क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकलता जा रहा है बंगाल, शुभेंदु अधिकारी दे रहे हैं बहुत बड़ा संकेत

नई दिल्ली- 34 साल के लेफ्ट फ्रंट के राज का खात्मा कर के 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई तो उसकी एक बहुत बड़ी वजह नंदीग्राम आंदोलन था। अब से ठीक 13 साल पहले 25 नवंबर, 2007 को नंदीग्राम में टीएमसी के लोगों पर सीपीएम कार्यक्रताओं के हमले के विरोध में ममता ने विरोध-प्रदर्शन किया था। पूर्वी मिदनापुर की उस घटना को प्रदेश व्यापी आंदोलन बनाने और आगे चलकर बंगाल से वामपंथी शासन की विदाई में शुभेंदु अधिकारी और उनके परिवार का बहुत ही बड़ा रोल था। लेकिन, आज वही शुभेंदु अधिकारी तृणमूल की दहलीज पर वहां से निकलने के अंदाज में खड़े हैं। वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व से नाराज तो कई महीनों से चल रहे हैं, लेकिन शुक्रवार को परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन मंत्री के पद से इस्तीफा देकर पार्टी से भी बोरिया-बिस्तर समेट लेने का संकेत दे रहे हैं।

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    West Bengal : Mamta Banerjee को झटका,Suvendu Adhikari ने मंत्री पद से दिया इस्तीफा | वनइंडिया हिंदी
    तृणमूल से शुभेंदु की विदाई की घड़ी नजदीक?

    तृणमूल से शुभेंदु की विदाई की घड़ी नजदीक?

    ममता कैबिनेट छोड़ने से एक दिन पहले ही शुभेंदु पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावी माने जाने वाले हुगली रिवर ब्रिज कमीशन (एचआरबीसी) के चेयरमैन का पद भी छोड़ दिया था। वैसे कभी ममता के दाहिने हाथ माने जाने वाले प्रभावशाली तृणमूल नेता पिछले करीब तीन महीने से उनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं। वह सार्वजनिक सभाएं करते हैं, लेकिन पार्टी सुप्रीमो की तस्वीर या पार्टी का बैनर तक नहीं लगाते। उनकी सभाओं में उनके जो समर्थक पहुंचते हैं, उनके पास जो पोस्टर होता है, उसपर लिखा होता है- 'अमरा दादार अनुगामी'। मतलब, हम दादा (बंगाली में बड़े भाई के लिए इस्तेमाल होता है) के अनुयायी हैं। दो दिन पहले नंदीग्राम की घटना की याद में ही मनाए गए वार्षिक कार्यक्रम में शुभेंदु के साथ टीएमसी के दूसरे विधायक जैसे कि रंजीत मंडल और बनाश्री मैती भी शामिल हुए। लेकिन, ना तो ममता की तस्वीर और ना ही तृणमूल का कोई बैनर था। गौर करने वाली बात है कि इस कार्यक्रम के बाद ही लगातार दो दिनों में अधिकारी ने बंगाल के दो पावरफुल पदों से इस्तीफा दिया है।

    ममता की 'ममता' से पार्टी में मची है खलबली?

    ममता की 'ममता' से पार्टी में मची है खलबली?

    जानकारी के मुताबिक शुभेंदु अधिकारी तब से टीएमसी में नाखुश चल रहे हैं, जब से ममता ने पार्टी में अपने भतीजे और लोकसभा सांसद अभिषेक मुखर्जी को सबसे ज्यादा अधिकार दे दिए हैं और ऊपर से पार्टी के कद्दावर नेताओं पर पेशेवर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को थोप दिया है। कहते हैं कि पार्टी में इस तरह से हो रहे सत्ता परिवर्तन को कई विधायक नहीं पचा पा रहे हैं, लेकिन शुभेंदु अधिकारी की बात और है। अगर वह पार्टी छोड़ते हैं तो यह 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। इसकी वजह क्या है, यह जान लेना भी जरूरी है। राजनीति में शुभेंदु अकेले नहीं हैं, अधिकारियों का पूरा कुनबा अभी ममता के साथ है, जो जमीन से जुड़ी राजनीति के लिए जाना जाता है। मसलन, शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम आंदोलन के बाद 2009 में तमलुक लोकसभा सीट जीती और 2014 वह सीट अपने पास बरकरार भी रखी। 2016 में विधायक बनने के बाद वह ममता सरकार में मंत्री बने। लेकिन, जंगलमहल के इलाके में उनकी राजनीतिक दबदबे की गूंज इस दायरे से कहीं ज्यादा दूर तक सुनाई पड़ती है।

    शुभेंदु अधिकारी को क्यों नहीं मना पाईं ममता ?

    शुभेंदु अधिकारी को क्यों नहीं मना पाईं ममता ?

    शुभेंदु अधिकारी का परिवार पूर्वी मिदनापुर जिले से ताल्लुक रखता है, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव मुर्शीदाबाद, मालदा, झारग्राम, पुरुलिया और बीरभूम या जंगलमहल के बहुत बड़े इलाके में माना जाता है। यह इलाका कभी वापंथियों का गढ़ होता था, लेकिन अधिकारियों ने यहां तृणमूल को जमीन के रास्ते जंगल और उससे जुड़े लोगों तक पहुंचाया है। यही वजह है ममता ने इन्हें मनाने और समझाने के लिए प्रशांत किशोर को दूत बनाकर उनके पास भेजा भी। लेकिन, कहा जाता है कि बात अभिषेक मुखर्जी और खुद किशोर पर आ गई, जिनके भरोसे दीदी 2021 में भी बंगाल जीतना चाहती हैं, इसलिए बात बन नहीं पाई।

    40 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर प्रभाव

    40 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर प्रभाव

    पूर्वी मिदनापुर के अधिकारी परिवार के बारे में कहा जाता है कि वो जिस पार्टी की ओर जाते हैं, उसके साथ उनकी पैकेज डील होती है। मसलन, शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी कांथी लोकसभा सीट से तृणमूल सांसद हैं और पार्टी के संस्थापक सदस्य भी। उनके भाई दिब्येंदु अधिकारी तमलुक लोकसभा से सांसद हैं तो तीसरे भाई सोमेंदु अधिकारी कांथी नगर निगम के चेयरमैन हैं। यानि शुभेंदु की ओर से अगले ठिकानें की घोषणा करने की देर है और उनके पूरे परिवार का उनके साथ चल पड़ना तय है। लेकिन, अगर ये परिवार तृणमूल को तौबा कहता है तो पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका ये साबित हो सकता है कि कहते हैं कि इनका प्रदेश की 40 विधानसभा क्षेत्रों से भी ज्यादा सीटों पर खासा प्रभाव है।

    भाजपा में जाएंगे शुभेंदु अधिकारी ?

    भाजपा में जाएंगे शुभेंदु अधिकारी ?

    शुभेंदु अधिकारी का नया ठिकाना क्या हो सकता है यह तो तय नहीं, लेकिन बड़े चेहरे की तलाश में लगी भाजपा उन्हें लपकने के इंतजार में कब से बैठी है। पार्टी पहले से कह रही है कि शुभेंदु अधिकारी के लिए उसके दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं। उधर टीएमसी को एक झटका पहले ही लग चुका है, जब कूचबिहार के विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। मिहिर गोस्वामी भी ममता से ही नाराज बताए जा रहे थे और शुक्रवार को उन्होंने बीजेपी का कमल थाम भी लिया है।

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