यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता लागू करना क्या भारत में संभव है?
शादी, तलाक़, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में भारत में विभिन्न समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग क़ानून हैं.
हालांकि, देश की आज़ादी के बाद से समान नागरिक संहिता या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) की मांग चलती रही है. इसके तहत इकलौता क़ानून होगा जिसमें किसी धर्म, लिंग और लैंगिक झुकाव की परवाह नहीं की जाएगी. यहां तक कि संविधान कहता है कि राष्ट्र को अपने नागरिकों को ऐसे क़ानून मुहैया कराने के 'प्रयास' करने चाहिए.
लेकिन एक समान क़ानून की आलोचना देश का हिंदू बहुसंख्यक और मुस्लिम अल्पसंख्यक दोनों समाज करते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के शब्दों में कहें तो यह एक 'डेड लेटर' है.
पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार इस विचार को वापस उठा रही है. बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश UCC पर चर्चा कर रहे हैं.
अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर का निर्माण करना, कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करना और UCC को लागू करना बीजेपी के चुनावी वादों में से एक रहे हैं. अयोध्या में मंदिर का निर्माण जारी है और कश्मीर से उसकी स्वायत्तता को छीन लिया गया है तो अब चर्चा UCC पर है.
दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठन समान नागरिक संहिता की मांग मुस्लिम पर्सनल लॉ के कथित 'पिछड़े' क़ानूनों का हवाला देकर उठाते रहे हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तीन तलाक़ वैध था जिसके तहत मुसलमान तुरंत तलाक़ दे सकते थे लेकिन मोदी सरकार ने साल 2019 में इसे आपराधिक बना दिया.
बीजेपी का चुनावी घोषणा पत्र कहता है कि 'जब तक भारत समान नागरिक संहिता नहीं अपना लेता है तब तक लैंगिक समानता नहीं हो सकती है.'
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक आसिम अली का मानना है कि 'असलियत बहुत ज़्यादा जटिल है.'
दूसरे शब्दों में कहें तो UCC बनाने के विचार ने उस पिटारे को खोल दिया है जिसके देश के हिंदू बहुमत के लिए भी अनपेक्षित नतीजे होंगे जिसका प्रतिनिधित्व करने का दावा बीजेपी करती है.
आसिम अली कहते हैं, "UCC मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं की सामाजिक ज़िंदगी को प्रभावित करेगी."
भारत में समान नागरिक संहिता लागू करना कठिन क्यों
भारत जैसे बेहद विविध और विशाल देश में समान नागरिक क़ानून को एकीकृत करना बेहद मुश्किल है.
उदाहरण के तौर पर देखें तो हिंदू भले ही व्यक्तिगत क़ानूनों का पालन करते हैं लेकिन वो विभिन्न राज्यों में विभिन्न समुदायों की प्रथाओं और रीति-रिवाजों को भी मानते हैं.
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दूसरी ओर मुस्लिम पर्सनल लॉ भी पूरी तरह सभी मुसलमानों के लिए समान नहीं हैं. उदाहरण के तौर पर देखें तो कुछ बोहरा मुसलमान उत्तराधिकार के मामले में हिंदू क़ानूनों के सिद्धांतों का पालन करते हैं.
वहीं संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क़ानून हैं. पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों जैसे कि नागालैंड और मिज़ोरम में अपने पर्सनल लॉ हैं और वहां पर अपनी प्रथाओं का पालन होता है न कि धर्म का.
गोवा में 1867 का समान नागरिक क़ानून है जो कि उसके सभी समुदायों पर लागू होता है लेकिन कैथोलिक ईसाइयों और दूसरे समुदायों के लिए अलग नियम हैं. जैसे कि केवल गोवा में ही हिंदू दो शादियां कर सकते हैं.
भारत में समान नागरिक संहिता केंद्रीय और राज्य सरकारों की आम रुचि का मुद्दा रहा है. साल 1970 से राज्य अपने ख़ुद के क़ानून बना रहे हैं.
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कई सालों के बाद साल 2005 में एक संशोधन किया गया जिसके बाद मौजूदा केंद्रीय हिंदू व्यक्तिगत कानून में बेटियों को पूर्वजों की संपत्ति में बेटों के बराबर हक़ दिया गया. कम से कम पांच राज्यों ने इसे सक्षम करने के लिए अपने क़ानूनों में पहले ही बदलाव कर दिया था.
अब सोचिए कि किस तरह से पर्सनल लॉ अलग-अलग मामलों में अलग-अलग दिखते हैं.
बच्चा गोद लेने के मामले में अलग
अगर गोद लेने का मामला देखें तो हिंदू परंपरा के मुताबिक़ धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक दोनों उद्देश्यों के लिए किसी को गोद लिया जा सकता है क्योंकि संपत्ति का वारिस एक पुरुष हो सकता है और परिजनों का अंतिम संस्कार पुरुष ही कर सकता है.
दूसरी ओर इस्लामी क़ानून में गोद लेने को मान्यता नहीं दी जाती है लेकिन भारत में एक धर्मनिरपेक्ष 'जुवेनाइल जस्टिस' लॉ है जो नागरिकों को धर्म की परवाह किए बग़ैर नागरिकों को गोद लेने की अनुमति देता है.
इसके साथ ही विशेषज्ञों इस बात को लेकर भी हैरत जताते हैं कि अगर एक कॉमन लॉ हुआ तो गोद लेन के लिए नियम बनाते हुए क्या तटस्थ सिद्धांत होंगे?
बेंगलुरु स्थित एक स्वतंत्र क़ानूनी नीति सलाहकार समूह विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के फ़ेलो आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं, "आप कौन-सा सिद्धांत लागू करेंगे- हिंदू, मुस्लिम या फिर ईसाई?"
वो कहते हैं कि 'UCC को कुछ बुनियादी सवालों का जवाब देना होगा. जैसे कि शादी और तलाक़ का क्या मानदंड होगा? गोद लेने की प्रक्रिया और परिणाम क्या होंगे? तलाक़ के मामले में ग़ुज़ारा भत्ते या संपत्ति के बंटवारे का क्या अधिकार होगा? और अंत में संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम क्या होंगे?'
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अली कहते हैं कि इसके कारण राजनीति होगी जो आसानी से झटका दे सकती है.
वो कहते हैं, "बीजेपी सरकार धर्मांतरण क़ानून और समान नागरिक क़ानून का सामंजस्य कैसे करेगी जो कि स्वतंत्र रूप से विभिन्न धर्मां और समुदायों के बीच विवाह की अनुमति देता है जबकि धर्मांतरण क़ानून अंतर-धार्मिक विवाहों पर अंकुश लगाने का समर्थन करता है."
इसके अलावा वो कहते हैं कि छोटे राज्यों में लोगों की प्रथाओं को महत्वपूर्ण रूप से अव्यवस्थित किए बिना क़ानूनों को लाने की योजना कैसे बनाई जाएगी?
इसमें यह भी आश्चर्य की बात नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट भी UCC को लेकर अस्पष्ट नज़र आता है. बीते चार दशकों में अलग-अलग फ़ैसलों में इसने 'राष्ट्र की अखंडता' के लिए सरकार को एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए प्रेरित किया है.
साल 2018 में सरकार को क़ानूनी बदलाव की सलाह देने वाले सलाहकार निकाय लॉ कमीशन ने कहा था कि एक समान नागरिक संहिता 'न आवश्यक है और न ही वांछित है.'
UCC लाए बिना भी लैंगिक भेदभाव हो सकता है ख़त्म
कुमार कहते हैं कि 'यह साफ़ है कि UCC एक जादुई गोली नहीं है, क़ानून की एकरूपता में कोई बड़ा मूल्य नहीं जुड़ता है बल्कि वो अपने आप में एक बड़ा मूल्य होता है. एक अच्छा क़ानून वो होता है जो साफ़ और संवैधानिक हो.'
विशेषज्ञों का कहना है कि पर्सनल लॉ में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के लिए एक सामान्य कानून की मांग करने के बजाय उसमें तब्दीली करने की राह में कोई रोड़ा नहीं आता है. इसका अनिवार्य रूप से मतलब ये होगा कि सभी व्यक्तिगत कानूनों से सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया जाए.
अली का मानना है कि अधिकतर बीजेपी शासित राज्यों में UCC को शायद इसलिए नहीं अपनाया जा रहा है क्योंकि उसका वोट बैंक प्रभावित हो सकता है.
वो कहते हैं, "यह उनकी राजनीतिक पूंजी बनाने के लिए अधिक है और नई बीजेपी के ढांचे के भीतर उनके जीवित बचे रहने को सुनिश्चित करना है जहां पर वे अपनी हिंदू साख़ को लगातार चमकाते रहना चाहते हैं."
दूसरी चौंकाने वाली बात ये है कि बीजेपी कई राज्यों में अपने बल पर सत्ता में होने के बावजूद लंबे समय से ये क़ानून नहीं ला पा रही है. आम चुनाव सिर्फ़ दो साल दूर हैं तो क्या पार्टी का मानना है कि वक़्त आने वाला है?
कुमार कहते हैं, "UCC को लेकर अभी काफ़ी शोर हो रहा है और इस पर राजनीतिक बहस नहीं शुरू हुई है. प्रस्तावित क़ानून का मसौदा पहले हमें दिखाया जाए."
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