली दल अबतक

करीब ढाई महीने पहले तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल एनडीए से बाहर निकल चुका है और उसकी एकमात्र मंत्री हरसिमरत कौर बादल मोदी सरकार से इस्तीफा दे चुकी हैं। जबकि, उनके कैबिनेट में रहते हुए ही केंद्र सरकार ने इस साल जून में ही तीनों कानूनों से संबंधित अध्यादेश पास किया था, जिसमें हरसिमरत कौर भी भागीदार थीं। सितंबर में संसद से कृषि कानून पास होने के बाद से ही पंजाब के किसान वहां पटरियों पर बैठे हैं और रेल यातायात को ठप कर रखा है। लेकिन, अकाली दल के सबसे बड़े और बुजुर्ग नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने तब जाकर इन कथित किसान-विरोधी कानूनों के खिलाफ देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण लौटाने जैसा कदम उठाया है, जब करीब हफ्ते भर से दिल्ली के चारों ओर मुख्य रास्तों को किसानों ने घेर रखा है; पंजाब की राजनीति पूरी तरह से उबल रही है, जिसकी तपिश कनाडा-ऑस्ट्रेलिया तक में महसूस की जा रही है।

2022 के शुरू में होने हैं पंजाब विधानसभा चुनाव

2022 के शुरू में होने हैं पंजाब विधानसभा चुनाव

पंजाब में 2022 की शुरुआत में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए भाजपा से किसानों के मुद्दे पर अगल हो चुके शिरोमणि अकाली दल को इस आंदोलन में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से जरा भी कमतर नहीं दिखना है। अरविंद केजरीवाल को लगता है कि उनकी आम आदमी पार्टी के लिए यही मौका है, जब वह दिल्ली से बाहर अपनी जबर्दस्त मौजूदगी का एहसास करा सकें। इसलिए दूसरे कोरोना बम के फूटने के बावजूद दिल्ली की सीमाओं पर सोशल डिस्टेंसिंग की हो रही बंटाधार पर वह कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन पंजाब के किसानों के हितैषी हैं, यह जताने का वह कोई मौका नहीं चूक रहे। चाहे दिल्ली पुलिस के मांगने पर स्टेडियम देने से इनकार करना हो या फिर मोदी सरकार को लताड़ कर आंदोलनकारी किसानों के दिलो में अपने लिए सहानुभूति बटोरने की कोशिश, वह दांव पर दांव मार रहे हैं, जिससे कैप्टन अमरिंदर भी असहज हो चुके हैं।

किसानों के नाम पर घनघोर सियासत

किसानों के नाम पर घनघोर सियासत

उधर कृषि कानूनों पर शुरू से मुखर रहे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के सुर दिल्ली में आंदोलन की आग भड़कने के बाद थोड़े नरम महसूस होने के आरोप लगने शुरू हैं। जब गुरुवार को केंद्र सरकार और किसानों के प्रतिनिधियों की अहम बैठक होनी थी तो उससे पहले वह गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात कर लेते हैं। जाहिर है कि पंजाब के मुख्यमंत्री हैं तो वहां की कानून-व्यवस्था पर गृहमंत्री के साथ चर्चा करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन, पंजाब में गोटी सेट करने में लगे केजरीवाल इसपर संहेद पैदा करने का कई मौका नहीं छोड़ रहे। उनका आरोप है कि अमरिंदर के परिवार के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय ने केस कर रखा है, इसलिए वह भाजपा के दबाव में आ गए हैं। केजरीवाल अमरिंदर पर इसलिए भड़ास निकाल गए, क्योंकि दिल्ली सरकार ने तीन में से एक कृषि कानून को इसी दौरान नोटिफाई किया तो अमरिंदर ने उनको लपेटने में देर नहीं की। यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि जो कांग्रेस और पंजाब सरकार किसानों के आंदोलन को शुरू से हवा दे रही है और उनके प्रदर्शन का समर्थन कर रही है, वह पंजाब विधानसभा से इन कानूनों को खारिज भी करवा चुकी है। लेकिन, इसका जवाब उसके पास नहीं है कि फिर उसने विधानसभा से कृषि कानून अमान्य कराकर किसानों को कौन सी राहत दी थी। सौ बात की एक बात ये कि किसानों के मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियां सिर्फ राजनीति करती नजर आ रही हैं।

मेरे पास किसानों को देने के लिए कुछ भी नहीं- बादल

मेरे पास किसानों को देने के लिए कुछ भी नहीं- बादल

अब तक बादल के पद्म विभूषण पुरस्कार लौटाने की वजह शायद आपको साफ हो चुकी होगी। शिरोमणि अकाली दल को लग रहा है कि आंदोलन जितना तूल पकड़ चुका है, उससे 6 साल तक सत्ता की मलाई खाने के बाद कृषि अध्यादेशों का समर्थन करके उसी पर बने कानूनों का विरोध करके मोदी सरकार से बाहर हो जाने भर से काम नहीं चलने वाला। उसे कुछ और करके दिखाना होगा कि पंजाब के किसानों की असल हितैषी वही है। राष्ट्रपति को अवार्ड वापसी के साथ भेजी गई चिट्ठी में बुजुर्ग बादल ने जो कुछ लिखा है, उसका मतलब भी यही निकलता नजर आ रहा है। उन्होंने लिखा है- 'मैं इतना लाचार हूं किसानों पर न्योछावर करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है......मैं आज जो भी हूं उन्हीं की वजह से हूं, विशेषौतर पर साधारण किसानों के। आज जब वे इस सम्मान से ज्यादा कुछ गंवा चुके हैं, मुझे नहीं लगता कि मुझे पद्म विभूषण सम्मान रखना चाहिए।'

बादल ने किसानों के लिए किया इतना बड़ा त्याग!

बादल ने किसानों के लिए किया इतना बड़ा त्याग!

2017 के विधानसभा चुनाव में 'उड़ता पंजाब' का मुद्दा इस कदर हावी हुआ था कि बादल-बीजेपी की सरकार कांग्रेस के आगे मात खा गई थी। अबकी बार बीजेपी सभी 117 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारेगी, जो कि पहले सिर्फ 23 सीटों से ही काम चलाती थी। भले ही पंजाब में पार्टी उतनी मजबूत नहीं है, लेकिन उसका सांगठनिक ढांचा हर गली-कस्बे में मौजूद है। ऐसे में तीन-तीन विरोधी दलों के मुकाबले सबसे बड़ा किसानों का मसीहा दिखाने के लिए कुछ तो बड़ा मुद्दा होना चाहिए जो भावुक भी हो और लगे कि वाकई बादलों ने प्रदेश पर सिर्फ राज ही नहीं किया है, राज्य के लिए वह त्याग करना भी जानते हैं।

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