Karnataka Congress: डीके शिवकुमार को हाथ लगाने से क्यों हिचक रहा कांग्रेस हाई कमान? पढ़िए 5 बड़ी वजह
Karnataka Congress: कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनने के दो साल पूरे होने को हैं और एक बार फिर से पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर उठापटक शुरू हो चुकी है। इस बार मुद्दा है - कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की कुर्सी।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खेमा चाहता है कि शिवकुमार कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ें, लेकिन हाई कमान इस पर कदम उठाने से हिचकिचा रहा है। आखिर कांग्रेस हाईकमान शिवकुमार को हाथ लगाने से क्यों बच रहा है?

DK Shivakumar Congress Karnataka: 1. 2023 की जीत में डीके शिवकुमार की निर्णायक भूमिका
2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर किया, तो उसमें डीके शिवकुमार की संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक कौशल की अहम भूमिका रही। चुनाव से पहले कांग्रेस में जबरदस्त गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असमंजस था।
ऐसे में शिवकुमार ने जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठित किया, फंडिंग से लेकर प्रचार तक सब कुछ संभाला। उनकी मेहनत और संसाधनों ने चुनावी रणनीति को धार दी, जिसका नतीजा था - कांग्रेस की सत्ता में वापसी।
कांग्रेस हाई कमान जानता है कि शिवकुमार की संगठन पर मजबूत पकड़ और चुनावी प्रबंधन क्षमता किसी भी संकट में पार्टी के लिए 'क्राइसिस मैनेजर' की भूमिका निभा सकती है। ऐसे नेता को अचानक किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
Karnataka Congress Power Struggle: 2. सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार - शक्ति संतुलन बनाए रखना जरूरी
कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री शिवकुमार के बीच शक्ति संघर्ष अब किसी से छिपा नहीं है। एक ओर सिद्धारमैया के पास अहिंदा (AHINDA-अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित) का बड़ा वोट बैंक है, तो दूसरी ओर शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय में जबरदस्त पकड़ रखते हैं। दोनों के अपने-अपने गुट हैं, जो संगठन और सरकार में प्रभाव रखते हैं।
ऐसे में अगर हाईकमान शिवकुमार को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाता है, तो शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। यह न सिर्फ सरकार को अस्थिर कर सकता है, बल्कि आगामी पंचायत और बीबीएमपी (BBMP) चुनावों में भी कांग्रेस को नुकसान हो सकता है।
Congress internal conflict Karnataka: 3. 'One Man One Post' का तर्क - लेकिन समय ठीक नहीं
सिद्धारमैया खेमे के मंत्री 'वन मैन, वन पोस्ट' नीति का हवाला देकर शिवकुमार को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व जानता है कि यह समय ऐसा कदम उठाने के लिए उपयुक्त नहीं है। जब स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक हों, तो किसी बड़े संगठनात्मक फेरबदल से परहेज करने में ही भलाई है।
पार्टी यह भी जानती है कि शिवकुमार अध्यक्ष पद से हटने को तैयार नहीं हैं, जब तक उन्हें मुख्यमंत्री बनने का आश्वासन न मिले। ऐसे में उन्हें हटाना एक नया सत्ता संघर्ष पैदा कर सकता है, जिससे पार्टी चुनावों में पूरा फोकस नहीं कर सकेगी।
Karnataka Congress: 4. डीके शिवकुमार की 'मसल पावर' और राजनीतिक नेटवर्क
कांग्रेस में लंबे समय से डीके शिवकुमार को 'muscle and money power' के प्रतीक के रूप में देखा जाता है - खासकर अहमद पटेल के निधन के बाद पार्टी की उनपर निर्भरता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। दिल्ली दरबार में उनकी पकड़, सीनियर नेताओं के साथ नेटवर्किंग और राजनीतिक सौदेबाजी में उनका अनुभव उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली यात्रा के दौरान भी उन्होंने हाईकमान को साफ तौर पर संदेश दिया है कि वो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद नहीं छोड़ेंगे। इससे एक बात और साफ हो गई - शिवकुमार पार्टी हाई कमान से न तो डरते हैं, न ही झुकने को तैयार दिख रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व भी जानता है कि ऐसे नेता को साथ लेकर चलने में ही समझदारी है।
Karnataka Congress: 5. हाईकमान नहीं चाहता कर्नाटक में कोई जोखिम
कर्नाटक कांग्रेस के लिए 'चुनावी गारंटियों' की एक 'सफलता की कहानी' बन चुका है। ऐसे समय में जब पार्टी को अन्य राज्यों में संगठनात्मक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और लगातार हार का मुंह देखना पड़ रहा है, कर्नाटक उसके लिए एक सकारात्मक उदाहरण है। इसीलिए हाईकमान यहां किसी तरह की अस्थिरता नहीं चाहता।
बीबीएमपी चुनाव और अन्य स्थानीय निकाय चुनाव पार्टी के लिए अहम हैं। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन से नाराजगी, बगावत या पार्टी में टूट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल यथास्थिति बनाए रखना चाहता है।
डीके शिवकुमार को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती हो सकता है, और फिलहाल हाईकमान इस खतरे को टालना चाहता है।
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