झारखंड में फेल प्रशांत किशोर ने अब छेड़ा बिहार का चुनावी राग,क्या महाराष्ट्र की तरह फिर तोड़ेंगे गठबंधन?
नई दिल्ली। झारखंड में फेल होने वाले प्रशांत किशोर ने अब बिहार चुनाव का राग छेड़ा है। प्रांत-प्रांत घूम कर दूसरे दलों को जिताने वाले प्रशांत किशोर ने झारखंड में जदयू के लिए क्या किया ? इस मास्टर प्लानर के रहते जदयू की झारखंड में शर्मनाक हार हुई। अब पीके के बयान से बिहार का गेम प्लान भी बिगड़ सकता है। सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर प्रशांत पहले से नीतीश के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। अब उन्होंने बिहार में सीट बंटवारे पर एकतरफा फार्मूला देकर विवाद की मंद पड़ चुकी आग को हवा दी है। चुनाव में अभी आठ महीने देर है । लेकिन जदयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने एकतरफा इस बात की घोषणा कर दी है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 102 सीटें ही दी जाएंगी। पिछले कुछ महीनों से उन्होंने भाजपा के खिलाफ टकराव का रास्ता अख्तियार कर लिया है। झारखंड चुनाव के बाद जदयू और भाजपा के नेता जहां बिहार में एकजुट हो कर चुनाव लड़ने की बात कह रहे थे वहीं प्रशांत किशोर गाड़ी को बेपटरी करने की कोशिश में हैं।

प्रशांत किशोर झारखंड में फेल
प्रशांत किशोर को झारखंड चुनाव में पहली बार स्टार प्रचारक बनाया गया था। वे पहली बार दोहरी भूमिका में थे। वे चुनावी रणनीतिकार तो थे ही पार्टी के उपाध्यक्ष होने के नाते दूसरे सबसे बड़े प्रचार भी थे। नीतीश कुमार प्रशांत किशोर को भविष्य का नेता बताते रहे हैं। इसलिए झारखंड चुनाव उनके लिए एक अग्निपरीक्षा थी। उन्हें एक नेता के रूप में अपनी योग्यता साबित करनी थी। झारखंड में जदयू ने 48 सीटों पर चुनाव लड़ा था। प्रशांत किशोर ने इसके लिए चार महीने पहले से तैयारी की थी। इलेक्शन के लिए जदयू ने 40 स्टार प्रचारकों की सूची बनायी थी तो उसमें नीतीश के बाद दूसरे स्थान पर प्रशांत किशोर का ही नाम था। इनके नाम के बाद ही सांसद ललन सिंह और आरसीपी सिंह को स्थान दिया गया था। नीतीश ने भाजपा के साथ विवाद टालने के लिए झारखंड में चुनाव प्रचार नहीं किया था। ऐसे में पार्टी के नेता नम्बर दो प्रशांत किशोर को अपनी क्षमता दिखानी चाहिए थी। लेकिन वे ऐसा कुछ भी नहीं कर सके जिसके लिए वो जाने जाते हैं। 48 सीटों में जदयू एक भी नहीं जीत पाया। उनकी ही सलाह पर झारखंड की कमान प्रमुख आदिवासी नेता सालखन मुर्मू को दी गयी थी। सालखन भाजपा के पूर्व सांसद भी रह चुके हैं। लेकिन पीके प्रदेश अध्यक्ष सालखन मुर्मू को भी नहीं जीता पाये। मझगांव सीट पर सालखन की दुर्गति हो गयी। वे बारहवें स्थान पर लुढ़क गये और सिर्फ 1889 वोट ही मिले।
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क्या महाराष्ट्र में भाजपा का गठबंधन PK ने तोड़ा ?
प्रशांत किशोर (पीके) की चुनावी रणनीति जीत की गारंटी नहीं है। पिछले कुछ समय से यह तथ्य स्थापित किया जा रहा है कि आधुनिक चुनाव प्रबंधन ही जीत का सबसे बड़ा आधार है। लेकिन ऐसा नहीं है। प्रशांत किशोर के खाते में अगर जीत है तो हार भी है। वे उत्तर प्रदेश में बुरी तरह नाकाम रहे थे। उनके रहते कांग्रेस की सबसे शर्मानक हार हुई। झारखंड में भी वे फेल हो गये। महाराष्ट्र में भी उन्होंने शिवसेना के लिए काम किया लेकिन उसकी सीटें पहले से कम हो गयीं। ये अलग बात है कि जोड़तोड़ से उद्धव ठाकरे सीएम बन गये लेकिन ये पीके की कामयाबी नहीं है। कहा तो यहां तक जाता है कि प्रशांत किशोर की वजह से महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूटा था। चर्चा के मुताबिक प्रशांत किशोर ने ही उद्धव ठाकरे को 50-50 के फारमूले पर अड़ने की सलाह दी थी। बाद में शिवसेना के सीएम की शर्त भी जोड़ दी थी। उनकी रणनीति के कारण ही चुनाव में दोनों दलों का कई सीटों पर तालमेल बिगड़ गया था जो हार का कारण बनी। तो क्या प्रशांत किशोर अब बिहार में भी गठबंधन तोड़ने वाली भूमिका में होंगे ?

बिहार के लिए क्या कहा प्रशांत किशोर ने ?
प्रशांत किशोर ने कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा 2010 की तर्ज पर होगा। 2010 का विधानसभा चुनाव भाजपा और जदयू ने मिल तो लड़ा था लेकिन दोनों के मन में तब बहुत खटास थी। चार महीना पहले ही नीतीश ने भाजपा के बड़े नेताओं का भोज कैंसिल कर दिया था। उस चुनाव में जदयू ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था और भाजपा ने 102 सीटों पर। जदयू को 141 में 115 तो भाजपा को 102 में से 91 पर जीत मिली थी। यानी पीके के मुताबिक 2020 के चुनाव में भाजपा को फिर 102 सीटें दी जाएंगी। लेकिन तब और अब में बहुत फर्क आ गया है। भाजपा अब अपने दम पर केन्द्र में मजबूत सरकार बना चुकी है। नरेन्द्र मोदी, नीतीश से बड़े नेता बन चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जदयू से एक अधिक सीटी थी। प्रशांत किशोर भी इस फर्क को जानते हैं लेकिन उन्होंने जानबूझ कर भाजपा को उकसाने के लिए ये बयान दिया है।












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