Karnataka Congress: सरकारी खजाने से क्यों मिलेगी कांग्रेस वर्करों को सैलरी? नए विवाद में सिद्दारमैया सरकार

Karnataka Congress: कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस सरकार एक नए विवाद में घिर गई है। विपक्षी दल बीजेपी और जनता दल (सेक्युलर) ने आरोप लगाया है कि सिद्दारमैया सरकार राज्य के सरकारी खजाने से अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सैलरी देने की योजना बना रही है।

यह विवाद तब उठा जब सरकार ने विधानसभा में यह जानकारी दी कि 'गारंटी योजनाओं' को लागू कराने के लिए गठित की गई समितियों के सदस्यों को वेतन और बैठक भत्ता दिया जाएगा।

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Karnataka Congress Politics:सरकारी खजाने का राजनीतिक इस्तेमाल?

कर्नाटक सरकार ने 'गारंटी योजनाओं' की तामील के लिए कुल 38 पैनल बनाए गए हैं। इन पैनलों के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है, जबकि उपाध्यक्ष को जूनियर मंत्री का दर्जा मिला है। कुल मिलाकर इन समितियों में 4,000 से ज्यादा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सेट किए जाने की बात सामने आ रही है।

इन समितियों को राज्य, जिला और तालुका स्तर पर ऑफिस भी उपलब्ध करवाए जाएंगे। इन सब पर सरकारी खजाने पर करीब 60 करोड़ रुपए सालाना का अतिरिक्त बोझ बढ़ने की संभावना है।

Karnataka Congress News: बीजेपी-जेडीएस कर रही है जबरदस्त विरोध

विपक्षी दल भाजपा और जेडीएस ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि कांग्रेस सरकार अपने कार्यकर्ताओं को सरकारी धन के माध्यम से फायदा पहुंचा रही है।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर अशोक ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा,'क्या हमारे 224 एमएलए और प्रशासन इन योजनाओं को लागू करने में सक्षम नहीं हैं? कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को सरकारी धन से फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है। यह राज्य के खजाने का खुला दुरुपयोग है।'

Karnataka Congress Government:कांग्रेस सरकार बचाव में क्या कह रही है?

इस पूरे विवाद पर कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने जो सफाई दी है, वह और भी विवादास्पद लगता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी को 2023 के विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी और सरकार उन्हें इन पदों के माध्यम से सम्मानित कर रही है।

शिवकुमार ने यह भी कहा कि विपक्ष की मांग को कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा और यह विचार किया जाएगा कि क्या इन पैनलों के प्रमुख के रूप में विधायकों को शामिल किया जाए। हालांकि, उन्होंने इस योजना में तत्काल किसी बदलाव से इनकार कर दिया है।

Karnataka Congress: क्या यह सत्ता का दुरुपयोग नहीं है?

इस पूरे विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या सरकारी योजनाओं का लागू करने के लिए सत्ताधारी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देना उचित है? आमतौर पर सरकारी योजनाओं का संचालन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है।

लेकिन, कांग्रेस सरकार ने पार्टी कार्यकर्ताओं को इस प्रक्रिया में शामिल कर दिया है, जिसे विपक्ष ने सरकारी पैसों से राजनीतिक लाभ लेने की रणनीति करार दिया है।

यह पहला मौका नहीं है जब किसी सरकार पर राजनीतिक भर्तियों के आरोप लगे हैं। लेकिन इस मामले में सीधे तौर पर सरकारी धन का इस्तेमाल पार्टी कार्यकर्ताओं को वेतन देने के लिए किया जा रहा है, जिससे यह मामला गंभीर हो गया है।

कर्नाटक सरकार पहले ही दलितों और आदिवासियों के लिए निर्धारित फंड को अपनी पांच चुनावी गारंटियों के अमल के लिए डायवर्ट करने का आरोप झेल रही है। ऐसे में यह विवाद जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी पर और भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहा है।

अगर कांग्रेस सरकार अपनी योजना पर अड़ी रहती है तो यह विवाद अदालत तक भी पहुंच सकता है और वहां से बच निकलना सरकार के लिए आसान हो पाएगा यह बहुत बड़ा सवाल है।

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