भारत-नेपाल विवाद: उत्तर प्रदेश से लगी सीमा पर क्या हो रहा है

भारत-नेपाल विवाद: उत्तर प्रदेश से लगी सीमा पर क्या हो रहा है

नेपाल के नए नक्शे को लेकर विवाद अभी थमा भी नहीं था कि उत्तर प्रदेश से जुड़ी नेपाल सीमा पर अब अतिक्रमण और सीमा रेखा तय करने वाले कुछ पत्थरों के ग़ायब होने की ख़बरें सामने आने लगी हैं.

हालाँकि अधिकारी इसे सामान्य गतिविधि बता रहे हैं लेकिन दोनों देशों के बीच चल रही तनातनी के दौर में इसे सामान्य नहीं माना जा रहा है.

भारत में सशस्त्र सीमा बल यानी एसएसबी के अधिकारियों ने यूपी में लखीमपुर ज़िला प्रशासन को इस बात की जानकारी दी है कि उत्तर प्रदेश से लगी नेपाल के साथ सीमा रेखा को दर्शाने वाले कुछ खंभे ग़ायब हो गए हैं.

एसएसबी की ओर से यह भी जानकारी दी गई है कि नेपाल ने सीमा पर कुछ नई चौकियाँ यानी आउटपोस्ट भी बना ली हैं. इस ख़बर के बाद न सिर्फ़ भारत की ओर सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी गई है बल्कि सीमावर्ती ज़िलों के प्रशासनिक अधिकारी लगातार उसकी मॉनीटरिंग भी कर रहे हैं.

सीमा सुरक्षा बल यानी एसएसबी की 39वीं बटालियन उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले में भारत-नेपाल सीमा पर क़रीब 63 किलोमीटर के इलाक़े को कवर करती है. एसएसबी के कमांडेंट मुन्ना सिंह ने बीबीसी को बताया कि उन लोगों ने पहले फ़रवरी महीने में और फिर अभी जून में स्थानीय प्रशासन को इस बारे में पत्र लिखा था.

सीमावर्ती इलाक़ों में अतिक्रमण

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कमांडेंट मुन्ना सिंह बताते हैं, "20-25 साल से ये अतिक्रमण हैं. नो मैन्स लैंड में लोग किन्हीं वजहों से बस गए हैं. नेपाल से लगने वाले कैलाली ज़िले की ओर सीमा निर्धारण करने वाले कुछ पिलर्स ग़ायब हो गए थे. हमने फ़रवरी में भी सूचना दी थी. जून में एक बार फिर बताया ज़िला प्रशासन को कि इस अतिक्रमण को हटाए बिना सीमा पर चिह्न लगाना यानी पिलर लगाना मुश्किल है."

हालाँकि, कमांडेंट मुन्ना सिंह कहते हैं कि यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे दोनों देशों के संबंधों पर कोई असर पड़े. उनके मुताबिक़ आमतौर पर ऐसा होता रहता है और दोनों देशों के अधिकारियों से इस बारे में बातचीत भी होती रहती है.

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले की सीमा नेपाल के कंचनपुर और कैलाली ज़िलों से लगती है. इसकी देख-रेख के लिए नेपाल की ओर सीमा पर नेपाल सशस्त्र पुलिस बल की चार बीओपी (बॉर्डर आउटपोस्ट) यानी चौकियाँ पहले से ही तैनात थीं.

अब पाँच नई चौकियाँ बन जाने के साथ इनकी संख्या नौ हो गई है. लखीमपुर के ज़िलाधिकारी शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि ये चौकियाँ अस्थाई हैं और इन्हें बनाने के पीछे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेपाल ने संघर्ष के मद्देनज़र ऐसा किया है.

बीबीसी से बातचीत में लखीमपुर के ज़िलाधिकारी शैलेंद्र सिंह कहते हैं, "नेपाल ने सीमा पर चौकियाँ बढ़ाई हैं लेकिन ये अस्थाई हैं और कोविड संक्रमण को देखते हुए लोगों के आने-जाने पर निगरानी रखने के लिए बढ़ाई हैं. बाद में ये हटा ली जाएँगी. उन्होंने अपने इलाक़े में चौकियाँ बनाई हैं, यह उनका अपना मामला है. यूपी के छह ज़िलों के साथ नेपाल 120 किमी की सीमा रेखा साझा करता है. हमारे यहाँ सीमा पर उनसे बहुत ज़्यादा चौकियां हैं और वो भी इसलिए कि ग़लत तरीक़े से देश की सीमा के भीतर किसी के भी प्रवेश को रोका जा सके. किसी संघर्ष की मंशा से न तो हमारी चौकियाँ हैं और न ही उन्होंने बनाई हैं."

दोनों देशों की सीमा के दोनों ओर दस-दस गज की दूरी 'नो मैन्स लैंड' के तौर पर निर्धारित की गई है. समय-समय पर दोनों देशों के अधिकारी इसकी समीक्षा भी करते हैं और इस पर निगरानी भी रखते हैं. बावजूद इसके, दोनों ही ओर से सीमा के आस-पास के इलाक़ों के अलावा 'नो मैन्स लैंड' पर भी अतिक्रमण की ख़बरें आती रहती हैं.

'कोई समस्या नहीं'

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लखीमपुर के ज़िलाधिकारी शैलेंद्र सिंह बताते हैं, "एसएसबी ने पिलर्स गिरने और अतिक्रमण के बारे में बताया था. उसके बाद से ही सीमांकन का काम चल रहा है और दोनों देशों के अधिकारी संयुक्त रूप से सर्वेक्षण का काम कर रहे हैं. उसके बाद यह रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी जाती है. चूँकि इस इलाक़े में घने जंगल हैं और बीच-बीच बरसात भी होती रही तो इतनी जल्दी यह काम नहीं हो पाया है. अभी भी कम से कम दो-तीन महीने लग जाएँगे एक बार फिर से सीमांकन करने में. यह कोई ऐसा मसला नहीं है जिस पर किसी तरह की चिंता की जाए. नेपाल के अधिकारी बहुत ही सहयोगात्मक रुख़ अपनाते हैं."

अतिक्रमण के सवाल पर शैलेंद्र सिंह कहते हैं, "यह परंपरागत रूप से होता आया है, कोई नई बात नहीं है. सीमांकन होने के बाद अतिक्रमण फिर होने लगता है. 'नो मैन्स लैंड' में कहीं उनके नागरिकों ने अतिक्रमण कर लिया है तो कहीं हमारे नागरिकों ने. यहाँ कोई गतिविधि नहीं हो सकती है लेकिन लोगों ने कब्ज़े कर रखे हैं. अब पिलर्स खड़ा करने और सीमांकन करने में भी इसलिए समय लग रहा है क्योंकि पहले यह अतिक्रमण हटाया जाए. चूँकि कुछ लोगों ने ग़लती से भी अतिक्रमण किया है तो उन्हें हटाने के लिए मानवीय तरीक़े से ही बातचीत की जाती है किसी तरह की ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करते हैं. और, लोग हट भी जाते हैं, वो चाहे हमारी सीमा की ओर के हों या फिर नेपाल सीमा की ओर के."

एसएसबी कमांडेंट मुन्ना सिंह बताते हैं कि अतिक्रमण के ज़्यादा मामले नेपाल के कंचनपुर ज़िले में हैं जबकि सीमांकन करने वाले खंभों के ग़ायब होने के मामले कैलाली ज़िले में सामने आए हैं.

कैलाली ज़िले के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी और सीडीओ यज्ञराज बोहरा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "इस बारे में वैसे तो कोई भी जानकारी हमारा विदेश मंत्रालय ही दे सकता है लेकिन स्थानीय स्तर पर जो भी दिक़्क़तें होती हैं, वो हम लोग आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं. कई बार बिना औपचारिक बातचीत के भी ये बातें सुलझ जाती हैं. अभी सोमवार को भी हम लोगों ने बातचीत की है. किसी तरह का कोई विवाद नहीं है."

दरअसल, नेपाल के नए नक्शे को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव जारी है. नेपाल ने अपने नए नक्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिपिंयाधुरा जैसे क्षेत्रों को दिखाया है जिसे लेकर भारत को सख़्त आपत्ति है.

नेपाल ने अपना नया नक्शा संसद की मंज़ूरी के साथ जारी भी कर दिया है, जिसमें ये तीनों क्षेत्र उसके अंतर्गत दिखाए गए हैं. अधिकारियों का कहना है कि इसी के चलते यूपी सीमा पर हुई इन गतिविधियों को भी सीमा विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है, जो ठीक नहीं है.

बढ़ गई है सतर्कता

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हालाँकि, सीमा को लेकर नेपाल के साथ हुए ताज़ा तनाव के बाद से ही यूपी पुलिस ने भी नेपाल की सीमा पर निगरानी और सतर्कता बढ़ा दी है. उत्तर प्रदेश के छह ज़िले गोरखपुर, महराजगंज, बहराइच, बलरामपुर, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत नेपाल सीमा से सटे हैं.

लखीमपुर खीरी ज़िले में हुई ताज़ा गतिविधियों के बाद पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने पीलीभीत सीमा पर भी सोमवार को स्थिति का जायज़ा लिया.

सोमवार दोपहर बाद मंडलायुक्त रणवीर प्रसाद और डीआईजी राजेश पांडेय पीलीभीत पहुँचे और स्थानीय अधिकारियों के साथ निरीक्षण किया.

अधिकारियों ने ग्रामीणों से संपर्क किया और उनसे बातचीत की. मंडलायुक्त और डीआईजी ने एसएसबी के अधिकारियों से भी बातचीत की और जानकारी ली.

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