'नई शिक्षा नीति 2020' पर RSS का कितना जोर ?
नई दिल्ली- कहा जा रहा है कि मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति देश के इतिहास में टर्निंग प्वाइंट साबित होने वाली है। यह भी माना जा रहा है कि भाजपा सरकार की नई शिक्षा नीति पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारों की गहरी छाप पड़ी है। नई शिक्षा नीति के लागू होते ही 36 साल पुरानी शिक्षा व्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। वामपंथी दल के कुछ नेताओं में भी नई शिक्षा नीति को लेकर खलबली मची हुई है। ऐसे में आइए समझने की कोशिश करते हैं कि क्या वाकई इसपर संघ का कुछ प्रभाव है। प्रभाव है तो कितना है; और क्या उससे देश की शिक्षा व्यवस्था का कुछ नुकसान होने वाला है या फिर ये राष्ट्रहित के लिए ठीक ही है।
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नई शिक्षा नीति पर संघ की मुहर
मोदी कैबिनेट से मुहर लगने के बाद कांग्रेस के जमाने के मानव संसाधन विकास का नजरिया संघ परिवार के 'चरित्र और राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षा' के विचारों की तरफ मुड़ने जा रहा है। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने नई शिक्षा नीति 2020 की खूब सराहना भी की है। इंडिया टुडे टीवी के मुताबिक मौजूदा मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और उनके पूर्व के एचआरडी मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर ने नई नीति को लेकर संघ से जुड़े संगठनों से लगातार चर्चा की है। इनके अलावा भाजपा-शासित प्रदेशों के शिक्षा मंत्रियों से भी वो संपर्क में रहे हैं। यही नहीं संघ के संगठनों ने नई शिक्षा नीति के दो ड्राफ्टिंग कमिटियों सुब्रमण्यम कमिटी और कस्तुरीरंगन कमिटियों को भी सुझाव दिए। इसके लिए भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और भारतीय भाषा मंच ने पहले 40 बड़े सेमिनार आयोजित करवाए जिसमें 6,000 शिक्षाविदों और शिक्षण संस्थानों के मालिकों से चर्चा करके फीडबैक जुटाए थे। ये सभी संघ से ही जुड़े संगठन हैं

मंत्रालय का नाम बदलने पर प्रभाव
राजीव गांधी सरकार ने पूर्व के सोवित संघ के विचारों से प्रभावित होकर इस मंत्रालय का नाम मानव संसाधन विकास किया था, तो नया नाम शिक्षा मंत्रालय तय करने में संघ की मुहर प्रभावी माना जा रहा है। क्योंकि भारतीय शिक्षण मंडल ने 2018 के सम्मेलन से ही नाम बदलने की बात को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी थी। उस सम्मेलन में तत्कालीन एचआरडी मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर के साथ खुद मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। तब कई वक्ताओं ने मंत्रालय का नाम बदलने की मांग की थी।

क्षेत्रीय भाषाओं और भारतीय मूल्यों को महत्त्व
नई शिक्षा नीति में संघ का सबसे ज्यादा प्रभाव मातृभाषा में शिक्षा के महत्त्व से देखा जा सकता है। आरएसएस के प्रचारक और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी के मुताबिक, '1984 में जो नई शिक्षा नीति बनी थी, उसमें एक बड़ी कमी थी। वह भारतीय मूल्यों से तालमेल नहीं खाती थी। प्रमुख राष्ट्रीय मूल्यों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया था और उन्हें सिर्फ एक्स्ट्रा-क्युरिकुलर एलिमेंट के रूप में जगह दी गई थी। यह बदलने जा रहा है। भारतीय मूल्यों, कला, भाषा और संस्कृति शिक्षा नीति 2020 में मुख्य तत्व बनने वाले हैं।' वो कहते हैं कि, 'नैतिक मूल्यों के बगैर कोई भी शिक्षा व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। नई नीति नैतिक मूल्यों पर बनेगी जो भारत में निहित है। शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों को सिर्फ मौलिक अधिकार ही नहीं, मौलिक कर्तव्य भी पढ़ाए जाएंगे, जो प्रचीन ग्रंथों और सांस्कृतिक प्रचलनों पर आधारित होंगे।' यही नहीं संस्कृत, पाली और प्राकृत जैसी भारतीय भाषाओं पर फिर से जोर को भी संघ अपनी एक उपलब्धि मान रहा है।

भारतीय ज्ञान पद्धति से प्रभावित
संघ से जुड़े लोगों को यह भी लगता है कि नई शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान पद्धति पर आधारित है। क्योंकि, उनका दावा रहा है कि पिछली शिक्षा नीति में एक साजिश के तहत इसे जानबूझकर छोड़ दिया गया था, जो कि हजारों वर्ष पुरानी है। कोठारी और संघ के दूसरे अधिकारियों का कहना है क्रिश्चियन मिशन और मदरसों को भी नई शिक्षा नीति जरूर अपनाना चाहिए। क्योंकि, एक पूर्ण शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों के विकास में भी सहायक होगा और भविष्य में उनके रोजगार में भी लाभकारी साबित होगा। हालांकि, इन संगठनों के लोगों को भी लगता है कि नई शिक्षा नीति का असर दिखने में समय लगेगा। उनका मानना है कि यह नीति उन तत्वों को किनारे कर देगी, जो पश्चिमी संस्कृति और वामपंथी विचारधारा के जरिए थोपी गई थी।

सिलेबस पर भी दिख सकता है असर
दिलचस्प बात ये है कि संघ का यह प्रभाव इतने ही पर नहीं खत्म होने वाला है। अब अलग-अलग स्तरों पर नए सिलेबस में सुधार की पहल भी शुरू कर दी गई है। कई संगठन इस काम में लग गए हैं कि सिलेबस से क्या हटाना है और उसमें क्या बातें फिर से जोड़नी हैं। कोठारी के मुताबिक, 'हमने नई शिक्षा नीति के लिए सुझावों की एक लंबी लिस्ट दी थी जिसे शामिल कर लिया गया और अब हम सिलेबस में बदलाव के लिए सुझाव देंगे, जिससे कि यह नई शिक्षा नीति ज्यादा सही तरीके से लागू हो सकेगी।' सूत्रों के मुताबिक इसके लिए काम पहले से शुरू है, जिसमें इतिहास के किताबों को भारतीय नजरिए से फिर से लिखने का काम भी शामिल है।

भारत और भारतीयता पर जोर
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा से भारत और भारतीयता की बात करता है। नई शिक्षा नीति में इस भावना का पूरा ख्याल रखने की कोशिश की गई है। ऐसे में संघ का गदगद होना स्वाभाविक है। आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत ने पिछले साल अगस्त में कहा था कि नई शिक्षा नीति ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्तियों को स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र बनाए और जिसकी जड़ें देश के संस्कार और संस्कृति में जमी हों। संघ हमेशा से इस बात की वकालत करता रहा है कि शिक्षा नीति ऐसी होनी चाहिए कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्ग को यह सहजता के साथ अपने साथ लेकर चल सके और उनका ड्रॉपआउट रेट कम हो जाए। संघ ने हमेशा से शिक्षा में लचीलेपन पर जोर दिया है, जिससे शिक्षा भी मिले और भविष्य में रोजगार भी मिले। यही वजह है कि अब संघ नेशनल रिसर्च फाउंडेशन और प्रधानमंत्री की अगुवाई वाले राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना का भी स्वागत कर रहा है।

कुछ मुद्दों पर सरकार को हुई मुश्किल
नई शिक्षा नीति में कुछ विषय ऐसे भी शामिल किए गए हैं, जो संघ को पसंद नहीं हैं। इसलिए सरकार ने उसे बहुत ही समझदारी से या तो उसका कुछ हिस्सा शामिल किया है या उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज ही कर दिया है। थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले में हिंदी को 6ठी क्लास से एक भाषा के तौर पर अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने की मांग थी। लेकिन, कुछ राज्यों के विरोध को देखते हुए केंद्र ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। स्वदेशी जागरण मंच ने विदेशी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के आने का विरोध किया था। लेकिन, केंद्र सरकार ने उन्हें आने की इजाजत तो दी है, लेकिन शर्त यह लगाई है कि उन्हें नई शिक्षा नीति के आधार पर ही चलना पड़ेगा। वैसे वामपंथी नेताओं ने नई शिक्षा नीति की यह कहकर आलोचना की है कि इसके जरिए संघ का एजेंडा चलाया गया है और शिक्षा व्यवस्था के भगवाकरण की कोशिश की गई है। लेकिन, प्रकाश जावड़ेकर ने उनपर ये कहकर पलटवार किया है कि क्या शिक्षा में वह चीजें नहीं शामिल की जानी चाहिए, जिससे राष्ट्र को फायदा हो।
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