शपथ ग्रहण में छाए रहे ‘ईश्वर’ और ‘हिन्दी’

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले कैबिनेट विस्तार में ‘ईश्वर' और ‘हिन्दी' छाए रहे। आज कुल जमा 21 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें चौधरी बीरेन्द्र सिंह को छोड़कर सभी ने ईश्वर के नाम पर मंत्री पद की शपथ ली। लोकसभा चुनावसे पहले कांग्रेस से भाजपा में आए बीरेन्द्र सिंह ने सत्य निष्ठा के नाम पर शपथ ली।

Mukhtar Abbas Naqvi

वहीं टीडीपी के कोटे से मंत्री बने वाई एस. चौधरी और पश्चिम बंगाल से लोकसभा में चुनकर आए बाबुल सुप्रियों ने अंग्रेजी में शपथ ली। बाबुल ने हालांकि हिन्दी के गायक रूप में नाम कमाया है।

साफा पहनकर आये राज्यवर्धन

राजस्थान से सांवर लाल जाट और कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर ने शपथ राजस्थानी साफा पहनकर ली। कैबिनेट में डा. महेश शर्मा और डा. राम शंकर कठेरिया के रूप में पेशेवर भी आए। वैसे राजीव प्रताप रूढ़ी पेशे से पायलट हैं। उन्हें राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मिला है।

कैबिनेट के दूसरे मुस्लिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी ने भी इर्शवर के नाम पर शपथ ली। साध्वी निरंजन ज्योति को कैबिनेट में जगह मिली। इसके साथ ही कैबिनेट में वह दूसरी साध्वी हो गई। उनसे पहले उमा भारती भी हैं।

इस कैबिनेट विस्तार में दल-बदलुओं का भी ख्याल रखा गया। बीरेन्द्र सिंह के अलावा राम कृपाल सिंह को भी जगह मिली। वह लोकसभा चुनाव से पहले लालू प्रसाद यादव की पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। इस बीच, कुछ जानकार कह रहे हैं कि मोदी दिल्ली से एक-दो और सांसदों को मंत्री पद दे सकते थे क्योंकि यहां पर कुछ समय के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

मुख्तार अब्बास नकवी को हल्का क्यों किया गया

इस बीच, कैबिनेट विस्तार पर वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने कहा किमंत्रिमंडल का विस्तार हर प्रधानमंत्री का अपना अधिकार है और यह भी वह किसे क्या मंत्रालय सौंपता है पर मुख्तार अब्बास नकवी को हल्का करने की कोशिश अखरी। उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया है जबकि वे अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए वन की सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा के हर संकट में वे काम आए और पार्टी का अकेला पढ़ा-लिखा संजीदा अल्पसंख्यक चेहरा है।

इसके विपरीत राजीव प्रताप रूड़ी की छवि साफ-सुथरी तो नहीं ही कही जा सकती। पर उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। ऐसे तमाम और मंत्री बने हैं जो अनाड़ी कहे जा सकते हैं। इस तुलना में नकवी अनुभवी और संजीदा तथा परिपक्व नेता हैं। पर क्या किया जा सकता है जब पूरा का पूरा आवा ही कच्चा निकल जाए। विपरीत बुद्घि वालों का ऐसा ही हश्र होता है। नकवी को विरोध तो दर्ज करना ही चाहिए। ऐसा भी क्या कि 'जात भी गँवाई और भात भी न खाया'।

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