सत्ता की चाहत में भूले शिष्टाचार, जमकर करते हैं निजी हमले

पिछले कुछ समय में मीडिया द्वारा राहुल गांधी को 'पप्पू' तो नरेंद्र मोदी को 'फेंकू' बताया गया। अब वरिष्ठ नेताओं की बात को समझे बिना उसका अपने ढंग से मतलब निकालकर प्रेपोगैंडा फैलाया जाता है। अगर मोदी की ही बात करें तो क्या ये सही है कि जो कि व्यक्ति निम्न आयवर्ग के तबके से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक पहुंचा है, उसे सिर्फ उसके शुरूआती जीवन के आधार पर नकार दिया जाए या उसका मजाक उड़ाया जाए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मोदी ने गुजरात को विकास के पथ पर आगे बढ़ाया और वहां की पानी और बिजली जैसी समस्याओं को दूर कर दिया और अब अपने विकास मॉडल के दम पर इस पद के दावेदार बनें।
राहुल गांधी ने अपनी रैली में कहा था कि आईएसआई मुजफ्फरनगर दंगे के शिकार युवकों से संपर्क कर रही है। उनके शब्द जरूर गलत हो सकते हैं, पर क्या ये सही नहीं है कि आतंकी संगठनों के एजेंट यह समझते हैं कि सामाजिक दुर्भावना के शिकार हुए युवकों को हिंसा के रास्ते पर ले जाना आसान है और उनसे संपर्क करते हैं। (द हिंदू में छपे प्रवीन शामी के लेख के आधार पर) यहां पर राहुल की बातों को समझे बिना उनका मजाक उड़ाया गया।
इसके अलावा मध्य प्रदेश के एक विधायक ने फिल्म अभिनेत्री रेखा द्वारा कांग्रेस के लिए प्रचार किये जाने की बात पर कहा था कि 'रेखा, अमिताभ बच्चन को तो रिझा सकती हैं लेकिन वोटरों को नहीं।' उपरोक्त सभी घटनाएं भारतीय राजनीति और आम जनता में फैली असहिष्णुता को दर्शाती हैं। ऐसे में हमें नेहरू और सरदार पटेल युग पर नजर डालनी चाहिए और सीखना चाहिए कि इस दौर में विरोधियों का भी सम्मान किया जाता था और मुद्दों को समझकर उनकी आलोचना की जानी चाहिए।












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