रूस के साथ S-400 डील कर भारत ने एक तीर से साधे कई निशाने
नई दिल्ली, 7 दिसंबर: भारत किसी भी सूरत में देशहित से किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा, व्लादिमीर पुतिन के बहुत ही छोटे लेकिन बेहद कामयाब दौरे के जरिए दुनिया को यह संदेश दे दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच हुई बातचीत ने दोनों देशों की अपनत्व वाली मित्रता में थोड़ी और मिठास तो भरी ही है, इसके जरिए भारत ने कूटनीतिक स्तर पर कई निशाने साधे हैं। सबसे बड़ा प्रमाण रूस के साथ एस-400 डील है, जिससे अमेरिका के जो बाइडेन प्रशासन को तो जमीनी हकीकत समझ में आ ही चुकी है, पिछले डेढ़ साल से पूर्वी लद्दाख में चालबाजियों में उलझे चीन की शी जिनपिंग सरकार के भी कान खड़े करने के लिए काफी है।

एस-400 डील से अमेरिका को जवाब
21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की जुगलबंदी बाइडेन प्रशासन को जरूर चुभ रही होगी। रूस ने जिस तरह से भारत के एस-400 एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम डील पर कायम रहने के लिए कसीदे पढ़े हैं, उससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की दोस्ती पर पुतिन सरकार का भरोसा कितना बढ़ गया है। भारत, रूस से यह सौदा ना करे, इसके लिए अमेरिका ने दबाव बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, सरकार ने साफ कर दिया है कि दोनों देश स्वतंत्र विदेश नीतियों का पालन करते हैं, इसलिए 'यूएस सीएएटीएस प्रतिबंधों' के खतरे को लेकर सम्मेलन में कोई चर्चा नहीं हुई। दरअसल,अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाने के वक्त अमेरिका ने जिस तरह से भारत के हितों की अनदेखी की थी, उसे सबक मिलना जरूरी हो गया था कि 2021 का भारत किसी का मोहताज नहीं है। भारत यह समझ चुका है कि हम किसी एक महाशक्ति के पिछलग्गू बनकर नहीं रह सकते। सामरिक साझेदारी होती है तो दोनों तरफ से होती है। भारत अब बैलेंस बनाकर चलना सीख चुका है।

एस-400 डील से चीन की मोर्चाबंदी
रूस भी अपनी कूटनीतिक रणनीति तैयार करते हुए अपना हित देखता है। यही वजह है कि पिछले कुछ समय में ऐसा लग रहा था कि पुतिन सरकार भी चीन की चालबाजियों के झांसे में आ रही है। लेकिन, भारत ने रूस से एस-400 एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदकर चीन को भी बता दिया है कि ज्यादा उछलना सही नहीं है। तुम आज रूस से सटने की कोशिश कर रहे हो, जबिक रूस और भारत की दोस्ती की तारीखें लिखी जा चुकी हैं। कई बार इसमें दरार जरूर दिखाई पड़ती है, लेकिन फिर जब दोनों देशों के नेता आपस में मिलते हैं तो सारी गलतफहमियां दूर होते देर नहीं लगती। दरअसल, भारत भी यह बखूबी जानता है कि रूस तात्कालिक रूप से भले ही अमेरिका को साधने के लिए चीन के पास जाने की कोशिश करे, लेकिन शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षाएं उससे छिपी नहीं हैं। ऐसे में भारत ने रूस से दोस्ती में नई गर्माहट लाकर ड्रैगन के मंसूबे पर भी पानी फेर दिया है। रूस को भी पता है कि चीन कब उसके व्लादिवोस्तोक इलाके पर दावा ठोकेगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

एस-400 डील से रूस को संदेश
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लैवरोव ने एस-400 डील को लेकर कहा है, 'डील को लागू किया जा रहा है। हमने देखा है कि इस सहयोग को दबाने के लिए अमेरिका की ओर से कोशिशें की गई हैं और भारत को अमेरिका के आदेश मानने का दबाव बनाया गया है। हमारे भारतीय मित्रों ने स्पष्टता और दृढ़ता से बताया है कि यह एक संप्रभु देश है।' भारत को अपनी सामरिक जरूरतों के लिए यह डील जरूरी है तो रूस को भी अपने हितों की रक्षा के लिए यह करार आवश्यक है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। रूस को पता है कि भारत को दूसरे विकल्प भी मिल सकते हैं, ऐसे में वह अपने भरोसेमंद साथी को निराश करके फायदे में नहीं रह सकता। पीएम मोदी के साथ बैठक के दौरान खुद पुतिन की बातों में यह संदेश साफ महसूस किया जा सकता है, 'हम भारत को एक महान शक्ति, एक मित्र राष्ट्र और समय की कसौटी परखा हुआ दोस्त समझते हैं। हमारे संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं और मैं भविष्य की ओर देख रहा हूं।'
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भारत-रूस की मित्रता से विश्व को संदेश
पुतिन के दौरे पर भारत-रूस के बीच कुल 28 समझौते हुए हैं, जिनमें से 9 दोनों सरकारों के बीच और बाकी बिजनेस डील हुए हैं। दोनों नेताओं के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर भी खास फोकस रहा और लश्कर ए तैयबा जैसे पाकिस्तान के पालतू आतंकी संगठनों के अलावा अफगानिस्तान की वजह से आईएसआईएस, अल-कायदा जैसे दहशतगर्दी संगठनों के खतरे को लेकर भी बात हुई है। यानी पाकिस्तान समेत तमाम कट्टरपंथी मुस्लिम ताकतों को भी संदेश दिया गया है कि अमेरिका तो सिर्फ दो दशकों से अफगानिस्तान में था, रूस उससे काफी पहले से उसके चप्पे-चप्पे से वाकिफ है। इसलिए रूस वहां की परिस्थिति पर आंखें मूंदे नहीं रह सकता, जो कि आतंकवाद और मादक पदार्थों को लेकर भारत से सहयोग का भरोसा दे रहा है।












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