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जेएनयू छात्रों पर फ़ीस से ज़्यादा जुर्माने की मार

By Bbc Hindi

जुलाई की उमस भरी दोपहरी में दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के भीतर जाने वाली सड़क सुनसान-सी महसूस होती है.

गेट के भीतर प्रवेश करने पर सबसे पहले गंगा ढाबा की तरफ़ नज़रें जाती हैं. यह ढाबा खाने-पीने से ज़्यादा यहां देर रात तक चलने वाली बहस-मुद्दों-चर्चाओं के लिए जाना जाता है.

जेएनयू अपनी शिक्षा व्यवस्था के इतर यहां होने वाले विरोध प्रदर्शनों के लिए अलग पहचान रखता है. इस बात की तस्दीक जेएनयू में पढ़ने वाले छात्रों के अलावा वहां सवारी लेकर जाने वाले ऑटो ड्राइवर से लेकर कैम्पस के आस-पास रहने वाले आम लोग भी करते हैं.

विरोध प्रदर्शन जेएनयू की पहचान हैं. चाहे संस्थान के प्रशासनिक फ़ैसलों के ख़िलाफ़ हों, सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ या फिर समाज में घटी किसी भी घटना के ख़िलाफ़- जेएनयू के छात्र कई तरह के विरोध प्रदर्शनों में खुलकर हिस्सा लेते हैं.

जेएनयू के प्रशासनिक भवन की तरफ़ जाने वाली सीढ़ियां कई प्रदर्शनों की गवाह रह चुकी हैं. यहां की दीवारों पर क्रांतिकारी विचारों से जुड़े कई नारे लिखे हुए दिख जाते हैं.

लेकिन पिछले कुछ वक़्त से जेएनयू छात्रों के लिए इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेना महंगा साबित हो रहा है. महंगा इसलिए क्योंकि विरोध प्रदर्शनों के व्यापक रूप लेने पर यूनिवर्सिटी प्रशासन की तरफ से जांच कमेटी बैठाई जाती है, जिसमें दोषी पाए गए छात्रों पर कभी 5 हज़ार रुपए, 10 हज़ार रुपए तो कभी-कभी 15 हज़ार रुपए तक जुर्माना लगाया जाता है.

एक ही छात्र पर लगभग 50 से 60 हज़ार रुपए तक का जुर्माना लग चुका है.

फ़ीस बनाम जुर्माना

जेएनयू से इंटरनेशनल स्टडीज में पीएचडी कर रहे छात्र दिलीप कुमार पर हाल ही में जेएनयू प्रशासन ने 15 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया है.

दिलीप ने बीबीसी को बताया, ''मेरा हॉस्टल बदल दिया गया है, मैं पहले कावेरी हॉस्टल में था अब मुझे दामोदर हॉस्टल में जाने का आदेश मिला है. साथ में आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया है.''

दिलीप बताते हैं कि अभी तक अलग-अलग जुर्मानों के तहत वे लगभग 50 हज़ार रुपए भर चुके हैं, जबकि उनकी पढ़ाई की फ़ीस भी इतनी नहीं है. वे बताते हैं कि पीएचडी में नामांकन करने की फ़ीस महज 180 रुपए है.

इन फ़ैसलों पर बात करने के लिए बीबीसी ने जब जेएनयू की पीआरओ पूनम कुदसिया से संपर्क किया तो उन्होंने दीक्षांत समारोह की तैयारियों में व्यस्त होने की बात कही.

इसके बाद हमने चीफ़ प्रॉक्टर कौशल शर्मा के दफ़्तर में संपर्क किया तो बताया गया कि वे अभी जवाब देने के लिए मौजूद नहीं हैं. हालांकि बीबीसी ने छात्रों को मिले नोटिस को भी खंगाला और उनमें उन्हें लगाए गए जुर्मानों की वजह भी जाननी चाही.

प्रशासन की तरफ़ से दिलीप को मिली नोटिस की बात करें तो उसमें उन्हें हॉस्टल के वॉर्डन के साथ दुर्व्यवहार करने और हॉस्टल बदलने से संबंधित पुराने आदेशों को ना मानने के चलते यह जुर्माना लगाया गया है.

इन आरोपों के बारे में सवाल पूछे जाने पर दिलीप कहते हैं, "प्रशासन वाले हैं, वो तो कुछ न कुछ आरोप लगाएंगे ही."

दिलीप को मिली हॉस्टल ट्रांसफ़र नोटिस की कॉपी
BBC
दिलीप को मिली हॉस्टल ट्रांसफ़र नोटिस की कॉपी

पीड़ित छात्रों की व्यथा

पीएचडी के दूसरे वर्ष के छात्र धीरेंद्र कुमार पर भी अभी तक लगभग 60 हज़ार रुपए का जुर्माना लग चुका है. धीरेंद्र बताते हैं कि अभी भी उन्हें 10 हज़ार रुपए जुर्माने के तौर पर भरने बाकी हैं.

वो कहते हैं, ''मैंने मास्टर्स और उसके बाद एमफ़िल जेएनयू से ही किया है. सभी कोर्स पूरे करने में मेरे 40 से 50 हज़ार रुपए ख़र्च हुए जबकि जुर्माने के तौर पर मैं 60 हज़ार रुपए तक भर चुका हूं."

धीरेंद्र कहते हैं, "दिल्ली जैसे शहर में रहना और उसके बाद जुर्मानों का दबाव हमारे सामने मुश्किलें खड़ी कर देता है. या तो हम विरोध प्रदर्शन करना ही बंद कर दें या फिर जुर्माना भरते रहें."

यही कहानी पीएचडी के एक और छात्र मुलायम सिंह की भी है.

वो यूनाइटेड ओबीसी फ़ोरम के एक सक्रिय सदस्य हैं. उन्होंने पिछले साल एमफ़िल में वाइवा के आधार पर प्रवेश संबंधी नियम के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया.

उनके मुताबिक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की वजह से अब 10 हज़ार का जुर्माना लगा है.

मुलायम अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों में जुर्माने के तहत लगभग 40 हज़ार रुपए भर चुके हैं.

वो कहते हैं, ''कई बार मेरा हॉस्टल भी बदला गया, जिसकी वजह से मैं पूरी तरह पीएचडी पर फ़ोकस नहीं कर पाया. ये प्रशासन सोशल जस्टिस की आवाज़ को बंद करना चाहता है.''

मुलायम को 24 अप्रैल को मिले जुर्माने के नोटिस में लिखा गया है कि वो 24 मार्च 2017 को जेएनयू के नॉर्थ गेट में अवरोध करने के दोषी हैं, जिसकी वजह से इस गेट को 24 घंटे के लिए बंद करना पड़ा था.

उनका यह व्यवहार यूनिवर्सिटी नियमों के उल्लंघन के तहत आता है. नोटिस के अनुसार उन्होंने ट्रैफ़िक को जान-बूझकर रोकने की कोशिश की और कैम्पस सुरक्षा में बाधा उत्पन्न की.

फ़िलहाल ये सभी छात्र अपनी थीसिस पूरी करने में व्यस्त हैं. अगले कुछ दिनों में इन्हें पीएचडी पूरी करनी है.

मुलायम के मुताबिक, "अगर हम जुर्माने की रकम अदा नहीं करते हैं तो हमारी पीएचडी अटक सकती है."

मुलायम सिंह को मिले नोटिस की कॉपी
BBC
मुलायम सिंह को मिले नोटिस की कॉपी

फ़रवरी 2016 प्रदर्शन पर फ़ैसला

जेएनयू की एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी ने दो साल पहले साल 2016 में नौ फ़रवरी को हुए कथित भारत विरोधी प्रदर्शन पर फ़ैसला सुनाया है.

इस कमेटी ने सज़ा के तौर पर उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को निष्कासित करने का आदेश दिया है. उमर इस समय अपनी पीएचडी के अंतिम वर्ष में हैं जबकि अनिर्बान पहले ही पीएचडी जमा कर चुके हैं.

उमर खालिद ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोर्ट में जाने की बात कही है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि इस तरह के फ़ैसलों को नहीं माना जा सकता क्योंकि जिस आधार पर फ़ैसला लिया गया है वे वही पुराने आधार हैं जिन पर हमें ज़मानत मिल चुकी है.

वे कहते हैं, ''जेएनयू प्रशासन और मौजूदा सरकार मिलकर छात्रों को विरोध प्रदर्शन ना करने पर बाध्य कर रही है, वह चाहती है कि छात्रों की आवाज़ को इस तरह के जुर्मानों से दबा दिया जाए. फ़ैसले लेने का वक्त भी हमेशा जुलाई या दिसंबर का रखा जाता है क्योंकि इस वक्त हम अपनी थीसिस को अंतिम रूप दे रहे होते हैं, यह हमें परेशान करने का सबसे आसान ज़रिया होता है.''

उमर ख़ालिद
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उमर ख़ालिद

जेएनयू विरोध प्रदर्शन का गढ़

जेएनयू की मौजूदा छात्रसंघ अध्यक्ष गीता कुमारी कहती हैं कि जेएनयू में विरोध प्रदर्शनों की एक परंपरा रही है, यहां के छात्र हमेशा से ही सत्ता विरोधी प्रदर्शनों में आगे रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वक्त से छात्रों को इसमें हिस्सा लेने से रोकने की कोशिशें की जा रही हैं.

इसी साल मार्च के महीने में अपने ही एक प्रोफ़ेसर अतुल जौहरी के ख़िलाफ़ जेएनयू छात्र सड़कों पर थे, प्रोफ़ेसर जौहरी पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे और उनके ख़िलाफ़ कई दिनों तक एफ़आईआर दर्ज़ नहीं हुई थी.

जेएनयू को वामपंथी विचारधारा का गढ़ भी कहा जाता है, इसकी वजह यहां के छात्रसंघ चुनावों में अक्सर जीत वामपंथियो की ही होती रही है. हालांकि कभी कभार एनएसयूआई के छात्रों ने भी एक दो सीट पर जीत दर्ज़ की है, जबकि बरसों बाद पिछले छात्रसंघ चुनाव में एक सीट एबीवीपी को मिली थी.

जेएनयू
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जेएनयू

कहा जाता है कि दीवारों के कान होते हैं, लेकिन जेएनयू की दीवारें पर लिखे क्रांति के नारे अपनी आंख और ज़बान भी रखते हैं. ये दीवारें कई आंदोलनों की गवाही देते हैं.

शाम ढलते-ढलते जेएनयू से बाहर निकलते हुए कुछ देर पहले तक सुनसान पड़े गंगा ढाबा की पत्थरनुमा सीटों पर अब छात्र जमा होने लगते हैं, उनकी बातों में अपने कोर्स की चिंताएं हैं तो साथ ही साथ मुंबई की बारिश का ज़िक्र, ब्रेक्सिट पर बहस और जियो यूनिवर्सिटी पर हंसी मज़ाक भी शामिल है.

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