सफल रहता IRNSS-1H सैटेलाइट का लॉन्च तो मिलते ये दस बड़े फायदे
ISRO launches IRNSS-1H carried by PSLV from Sriharikota Andhra Pradesh 10 facts
श्रीहरिकोटा। आन्ध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में नेविगेशन सैटेलाइट आईआरएनएसएस-1एच सतीश धवन स्पेस सेंटर से शाम को 7 बजे सैटेलाइट को लॉन्च किया गया। इसरो वैज्ञानिकों को बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन ये असफल रहा। इसरो के चैयरमैन ने बताया कि ये लॉन्च असफल रहा है। इस लॉन्च पर काफी निगाहें थीं और क्यों ये इसरो के लिए झटका है इसके लिए इस सेटेलाइट की दस बड़ी बातें जान जरूरी है।


प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी
- ऐसा पहली बार हुई जब प्राइवेट सेक्टर किसी सैटेलाइट को लॉन्च करने में सक्रिय रूप से शामिल रहा, इससे पहले प्राइवेट सेक्टर का किसी भी अंतरिक्ष अभियान में बहुत ही नाम मात्र की भूमिका होती थी।
- IRNSS-1H सैटेलाइट को बनाने में अल्फा डिजाइन टेक्नॉलजी की अगुआई में प्राइवेट कंपनियों का 25 फीसदी योगदान दिया है।
- 1425 किलो वजन की सैटेलाइट को सफलता से किया गया लॉन्च।
- आईआरएनएसएस यानि रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को पोलर सैटेलाइनट लॉच व्हीकल से लॉन्च किया गया। लॉन्च के बाद इसरो चैयरमेन ने इस लॉन्च को असफल बताया। इस तरह प्राइवेट सेक्टर की भागेदारी भी इसरो को रास नहीं आई।
- इसरो ने बताया था कि ये सैटेलाइट मौसम की काफी सटीक जानकारी देगा। इससे मछुआरों और नाविकों को होगा सीधा फायदा।
- मछुआरों को खराब मौसम, ऊंची लहरों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के पास पहुंचने से पहले सतर्क होने का संदेश देना आसान होगा।
- यह सेवा स्मार्टफोन पर एक सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन के द्वारा उपलब्ध होगी।
- सैटेलाइट अपनी लोकेशन बेस्ड सर्विस के जरिए आईआरएनएसएस रेलवे, सर्वे और दूसरी कई चीजों में काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। लॉन्च के असफल होने से इन तमाम उम्मीदों को भी झटका लगा है।
- 70 इंजीनियरों ने कड़ी मेहनत के बाद इस सैटेलाइट को तैयार किया।
- आईआरएनएसएस का पहला हिस्सा 1 जुलाई 2013 को लॉन्च किया गया था। इसका दूसरा हिस्सा अप्रैल 2018 में लॉन्च किया जाना है।

लॉन्च होता सफल तो ये मछुआरों को मिलता सीधा फायदा













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