Ken-Betwa Protest: ‘चिता आंदोलन’ से गूंजा बुंदेलखंड,आखिर क्यों सड़कों पर उतरीं आदिवासी महिलाएं? क्या है मांग

Ken-Betwa Project Protest: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इन दिनों एक अनोखा विरोध आंदोलन चर्चा में है। बुंदेलखंड की प्यास बुझाने के लिए शुरू हुई देश की पहली नदी-जोड़ो परियोजना, 'केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट', अब एक बड़े विरोध और आक्रोश के केंद्र में है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित ढ़ोडन बांध के पास पिछले 10 दिनों से जो नजारा दिख रहा है, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें महिलाएं अपने बच्चों के साथ सांकेतिक चिताओं पर लेटी दिखाई दे रही हैं।

Chita Andolan Bundelkhand

बुजुर्ग कह रहे हैं कि अगर हमारी जमीन छीनी गई, तो हमें इसी मिट्टी में दफन कर देना। इस अनोखे और दर्दनाक विरोध को 'चिता आंदोलन' का नाम दिया गया है। इस विरोध ने एक बार फिर विकास बनाम अस्तित्व की बहस को केंद्र में ला खड़ा किया है।

Bundelkhand का 'चिता आंदोलन' क्या है और क्यों हो रहा है विरोध?

'चिता आंदोलन' एक प्रतीकात्मक (सिंबॉलिक) विरोध है, जिसमें प्रदर्शनकारी यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनकी स्थिति मौत से भी बदतर हो चुकी है। आदिवासी महिलाएं चिता पर लेटकर यह संदेश दे रही हैं कि अगर उनकी जमीन और जंगल छिन गए, तो उनके लिए जीना बेकार हो जाएगा।

स्थानीय महिलाओं का कहना है-हम अपनी आखिरी सांस तक इस परियोजना का विरोध करेंगे। हमारे जंगल, जमीन और भविष्य सब कुछ खतरे में है। इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने 'मिट्टी सत्याग्रह' भी किया, जिसमें उन्होंने अपने शरीर पर केन नदी की मिट्टी लगाकर यह जताया कि वे इस जमीन के असली मालिक हैं।

चिता आंदोलन कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं है आदिवासी महिलाओं का कहना है कि सरकार उन्हें जिस तरह से विस्थापित कर रही है, वह उनके लिए 'जीते जी मरने' जैसा है। 10 दिनों से डटे प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे अगला कदम 'सांकेतिक फांसी' के रूप में उठाएंगे।

What Is Ken-Betwa Project: समझिए क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना?

यह देश की पहली ऐसी परियोजना है जिसके तहत केन नदी के अतिरिक्त पानी को 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए बेतवा नदी में भेजा जाएगा। केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत 221 किमी लंबी नहर का निर्माण किया जाएगा जिसमें 77 मीटर ऊंचा ढोड़न बांध और 2 पावर हाउस बनेंगे। इसकी कुल लागत ₹44,605 करोड़ रुपये है जिसका उद्देश्य बुंदेलखंड के सूखे इलाकों की 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई करना।

इस प्रोजेक्ट से 103 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा। सरकार का दावा है कि इससे बुंदेलखंड के सूखे इलाकों को बड़ी राहत मिलेगी। सरकार का कहना है कि इसका सीधा फायदा लगभग 65 लाख लोगों को पीने का साफ पानी मिलेगा और 103 मेगावाट बिजली पैदा होगी। इस प्रोजेक्ट से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिले प्रभावित होने वाले हैं। जिसमें मध्य प्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ जैसे 9 जिले और उत्तर प्रदेश के झांसी, बांदा जैसे 4 जिले शामिल हैं।

आदिवासी क्यों कर रहे हैं विरोध?

विस्थापन का डर और अस्तित्व की लड़ाई पर फंसा हैं पेंच

परियोजना के कारण लगभग 24 गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और 10 गांव पूरी तरह पानी में डूब जाएंगे जिससे हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ेगा।। ढ़ोडन गांव के प्रभावित परिवारों को सरकार ने प्रति परिवार 12.5 लाख रुपये दिए हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि आज की महंगाई में यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। उनकी मांग इसे बढ़ाकर 25 लाख रुपये करने की है। आदिवासियों का तर्क है कि वे जंगलों और नदियों के भरोसे जीवित हैं। विस्थापन के बाद उनकी सदियों पुरानी संस्कृति, परंपराएं और सामुदायिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।

पर्यावरण पर भारी तबाही का खतरा

इस परियोजना का सबसे बड़ा असर पर्यावरण पर पड़ने की आशंका है। पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के लिए विश्व प्रसिद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक, इसमें करीब 23 लाख पेड़ों की कटाई होगी और 10,500 हेक्टेयर जंगल पानी में समा जाएगा, जिससे वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वन्यजीवों और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

विकास बनाम वजूद की जंग

केन-बेतवा लिंक परियोजना की नींव 25 दिसंबर 2024 को रखी थी। सरकार इसे बुंदेलखंड की भाग्यरेखा' मानती है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों के लिए यह उनके विनाश की इबारत है। आंदोलनकारियों का सवाल सीधा है क्या बुंदेलखंड का विकास हमारे वजूद की कीमत पर होगा?

Ken-Betwa Project पर क्या है सरकार का पक्ष: विकास की बड़ी तस्वीर

सरकार का कहना है कि यह परियोजना बुंदेलखंड के विकास के लिए बेहद जरूरी है। इस परियोजना के बन जाने के बाद बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित इलाकों को फायदा मिलेगा। जिसमें मध्य प्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी, रायसेन और उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी, ललितपुर समेत 13 जिले इसका लाभ लेंगे। कुल मिलाकर 65 लाख लोगों को इसका सीधा लाभ मिलने का दावा किया जा रहा है।

फिलहाल ढ़ोडन बांध पर तनाव की स्थिति बनी हुई है। प्रशासन बातचीत की कोशिश कर रहा है, लेकिन आदिवासी महिलाएं अपनी 'चिताओं' से हटने को तैयार नहीं हैं। यह आंदोलन अब केवल मुआवजे की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि अपनी माटी और संस्कृति को बचाने का 'धर्मयुद्ध' बन गया है।

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