Kanwar Yatra: SC से राहत मिलने के बाद भी ढाबा मालिक क्यों नहीं हटाना चाहते नाम? इनसाइड स्टोरी

Kanwar Yatra Supreme Court order: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी प्रशासन के आदेश को पलटते हुए कांवड़ यात्रा रूट में ढाबा मालिकों या अन्य दुकानदारों को अपना और कर्मचारियों को नाम हटाने की छूट दे दी है। लेकिन, कई दुकानदार सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद उसे नजरअंदाज करना चाह रहे हैं।

ईटी ने एक रिपोर्ट दी है, जिसमें कई मुस्लिम दुकानदार दुकानों से नाम हटाने से पहले स्थानीय प्रशासन से निर्देश मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनमें से कुछ का कहना है कि हमारे लिए पहले तो प्रशासन ही है।

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प्रशासन ने कहा है, वही कहेगा तभी हटाएंगे- स्थानीय दुकानदार
मसलन, मुजफ्फरनगर के राणा चौक पर 'हैप्पी मोमेंट रॉयल कैफे' के मालिक मोहम्मद सलमान ने बताया, 'स्थानीय अधिकारियों ने हमसे नाम लगाने की गुजारिश की है। मुझे सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी है, लेकिन हमारे लिए स्थानीय प्रशासन सर्वोच्च है। जब तक वह हमसे नहीं कहता कि न लगाएं, हम कैसे हटा सकते हैं?'

'हमारा बिजनेस घट गया है, लोग नाम देखकर चले जाते हैं'
हालांकि सलमान का कहना है कि प्रशासनिक आदेश के बाद से उनका बिजनेस घटा है। उनके मुताबिक, 'दस दिन पहले 24 घंटे में मेरे कैफे का बिजनेस 15,000 रुपए था। पिछले 24 घंटों में हम सिर्फ 4,510 रुपए कमाए हैं। हम हाइजीन और सफाई के साथ हमेशा से खाना, चाय और स्नैक्स देते आए हैं। अब लोग नाम देखते हैं और चले जाते हैं।'

कुछ दुकानदार दूसरे दुकान मालिकों का कर रहे हैं इंतजार
सलमान की दुकान के बगल में ही 'मोहम्मद हादी टी स्टॉल' है। यह दुकान पहले 'फाइव स्टार कैंटीन' के नाम से चलती थी। यहां हिंदू या मुसलमान जो भी स्टाफ हैं, सबके नाम बोर्ड पर लगे हैं। हादी का कहना है, '30 फीसदी रह गया बस काम।' इनके ठीक बगल में 'शमीम शैफी टी शॉप' है, जो पहले 'डे नाइट कैफे' हुआ करता था। शैफी ने बताया, 'अगर सभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करेंगे, तो हम भी करेंगे।'

कांवड़ यात्रियों से मिली अलग-अलग प्रतिक्रिया
आगे बढ़ते हुए एक बालाजी कैंटीन मिली। जो देवराज कश्यप की है। कश्यप की खुशी का ठिकाना नहीं है, जिनकी कैंटीन में कस्टमर काफी बढ़ गए हैं। ज्यादातर कांवड़ यात्री हैं। इस दौरान मेरठ के एक कांवड़ यात्री प्रमोद गोस्वामी ने कहा, 'हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम कांवड़ यात्रा के दौरान मुस्लिम होटल का खाना न खाएं।'

वहीं पर दिल्ली के कालकाजी से आईं एक कांवड़ यात्री नैना गुप्ता अपने बेटे और बेटी के साथ वहां पहुंचीं। उन्होंने नहीं देखा कि उसका मालिक हिंदू है या मुसलमान। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि अगर उनकी अंतरात्मा उन्हें गलत करने की अनुमति देता है तो मैं उन्हें रोक नहीं सकती। मैं यहां पर एक साफ मन और पवित्र काम के लिए आई हूं।

फल बेचने वालों का धंधा भी हुआ है प्रभावित
इसी तरह मीनाक्षी चौक के पास फल बेचने वाले मोहम्मद तहसीन मिले। उन्होंने बताया कि '(फैसले का) थोड़ा फर्क पड़ा है।' उनका कहना है कि कुछ तो सिर्फ दाम पूछने आते हैं और चले जाते हैं।

कुछ लोग सरकार के फैसले से हैं चिंतित
इस पूरे विवाद पर पैगाम-ए-इंसानियत नाम के एक एनजीओ के प्रमुख आरिफ राही ने कहा, 'सरकार ने ऐसा कर दिया है, जैसे हम बाहरी हों। मान लीजिए मैंने श्रद्धालुओं को खिलाया और किसी को कोई दिक्कत हो गई। आप जानते हैं कि कैसी कहानियां बनेंगी।' यह वर्षों से कांवड़ यात्रियों के लिए कैंप लगाने का दावा करते हैं, लेकिन इस बार नहीं लगाएंगे।

उनके मुताबिक, 'सुप्रीम कोर्ट ने भले ही आदेश पलट दिया हो, लेकिन मुजफ्फरनगर को इस विभाजन से नुकसान होगा। मुझे इसकी चिंता है।'

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