शास्त्रार्थ की प्रासंगिकता: क्या आज के दौर में संवाद ही एकमात्र समाधान है?
नई दिल्ली में शुक्रवार को "वर्तमान समय में शास्त्रार्थ की प्रासंगिकता" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आगाज हुआ। इस सेमिनार का आयोजन भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) और भारत बोध केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से इंडिया हैबिटेट सेंटर में किया गया है।

उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने शास्त्रार्थ को भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा बताया। उन्होंने कहा कि बौद्धिक बहस और संवाद की परंपरा ने भारतीय सभ्यता को गढ़ने और नए विचारों को जन्म देने में हमेशा से अहम भूमिका निभाई है।
सभा को संबोधित करते हुए गुप्ता ने इस बात पर चिंता जताई कि आज के सूचना प्रधान युग में लोगों के भीतर ध्यान से सुनने की क्षमता कम होती जा रही है, जो एक स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि विधानसभाओं में होने वाली चर्चाएं भी शास्त्रार्थ का ही आधुनिक रूप हैं, जहां गरिमापूर्ण और तथ्यों पर आधारित बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है और राष्ट्र निर्माण में मदद करती है। उन्होंने आगे कहा कि शास्त्रार्थ में हार भी एक तरह की जीत है, क्योंकि सार्थक संवाद के जरिए दोनों पक्षों के ज्ञान और समझ में बढ़ोतरी होती है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पांडेय ने कहा कि शास्त्रार्थ ने हमेशा विवाद के बजाय जिज्ञासा और स्वस्थ बौद्धिक विमर्श को बढ़ावा दिया है। उनके अनुसार, शास्त्रार्थ का असली मकसद विचारों को परिष्कृत करना और उन्हें नई ऊंचाइयों पर ले जाना है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शास्त्रार्थ का महत्व शास्त्रों के समान ही है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों को समझने और पढ़ने के नए रास्ते खोले हैं। सार्थक बहस के लिए उन्होंने ठोस तर्कों की जरूरत बताई और आज के दौर में भ्रामक तर्कों से बचने की सलाह दी।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे ICPR के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि यह संगोष्ठी शास्त्रार्थ की सार्थक परंपरा को एक नई दिशा देगी। उन्होंने ज्ञान के भारतीयकरण में इसके महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत में संवाद और चर्चा की एक समृद्ध विरासत रही है।
उन्होंने कहा, "ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक संवाद बेहद जरूरी है।" उन्होंने आगे जोड़ा कि शास्त्रार्थ किसी एक विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि तर्कशास्त्र, व्याकरण और साहित्य जैसे क्षेत्रों में इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। उन्होंने यह भी माना कि दुनिया भर के संघर्षों का सबसे अच्छा समाधान केवल संवाद ही है।
सेमिनार के संयोजक सिद्धेश्वर शुक्ला ने कहा कि भारतीय संस्कृति ने हमेशा सवाल पूछने और बौद्धिक खोज को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने बताया कि स्वस्थ बहस की यह परंपरा वैदिक साहित्य, उपनिषदों और भारतीय ज्ञान प्रणाली से जुड़े कई प्राचीन ग्रंथों में देखने को मिलती है।
डॉ. अमित यादव ने कहा कि शास्त्रार्थ जन कल्याण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह NEP 2020 के उस विजन के अनुरूप है, जो भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से दोबारा जुड़ने पर जोर देता है। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. योगिता शर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन देवेंद्र कुमार जाटव ने दिया। इस संगोष्ठी में कई तकनीकी सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें प्रमुख विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए और आज के समाज में शास्त्रार्थ की प्रासंगिकता पर विचार साझा किए।












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