क्या कर्नाटक में येदियुरप्पा के सामने नतमस्तक हो गया भाजपा नेतृत्व?
कर्नाटक बीजेपी में लिंगायतों के बड़े नेता और पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा का कद इतना बड़ा है कि पार्टी उससे बाहर ही नहीं आ पा रही है। पिछले शुक्रवार को जिस तरह से पार्टी ने युवा नेता और पहली बार के एमएलए बीवाई विजयेंद्र येदियुरप्पा को कई वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज करके पार्टी की कमान सौंपी है, उससे यह बात पूरी तरह से स्पष्ट होती लग रही है।
विजयेंद्र बीएस येदियुरप्पा के बेटे हैं। पार्टी दूसरे दलों में परिवार-आधारित राजनीत को लेकर सवाल उठाती है। लेकिन, पार्टी नेतृत्व का यह फैसला खुद उसे सवालों के घेरे में ला रहा है। क्योंकि, कर्नाटक भाजपा में बीवाई विजयेंद्र के मुकाबले कई सीनियर नेता भी मौजूद हैं।

कर्नाटक में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता पिछली पंक्ति में खिसके
बीजेपी नेतृत्व के इस फैसले के बाद एक तरह से 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के लिए विजयेंद्र ही पार्टी के चेहरा बनकर उभर सकते हैं। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस संभावना ने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को अंदर ही अंदर असहज कर दिया है।
कर्नाटक में विजयेंद्र को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपे जाने के बाद पूर्व सीएम बसवराज बोम्मई, पूर्व मंत्री मुरुगेश निरानी और वी सोमन्ना, पूर्व केंद्रीय मंत्री बसनगौड़ा पाटिल यतनाल, पूर्व राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवी और बाकी दिग्गज अचानक पिछली पंक्ति में खड़े कर दिए गए हैं। बीजेपी के ये सारे दिग्गज येदियुरप्पा के बेटे के मुकाबले उम्र और राजनीतिक अनुभव दोनों में बड़े हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के सामने खड़ी हो सकती है नई चुनौती
2024 के लोकसभा चुनावों से पहले कर्नाटक भाजपा में हुए इस बदलाव को लेकर पार्टी के अंदर से कई तरह की प्रक्रिया मिल रही हैं। जैसे पूर्व मंत्री कोटा श्रीनिवास पुजारी ने कहा है कि विजयेंद्र को चुनने का परिणाम लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ही दिखेगा। विजयेंद्र को अगर लिंगायत होने का फायदा मिला है तो बोम्मई, यतनाल और वी सोमन्ना इस बिरादरी में भी उनसे बड़े हैं। ये नेता खुलकर तो नहीं बोल रह हैं। लेकिन, कुछ को लगता है कि पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
हालांकि, खुद बीएस येदियुरप्पा दावा करते हैं कि उन्हें भी पता नहीं है कि लीडरशिप उनके बेटे को यह जिम्मेदारी देने की सोच रहा था। लेकिन, उनकी इस दलील से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या कम है। विजयेंद्र की ताजपोशी से नाखुश नेताओं का कहना है कि अगर येदियुरप्पा अपने किसी वफादार को इस पद के लिए चुनते तो दिक्कत नहीं थी, लेकिन बेटे को चुनना खराब उदाहरण बना है।
एक विश्लेषक ने कहा है कि 'अगर येदियुरप्पा की कुर्सी छोड़ने की नाराजगी के चलते पार्टी को 2023 के विधानसभा चुनाव में इतनी बुरी हार मिली तो इतने सारे नाराज नेताओं की सामूहिक नाराजगी से 2024 में पार्टी का क्या होगा?' एक सूत्र के मुताबिक यह चुनाव येदियुरप्पा और विजयेंद्र बनाम भाजपा के तमाम नाराज नेताओं के बीच हो सकता है।
बीएल संतोष पर भी भारी पड़े येदियुरप्पा?
कर्नाटक के लिए बीजेपी नेतृत्व ने जो कदम उठाया है, उससे यह भी लगता है कि येदियुरप्पा पार्टी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष पर भी भारी पड़े हैं। यह पद बीजेपी में उसके वैचारिक अगुवा संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सबसे बड़ा पद है।
संतोष भी कर्नाटक के ही रहने वाले हैं। माना जाता है कि जबसे भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में उन्हें यह जिम्मेदारी मिली है, वह पार्टी को वहां येदियुरप्पा और वीरशैव लिंगायत समुदाय के वर्चस्व से निकालने की कोशिश करते रहे हैं। इसकी वजह से यह बातें सामने आती रही हैं कि संतोष और येदियुरप्पा एक-दूसरे को पसंद नहीं करते। विधानसभा चुनावों में करारी हाल के पीछे भी इसे एक बड़ा कारण माना जाता है।
करीब दो महीने पहले संतोष ने बेंगलुरु में पार्टी की एक बड़ी बैठक बुलाई थी, जिसमें येदियुरप्पा और उनके बेटे शामिल नहीं हो सके थे। बाद में यह भी दावा किया गया था कि यह बैठक जानबूझकर ऐसे समय में की गई, जब पूर्व सीएम येदियुरप्पा पहले से निर्धारित किसी कार्यक्रम के लिए व्यस्त रहने वाले थे।
भाजपा के मुताबिक- विजयेंद्र अच्छी पसंद
हालांकि, राज्य में हुए नेतृत्व परिवर्तन को लेकर पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता महेश का कहना है, 'कोई नाराज नहीं है। राजनीति अंकगणित है, जेडीएस के हमारे सहयोगी होने के चलते वोक्कालिगा और अन्य समुदायों का समर्थन हमारे साथ है।' बीजेपी के एक नेता के मुताबिक, 'अनंत कुमार तब पार्टी अध्यक्ष बने थे, जब वे विजयेंद्र से भी छोटे थे। वे बीजेपी को 40 से 87 तक ले गए। उम्र और वरिष्ठता से मतलब नहीं है। जिस पार्टी को बनाने में अनंत कुमार ने मदद की, उसके चलते उनके विरोधी येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने। मौजूदा 'सत्ता की राजनीति' में विजयेंद्र अच्छी पसंद हैं।'












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