Ladakh Disengagement: क्या है LAC पर सैनिकों का डिसएंगेजमेंट प्लान ? जानिए अभी तक सब कुछ
India-China Disengagement Plan In Ladakh: नई दिल्ली। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पिछले 9 महीनों से चल रहे भारत और चीन के बीच तनाव के बाद बड़ा घटनाक्रम हुआ जब चीन के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि भारत और चीन दोनों पैंगांग त्सो झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारे से सैनिकों को हटाने पर सहमत हो गए हैं। 24 जनवरी को कॉर्प्स कमांडर स्तर की 9वें दौर की बातचीत में दोनों पक्ष सैनिकों की संख्या कम करने पर सहमत हुए हैं।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने दी जानकारी
भारतीय सेना ने डिसएंगेजमेंट को लेकर इसे लेकर बुधवार को कोई बयान नहीं दिया है लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यसभा में पूर्वी लद्दाख की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी दी।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के गुरुवार को राज्यसभा में दिए बयान और एक दिन पहले चीनी रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार दोनों देशों की सेनाओं के सैनिक पूर्वी लद्दाख के पैंगांग त्सो क्षेत्र से हटना शुरू कर चुके हैं।
गुरुवार को डिसएंगेज की पहली तस्वीर सामने आई है जिसमें दोनों पक्ष दक्षिणी किनारे से टैंक वापस लेकर आते दिख रहे है। हालांकि रक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि संघर्ष वाले स्थानों और सामरिक महत्व के वालों स्थानों पर जहां सैनिकों की तैनाती है वह बनी रहेगी। सैनिकों के डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। इसके लिए मंगलवार से ही मौके पर तैनात कमांडर प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए आपस में बातचीत जारी रखे हुए हैं।
राज्यसभा में राजनाथ सिंह ने बताया कि दोनों पक्ष चरणबद्ध, समन्वय और सत्यापित तरीके से मिलकर अग्रिम पंक्ति से सैनिकों की तैनाती को पीछे ले आयेंगे।

ऐसे होगी सैनिकों की वापसी
राजनाथ सिंह ने कहा कि चीन अपने सैनिकों को उत्तरी किनारे से फिंगर 8 के पूर्व की तरफ ले जाएगा। इसी तरह भारत भी अपने सैनिकों फिंगर 3 के पास स्थित धन सिंह थापा पोस्ट पर स्थित स्थायी बेस पर ले आएगा। दोनों पक्ष दक्षिणी किनारे से भी सैनिकों के डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया के लिए इसी तरह से जारी रखेंगे।
दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हुआ है कि फिंगर 3 और फिंगर 8 के बीच का क्षेत्र अस्थायी रूप से नो पेट्रोलिंग जोन रहेगा। जब तक दोनों पक्ष सैन्य या फिर डिप्लोमैटिक चैनल से बातचीत के जरिए किसी फैसले पर नहीं पहुंचता है तब तक इस इलाके में कोई भी गश्त नहीं होगी।
इसके साथ ही पैंगांग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर अप्रैल 2020 के बाद से दोनों पक्षों ने जो भी निर्माण किया है वह सारा हटा दिया जाएगा। समझौते के बारे में बताते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि "ऐसी उम्मीद है कि यह पिछले साल शुरू हुए तनाव से पहले की स्थिति बहाल करेगा।"

चीन ने डिसएंगेजमेंट पर क्या कहा था ?
चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल वू कियान ने बुधवार को जारी लिखित बयान में बताया कि अग्रिम पंक्ति पर तैनात चीनी और भारतीय सैनिक 10 फरवरी से पैंगांग त्सो झील के दक्षिणी और उत्तरी किनारे से सैनिकों को कम करना और डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया जारी कर रहे हैं।
चीनी पक्ष ने बताया कि "यह कदम दोनों पक्षों के बीच 9वें दौर की कमांडर स्तर की बातचीत के बाद बनी आम सहमति के आधार पर उठाया गया है।"
पैंगांग त्सो का उत्तरी और दक्षिणी किनारा सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र हैं। ये वही इलाका है जहां पर 2020 के मई में तनाव उभरकर सामने आया था। इस इलाके में दोनों देशों के सैनिकों के बीच कई झड़प भी हो चुकी हैं जिसके चलते यह इलाका संवेदनशील और महत्वपूर्ण बना देता है। इस क्षेत्र से ही गतिरोध की शुरुआत हुई थी जब चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे जिसका भारतीय सैनिकों ने विरोध किया था और दोनों पक्षों में झड़प हुई थी।
चीन की सैन्य टुकड़ियां फिंगर 3 और फिंगर 4 को जोड़ने वाली राइगलाइन पर तैनात किया था जबकि भारत का कहना है कि एलएसी फिंगर 8 से होकर गुजरती है।

भारत ने अगस्त में ली थी महत्वपूर्ण बढ़त
भारतीय सैनिकों ने अगस्त के आखिर में चीन को पीछे करके पैंगांग त्सो के दक्षिणी किनारे पर स्थित सामरिक महत्व वाली चोटियों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने ऊंचाई पर स्थित मगर हिल, मुखपरी, गुरुंग हिल, रेजांग ला और रेचिन ला पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली जिस पर पहले चीन ने अपनी बढ़त बना ली थी। उसके बाद से ही इस क्षेत्र में चीनी पक्ष की स्थिति संवेदनशील हो गई है। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने उत्तरी किनारे पर स्थित ऊंचाई वाली चोटियों से चीन की पीछे कर दिया और यहां भी अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। इस दौरान एक से अधिक बार चेतावनी वाली गोलीबारी भी की गई थी और दोनों ही पक्ष के सैनिक एक दूसरे से कुछ सौ मीटर की दूरी पर आ गए थे।
सितम्बर से ही चीन ने इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया था कि भारत को पहले पैंगांग त्सो के दक्षिणी किनारे से और चुशुल सब-सेक्टर से अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहिए। भारत का कहना रहा है कि कोई भी डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया समूचे क्षेत्र में लागू होनी चाहिए और सैनिकों को अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में वापस लौटना चाहिए।
अभी जो सहमति बनी है उसके मुताबिक ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष केवल पैंगांग त्सो क्षेत्र में ही डिसएंगेजमेंट पर राजी हुए हैं।

तीन सिद्धांतों पर चल रहा भारत
राजनाथ सिंह ने राज्यसभा में दिए बयान में कहा कि दोनों देशों के सैनिकों और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत में हमने चीन के सामने स्पष्ट कर दिया था कि भारत इस मुद्दे का हल तीन सिद्धांतों पर आधारित है।
1- एलएसी को दोनों पक्षों के द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए और दोनों को इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
2- कोई भी पक्ष एकतरफा स्थिति को बदलने का प्रयास नहीं करेगा।
3- सभी समझौते का दोनों पक्षों के द्वारा पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए।
संघर्ष वाले क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट के बारे में जानकारी देते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत का मानना है कि 2020 में फ्रंट पर जो सैनिक एक-दूसरे के बहुत करीब हैं, उन्हें वापस बुला लिया जाना चाहिए और दोनों सेनाओं को अपने स्थायी बेस पर वापस आना चाहिए।

क्या तनाव खत्म हो गया ?
इस सवाल का जवाब राजनाथ सिंह के ही बयान में ही दे दिया है जिसमें उन्होंने कहा कि अभी भी एलएसी पर सैनिकों की तैनाती और पेट्रोलिंग को लेकर कुछ मुद्दे अभी भी हल किए जाने हैं। आगे की बातचीत में हमारा ध्यान इस तरफ रहेगा।"
राजनाथ सिंह ने कहा कि "दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि द्विपक्षीय समझौतों और प्रोटोकॉल के तहत जल्द से जल्द डिसएंगेजमेंट किया जाना चाहिए। अभी तक की वार्ता में देश की संप्रभुता की रक्षा करने के हमारे संकल्प से चीन भी अवगत है। हमारी अपेक्षा है कि शेष मुद्दों को हल करने के लिए चीन हमारे साथ गंभीरता से काम करेगा।"
उन्होंने आगे कहा कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि "पैंगोंग झील से पूरी तरह से विघटन के 48 घंटों के भीतर, वरिष्ठ कमांडरों के स्तर की बातचीत होनी चाहिए और शेष मुद्दों को हल किया जाना चाहिए।"












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