JP Jayanti: इंदिरा गांधी की सत्ता हिलाने वाले जय प्रकाश नारायण के सहयोगी आज राजनीति में कहां हैं?
Jayaprakash Narayan Jayanti 2023: बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा में 11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी नेता जय प्रकाश नारायण भारतीय राजनीति के अमर नायक बन चुके हैं। बुधवार को देश उनकी 121वीं जयंती मना रहा है।
राजनीति में 'जेपी' के नाम से लोकप्रिय जय प्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी काफी योगदान दिया था। अंग्रेजों के शासन काल में 40 वर्ष की आयु में झारखंड की हजारीबाग जेल से 56 धोतियों के सहारे 17 फीट ऊंची दीवार फांदकर भाग निकलने के उनके किस्से आज भी आजादी के आंदोलन के इतिहास में अनमोल अक्षरों के रूप में दर्ज हैं।

इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती देने से बनी विशेष पहचान
तब जेपी अंग्रेजों के आंखों के ऐसे कांटे बन गए थे कि उनपर 10 हजार रुपए का इनाम और जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश तक जारी कर दिया गया था। लेकिन, भारत की मौजूदा राजनीति में जेपी की असली पहचान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती देने से कायम हुई है।
आजादी के बाद कांग्रेस-विरोधी विचारधारा पर चले
देश की आजादी तक वह कांग्रेस पार्टी की नीतियों के प्रति ही समर्पित रहे, लेकिन उसके तत्काल बाद उन्होंने कांग्रेस-विरोधी अभियान की शुरुआत कर दी थी। उन्होंने विनोबा भावे के बहुचर्चित भूदान आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर रखा था।
'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन की अगुवाई की
भारतीय राजनीति में जेपी के जिस किरदार की आज चर्चा की जाती है, वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ उनके 'संपूर्ण क्रांति' के आंदोलन पर आधारित है। जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी सरकार को चुनावों में धांधली का दोषी करार दिया था, तो उन्होंने इस आंदोलन का आगाज करने की ठान ली।
भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ था 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन
1974 में सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का विरोध 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन का आधार बना। इस आंदोलन का लक्ष्य सर्वोदय के विचार पर आधारित था, जो महात्मा गांधी के दर्शन पर टिका हुआ था। इसका अर्थ था- 'सबकी प्रगति'
जेपी आंदोलन से घबराकर ही इंदिरा ने लगाया था आपातकाल
इंदिरा गांधी कांग्रेस की सरकार की मुखिया थीं। जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से वह इतना घबरा गईं कि उन्होंने आजाद भारत के इतिहास में पहली और आखिरी बार देश पर 'आपातकाल' थोप दिया। समाजवादी विचारधारा से प्रभावित जय प्रकाश बाबू उस समय पूरे देश के विपक्ष की आवाज बन चुके थे।
जेपी आंदोलन से निकले छात्र नेताओं ने चख लिया सत्ता का स्वाद
वह देश भर के छात्रों के भी नेता हो चुके थे और यही वजह है कि जेपी आंदोलन छात्र आंदोलन भी बन गया था। एक तरह से आम जन भावना उनके साथ, उनके विचारों से जुड़ चुकी थी। जेपी आंदोलन का केंद्र बिहार था। लिहाजा बिहार के कई छात्र नेता इससे जुड़े थे।
जेपी आंदोलन से निकले नेता आज कहां हैं?
यूपी के भी उस दौर के युवा नेताओं को उसमें शामिल होने का मौका मिला। इस आंदोलन से निकलकर जो कुछ नेता देश में बड़े पदों पर पहुंचे, उनमें लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, सुशील कुमार मोदी, राम विलास पासवान जैसे राजनीति के धुरंधरों का नाम शामिल है।
जेपी आंदोलन का प्रभाव ऐसा था कि राजनीति में उनके अनुयायी आज भी उनका नाम लेने से कभी भी नहीं चूकते। लेकिन, तथ्य यह है कि मूल रूप से अधिनायकवादी भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ उनके आंदोलन से निकले कई नेताओं ने उनके नाम पर सियासत को तो खूब किया है, लेकिन खुद भ्रष्टाचार के सिरमौर बन गए हैं।
राजद सुप्रीमो लालू यादव भी जेपी आंदोलन से निकले ऐसे ही नेता हैं, जो चारा घोटाले के अनेकों मामलों में सजायाफ्ता मुजरिम हैं और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर जेल से बाहर घूम रहे हैं। उनका पूरा परिवार कई तरह के भ्रष्टाचार के मामलों में घिरा हुआ है। जबकि, मुलायम, पासवान, शरद यादव जैसे नेता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
नीतीश कुमार लगभग दो दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री पद पर काबिज हैं। उनकी सरकार में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। उनकी सरकार को उस कांग्रेस पार्टी का भी समर्थन हासिल है, जिसके भ्रष्ट आचरणों के खिलाफ जेपी जैसे सिद्धांतवादी और सत्ता से दूरी बनाकर चलने वाले नेता ने विरोध का डंका बजाया था।
शायद यही वजह है कि कई बार लोग कहते हैं कि जेपी आंदोलन से निकले कई नेताओं ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए उनका नाम तो खूब बेचा, लेकिन उनके विचारों से दूरी बना ली। एक और बड़ी बात ये है कि अभी 28 विपक्षी दलों का एक इंडिया ब्लॉक बना है, जिसमें कांग्रेस लीड रोल में आने की कोशिशों में लगी है और उसके साथ वह तमाम पार्टियां हैं, जो जेपी आंदोलन से पैदा हुई हैं।












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