राहुल गांधी का 'पप्पू' से परिपक्व नेता तक का सफर, धुर विरोधी भी हुए मुरीद

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    नई दिल्ली। कुछ ही दिनों में औपचारिक तौर पर कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में होगी। नेहरू-गांधी खानदान का एक और वारिस सबसे पुरानी पार्टी का रखवाला बनेगा। राहुल जिस कांग्रेस की कमान संभालने जा रहे हैं, उनकी भूमिका नेहरू-गांधी खानदान के किसी और अध्यक्ष के मुकाबले सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होगी। उन्हें विरासत में एक ऐसी पार्टी मिलेगी जो अपने निम्नतम स्तर पर है। राहुल गांधी की क्षमताओं पर विपक्ष तो सवाल उठाता ही रहा है, गैरराजनीतिक विश्लेषक भी उन्हें अब तक इस पद को संभालने लायक कतई नहीं समझते थे। लेकिन गुजरात चुनाव में राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी का प्रचार किया है, उससे उनकी छवि बड़ी तेजी से बदली है। मुख्य विपक्षी दल उनके तेवरों से अंदरखाने परेशान है और गैरराजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार भी राहुल वर्जन 2.0 में नई संभावनाएं देखने लगे हैं। कई बड़े अखबारों के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की फेसबुक पोस्ट भी कुछ ऐसा ही इशारा करती है।

    वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की पोस्ट

    वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की पोस्ट

    अपने बहुत से मित्रों की तरह हाल तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को मैं भी पप्पू मानता और लिखता रहा हूं। मेरा यह भी मानना रहा है कि भारतीय राजनीति में राहुल गांधी का कोई भविष्य नहीं है और उनके रहते कांग्रेस का भी कोई भविष्य नहीं है। मेरी दिली ख्वाहिश रही है कि कांग्रेस के भीतर कोई तो साहस जुटाए और राहुल-सोनिया के विरुद्ध बगावत का झंडा बुलंद करे। इन्दिरा गांधी की 1975 की इमरजेंसी, राजीव गांधी के दौर के सिख विरोधी दंगे और बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के खुलासे, नरसिंह राव के दौर की उदारीकरण ( मेरी नजर में बर्बादीकरण या उधारीकरण ) की नीतियों और मनमोहन सिंह के दौर के भ्रष्टाचार के खुलासों,आदि तमाम कारणों से मेरे मन में लंबे समय तक कांग्रेस के प्रति वितृष्णा और केवल वितृष्णा ही रही है। फिर पिछले कुछ महीनों में अचानक ऐसा क्या हुआ जिसने पहले मुझे राहुल से सहानुभूति रखनेवाला और फिर उनका समर्थक बना दिया। बहुत तलाशने पर भी कोई ठोस कारण मुझे समझ नहीं आते हैं। फिर भी कुछ तो है जिसने मुझ सरीखे घोर कांग्रेस और वंशवाद विरोधी को कांग्रेस और राहुल का मुखर समर्थक बना दिया।

    धुर विरोधी से ऐसे बने मुखर सर्मथक

    धुर विरोधी से ऐसे बने मुखर सर्मथक

    जो मोटे मोटे कारण मुझे समझ आते हैं उनमें एक राहुल की क्रमशः बढ़ती परिपक्वता भी हो सकता है। मुझे लगता है कि पिछले कुछ महीनों में राहुल राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व हुए हैं। उनके बयानों और आचार व्यवहार में पहले जैसा पप्पूपन लगभग गायब हो चला है। बंद कमरों की राजनीति करने वाले राहुल अब मैदान की राजनीति और लोगों की राजनीति करने लगे हैं। मुझे नहीं लगता कि नेहरू- गांधी वंश के किसी दूसरे सदस्य को खुद को स्थापित करने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़े होंगे जितने कि राहुल को बेलने पड़े हैं। और तो और, कांग्रेस के भीतर भी मां सोनिया और उनके कॉकस ने राहुल के साथ घोर अन्याय किया है। कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रिकार्ड 20 साल तक काबिज रहने और स्वास्थ्य बेहद खराब रहने के बाद भी सोनिया अपने बेटे के खातिर कुर्सी खाली करने में टाल मटोल करती रही हैं। इसका औचित्य मुझे किंचित भी समझ नहीं आता है।

    नीतीश, केजरीवाल से मोहभंग भी एक वजह

    नीतीश, केजरीवाल से मोहभंग भी एक वजह

    राहुल के प्रति मेरी सहानुभूति की एक वजह नीतीश कुमार और अरविन्द केजरीवाल से मोहभंग होना भी हैं। नीतीश कुमार में भाजपा विरोधी दलों की धुरी बनने की खासी संभावनाएं थीं, लेकिन भाजपा से दोबारा हाथ मिलाकर उन्होंने राजनीतिक तौर पर खुदकुशी कर ली है। अब उन पर केवल तरस खाया जा सकता है। केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ जो बरताव किया उसके बाद उनके प्रति भी मन में खटास भर गई है। हाल फिलहाल केजरीवाल का बड़बोलापन जरूर कम हुआ है, लेकिन मुझे नहीं लगता वह और उनकी पार्टी दिल्ली के बाहर पैर फैलाने की काबलियत रखती है।

    भ्रष्टाचारमुक्त सरकार के लिए नरेंद्र मोदी को बधाई

    भ्रष्टाचारमुक्त सरकार के लिए नरेंद्र मोदी को बधाई

    मुझे यह स्वीकार करने में किंचित भी संकोच नहीं है कि मैं नरेन्द्र मोदी और भाजपा का विरोधी था, हूं और रहूँगा। मुसलमानों के प्रति स्थायी वैर भाव रखने और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक माननेवाले नेता और पार्टी मेरे देश का भविष्य नहीं हो सकते। उनके झूठ की परतें दिनबदिन उघड़ रही हैं वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब देश की जनता उन्हें भी सत्ता से उखाड़ फेंकेगी। इस सबके बावजूद मोदी और उनकी सरकार को इस बात के लिए जरूर बधाई दूंगा कि उनका अब तक का कार्यकाल भ्रष्टाचार के किसी गंभीर आरोप से अछूता रहा है और कामना करूंगा कि सरकार की यह छवि बिगड़ने नहीं पाए। दीगर है कि लगभग पौने चार साल के उनके शासन में आम लोगों की दुश्वारियां बेइंतहा बढ़ी हैं।

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    English summary
    Journey of rahul gandhi to becoming a mature leader.

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