हिन्दू या मुस्लिम... किसका है अढ़ाई दिन का झोपड़ा? अब जैन समुदाय ने भी इस पर ठोका दावा, कहा- ये हमारा मंदिर

राजस्थान के अजमेर में स्थित ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह के पास स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' एक बार फिर से सुर्खियों में है। हिंदुओं के बाद अब जैन समाज ने भी इस पर अपना दावा ठोक दिया है।

हिन्दू समुदाय से जुड़े कुछ नेताओं का दावा रहा है कि यहां पर पहले एक संस्कृत विश्वविद्यालय था जिसे तोड़कर अढ़ाई दिन का झोपड़ा बनाया गया। अब जैन समाज के सुनील सागर महाराज ने जैन स्थल होने का दावा किया है।

Adhai Din Ka Jhonpra mosque

जैन समाज के अनुसार अढ़ाई दिन का झोपड़ा पूर्व में संस्कृत विद्यालय होने से भी पहले एक जैन मंदिर या स्थल था। मंगलवार को जैन समाज के आचार्य सुनील सागर महाराज फव्वारा सर्कल से दरगाह बाजार होते हुए अढ़ाई दिन का झोपड़ा पहुंचे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आचार्य सुनील सागर महाराज के साथ ससंघ 30 पिच्छियों (साधु-संतों) के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 से अधिक स्वयं सेवक तथा विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता भी थे।

जब ये लोग वहां पहुंचे तब स्थानीय मौलाना संग थोड़ा विवाद भी देखने को मिला। उनकी आपत्ति संतों को नग्न अवस्था में मस्जिद परिसर के अंदर प्रवेश करने को लेकर थी। जिस पर परिषद के कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। हाल की थोड़ी देर के बाद संत और परिषद के पदाधिकारी अंदर जाने में सफल हुए।

इसके बाद आचार्य ने ढाई दिन के झोपड़े का पूरा चक्कर लगाया। इसके बाद एक स्थान पर बैठे और संघ व साथ आए लोगों को संबोधित भी किया। उन्होंने कहा कि जो वस्तु जिसकी है उसे उसके अधिकार में होना चाहिए।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की वेबसाइट के अनुसार अढ़ाई दिन का झोपड़ा करीब 800 साल पुरानी मस्जिद है। जिसे दिल्ली सल्तनत के पहले सुल्तान कुतुब-उद-दीन-ऐबक ने 1199 ई. में बनवाया था। इसका इतिहास काफी विवादास्पद माना जाता है।

कहा जाता है कि अफगान शासक मोहम्मद गोरी ने जब 12वीं सदी में भारत पर हमला किया, तो उसने यहां संस्कृत विश्वविद्यालय को देखा था। उसी के आदेश पर उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने विश्वविद्यालय को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद बनवा दी थी।

कहा जाता है कि मोहम्मद गोरी ने इस मस्जिद को बनवाने के लिए अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को ढाई दिन का समय दिया था। ऐसे में मस्जिद को बनाने के लिए कारीगरों ने बिना रुके और बिना थके ढाई दिन तक काम किया। इस मस्जिद को हेरात के अबू बक्र ने तैयार किया था। इसी वजह से इस मस्जिद को 'अढाई दिन का झोपड़ा' कहा जाने लगा।

इतिहास के जानकार कुछ लोगों के मुताबिक यहां पहले जो संस्कृत विश्वविद्यालया था उसका निर्माण विग्रह राज चौहान चतुर्थ द्वारा किया गया था। तब इसका नाम सरस्वती कंठ भरण था।

अढ़ाई दिन के झोंपड़े के मुख्य द्वार के बायीं ओर संगमरमर का बना एक शिलालेख भी है, जिसपर संस्कृत में उस विद्यालय का जिक्र मिलता है। जानकारों के मुताबिक इस मस्जिद परिसर में हिंदू, इस्लामी और जैन वास्तुकला की मिलाजुली झलक देखने को मिलती है।

वहीं, जैन धर्म से जुड़े कुछ लोगों का ये दावा है कि अढ़ाई दिन का झोंपड़ा एक जैन मंदिर है और इसे 6वीं शताब्दी में सेठ वीरमदेव काला द्वारा बनवाया गया था।

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