बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक अकबर हैं या शशांक, इस पर कोलकाता में छिड़ी नई बहस
बांग्ला वर्ष को लेकर बंगाल में बहस छिड़ गई है. बहस के केंद्र में हैं मुग़ल बादशाह अकबर और गौड़ राजा शशांक. जानिए क्या है पूरा मामला.
पोयला बैशाख की शोभायात्रा के मुद्दे पर कोलकाता में भी विवाद छिड़ गया है. आयोजकों की इस टिप्पणी के बाद ही विवाद खड़ा हुआ है कि बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के तौर पर गौड़ के राजा शशांक को पेश किया जाएगा.
वैसे, यह विवाद या बहस तो कई वर्षों से चल रहा है कि बांग्ला वर्ष (साल) राजा शशांक ने शुरू किया था या सम्राट अकबर ने. लेकिन यह बहस मूल रूप से अकादमिक ही थी.
लंबे समय से नववर्ष के मौके पर समारोह आयोजित करने वाले संगठनों ने इस बार शशांक को बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के तौर पर प्रचारित करने और उनकी प्रतिमा के साथ शोभायात्रा निकालने के एलान पर आपत्ति जताई है.
राजा शशांक को सामने रख कर मंगल शोभायात्रा आयोजित करने वाले संगठन बंगीय सनातनी संस्कृति परिषद के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की नज़दीकी है. हालांकि उसका दावा है कि संगठन के तमाम लोग आरएसएस के नज़दीकी नहीं हैं.
संगठन के सचिव प्रबीर भट्टाचार्य बताते हैं, "यह सिद्धांत बांग्लादेश से आया है कि बांग्ला वर्ष की शुरुआत अकबर ने की थी. पहले ऐसा सुनने में नहीं आया था. अगर आप बांग्ला कैलेंडर के महीनों को देखें तो पाएंगे कि बैशाख, जेठ, आषाढ़, श्रावण, सभी महीने हिंदू नक्षत्र और राशि चक्र के मुताब़िक बने हैं. एक मुसलमान शासक महीनों के नाम ऐसा क्यों रखेगा?"
इस बात की व्याख्या करते हुए भट्टाचार्य कहते हैं, "कहा जा रहा है कि अकबर ने राजस्व की अदायगी के लिए बांग्ला वर्ष की शुरुआत की थी. लेकिन पहली बात तो यह है कि वे खुद या उनके कोई मशहूर सेनापति कभी बंगाल नहीं आए थे.
''ऐसे में आख़िर वे बंगाल के लिए नया कैलेंडर क्यों शुरू करेंगे? इसके अलावा उन्होंने तो कई अन्य राज्यों में भी अपने राजपाट का विस्तार किया था. लेकिन उन्होंने उन तमाम राज्यों के लिए तो कैलेंडर नहीं बनाए थे. हिंदुत्ववादी शशांक को आगे लाने का प्रयास कर रहे हैं."
ये भी पढ़ें:- सऊदी अरब को अचानक भारत की राह क्यों अच्छी लगने लगी
राजा शशांक को हिंदुत्ववादी महिमामंडित कर रहे हैं
इतिहासकार कहते रहे हैं कि आरएसएस लंबे समय से मुग़ल साम्राज्य और मुस्लिम शासनकाल को इतिहास से हटाने का प्रयास करता रहा है. हाल में राष्ट्रीय स्तर पर भी स्कूली पाठ्य-पुस्तकों से मुगल शासनकाल से संबंधित अध्याय को हटा दिया गया है. इतिहासकारों का मानना है कि इसके पीछे भी आरएसएस की विचारधारा का ही हाथ है.
हिंदुत्ववादी लंबे समय से शशांक को महिमामंडित करने की कोशिश करते रहे हैं. माना जाता है कि बंगाब्द या बांग्ला वर्ष के प्रवर्तक के तौर पर उनके नाम का प्रचार भी उसी कोशिश का हिस्सा है.
शशांक छठी शताब्दी के आख़िरी दिनों में गुप्त साम्राज्य के तहत एक सामंत राजा थे. लेकिन बाद में उन्होंने गौड़ भूमि के स्वाधीन और संप्रभु शासक के तौर पर ख़ुद को स्थापित किया था. राजा शशांक का निधन वर्ष 637 या 638 में हुआ था.
उन्होंने क़रीब 45 वर्षों तक शासन किया था और उनके शासनकाल की शुरुआत से ही यानी वर्ष 593 में बंगाब्द यानी बांग्ला वर्ष शुरू हुआ था. बंगाब्द के साथ ईस्वी का अंतर भी ठीक 593 साल है.
ये भी पढ़ें:- अतीक़ अहमद: मुक़दमों से घिरे बाहुबली की पत्नी, भाई और बेटों के 'जुर्म' की पूरी दास्तां
शशांक ने बंगाब्द शुरू किया था, इसका सबूत नहीं
बंगाब्द का प्रचलन शशांक ने शुरू किया था या अकबर ने, इस विवाद में सनातनी संस्कृति परिषद की दलीलों का 'भाषा ओ चेतना समिति' ने विरोध किया है.
यह समिति ही सदियों से कोलकाता में नववर्ष के स्वागत में रात भर चलने वाले समारोहों का आयोजन करती रही है.
इस मौके पर महानगर के सांस्कृतिक केंद्र कहे जाने वाले अकादमी परिसर में सुबह शोभायात्रा निकाली जाती रही है.
ढाका की तर्ज पर बीते कुछ वर्षों से दक्षिण कोलकाता में एक मंगल शोभायात्रा का आयोजन किया जाता रहा है.
नववर्ष के मौके पर बहुत पहले से स्वागत समारोह और शोभायात्रा आयोजित करने वाली 'भाषा ओ चेतना समिति' के प्रमुख इमानुल हक़ कहते हैं, "एक बंगाली के तौर पर गौड़ के राजा शशांक पर हमें गर्व ज़रूर है. लेकिन इतिहास में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिलता कि उन्होंने ही बंगाब्द की शुरुआत की थी. इतिहास तो इतिहास ही है, यह तथ्य जबरन थोपा जा रहा है."
वह कहते हैं, "अगर शशांक ने बांग्ला वर्ष की शुरुआत की होती तो उनके जो फलक या शिलालेख मिले हैं, उनमें वे इसका ज़िक्र ज़रूर करते. अगर साहित्य के नज़रिए से देखें तो श्रीकृष्णविजय काव्य के रचयिता मालाधर बसु ने लिखा है कि ग्रंथ लिखने का काम 1395 शक संवत् में शुरू हुआ और 1422 में पूरा हुआ. अगर उस समय बंगाब्द चालू रहता तो उन्होंने शक नहीं लिख कर बंगाब्द ही लिखा होता."
ये भी पढ़ें:-आंबेडकर और सावरकर में क्या जाति के मुद्दे पर वैचारिक दूरी थी?
ढाका की मंगल शोभायात्रा क्या बंगाली परंपरा पर प्रकाश डालती है?
प्रबीर भट्टाचार्य अपनी दलील में हिंदुत्व का प्रसंग नहीं लाना चाहते.
वह कहते हैं, "हम लोग इस दलील या व्याख्या में धर्म को शामिल नहीं करना चाहते. हम अपने अभियान में बंगालियों के गौरव और संस्कृति का ही प्रचार कर रहे हैं. यही वजह है कि हमारी शोभायात्रा में एक ओर सामने जहां शशांक की प्रतिमा रहेगी, वहीं दूसरी ओर हम बंगाली संस्कृति के ऐतिहासिक श्रीखोल, चामर समेत गौड़ीय नृत्य, कीर्तन, भाषा और काव्य की भी झांकी पेश करेंगे."
भट्टाचार्य का कहना है कि उनकी शोभायात्रा का नाम भी मंगल शोभायात्रा है. लेकिन ढाका में आयोजित होने वाली मंगल शोभायात्रा बंगालियों की परंपरा का प्रचार नहीं करती.
प्रबीर भट्टाचार्य कहते हैं, "वह लोग उल्लू और सांप जैसे जीवों के साथ शोभायात्रा निकालते हैं, यह तो बंगालियों की परंपरा नहीं है. बंगालियों की परंपरा दुर्गा पूजा, शंख, तुलसी मंच, केले का पेड़ आदि है. हम अपनी मंगल शोभायात्रा में इन सबका ही प्रचार करेंगे."
इमानुल हक़ मानते हैं कि जो लोग शशांक को हिंदू राजा बनाने का प्रयास कर रहे हैं उनके लिए इतिहास अच्छी तरह पढ़ना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "उनके (शशांक) शासनकाल में हिन्दू शब्द का अस्तित्व ही नहीं था. मुगल काल में इसका आधिकारिक प्रचार हुआ. फिर यह शब्द तो फ़ारसी है."
इमानुल हक़ आगे कहते हैं, "दरअसल ढाका की मंगल शोभायात्रा कहें या हमारा नववर्ष स्वागत समारोह, कहीं मुस्लिम कट्टरवादी ने फ़तवा जारी किया है तो कहीं संघ के घनिष्ठ लोग मुग़ल सम्राट अकबर के मुक़ाबले शशांक को खड़ा करना चाहते हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि बंगाली समुदाय के लोग इसे स्वीकार करेंगे."
ये भी पढ़ें:-
- अमर्त्य सेन और शांति निकेतन के बीच ज़मीन को लेकर छिड़ा विवाद और फंसा पेच
- पश्चिम बंगाल: रामनवमी के मौक़े पर बार-बार क्यों हो रही है सांप्रदायिक हिंसा?
- 'असमिया और बंगाली गमछे को मिलाने' पर क्यों हो रहा है विरोध?
- अणुब्रत मंडल: पश्चिम बंगाल में बिना किसी पद के कैसे बने इतने ताक़तवर
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
-
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Silver Rate Today: चांदी में हाहाकार! 13,606 रुपये की भारी गिरावट, 100 ग्राम से 1 किलो की कीमत जान लीजिए -
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच धराशायी हुआ सोना! 13,000 सस्ता, 18K और 22k गोल्ड की ये है कीमत -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट -
Rupali Chakankar कौन हैं? दुष्कर्म के आरोपी ज्योतिषी के कहने पर काट ली थी उंगली! संभाल रहीं थीं महिला आयोग -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
Ravindra Kaushik Wife: भारत का वो जासूस, जिसने PAK सेना के अफसर की बेटी से लड़ाया इश्क, Viral फोटो का सच क्या? -
Uttar Pradesh Gold Price: यूपी में आज 22K-18K सोने का भाव क्या? Lucknow समेत 9 शहरों में कितना गिरा रेट? -
Iran Vs America: ईरान की 'सीक्रेट मिसाइल' या सत्ता जाने का डर, अचानक ट्रंप ने क्यों किया सरेंडर -
US Iran War: 5 दिन के सीजफायर की बात, 10 मिनट में Trump का पोस्ट गायब! ईरान ने कहा- 'हमारे डर से लिया फैसला’












Click it and Unblock the Notifications