प्रशांत किशोर को लेकर किस असमंजस में है कांग्रेस पार्टी?

प्रशांत किशोर
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सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस में कब शामिल होंगे? होंगे भी या नहीं? अगर होंगे तो कांग्रेस को क्या फ़ायदा होगा या फिर प्रशांत किशोर को क्या फ़ायदा होगा? ये कुछ सवाल हैं जो पिछले कुछ दिनों से सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.

बीते सोमवार को जब कांग्रेस के आला नेताओं की बैठक शुरू हुई तो यह उम्मीद की जा रही थी कि अब इस सवाल का जवाब मिल जाएगा कि राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस में शामिल होंगे या नहीं. लेकिन जब बैठक समाप्त हुई तो यह स्पष्ट हो गया कि फ़िलहाल इस जवाब के लिए कुछ और वक़्त इंतज़ार करना होगा.

हालाँकि ना तो यह सवाल नया है और ना ही यह टाल-मटोल. पिछले साल भी कांग्रेस पार्टी और प्रशांत किशोर के बीच बात बनते-बनते बिगड़ गई थी. बात इस क़दर बिगड़ गई थी कि पीके ने कांग्रेस नेतृत्व तक पर सवाल उठा दिए थे.

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लेकिन इस बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं. इस बार एक ओर जहां पीके ख़ुद कांग्रेस ज्वाइन करने को लेकर 'आतुर' दिख रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने आधिकारिक बयान में कहा है कि 2024 में होने वाले चुनाव को लेकर प्रशांत किशोर ने एक प्रेज़ेंटेशन सोनिया गांधी और बाक़ी कांग्रेस नेताओं के सामने दिया है.

सोमवार को जब कांग्रेस की बैठक समाप्त हुई तो रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मीडिया को बताया कि पीके को लेकर बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट अंतरिम अध्यक्ष को सौंप दी है. उन्होंने यह भी बताया कि साल 2024 में पार्टी की रणनीति क्या होगी, इसका फ़ैसला एंपावर्ड एक्शन ग्रुप करेगा.

सुरजेवाला ने अपने बयान में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया कि प्रशांत किशोर पार्टी में शामिल हो रहे हैं या नहीं? ऐसे में क्या वजह है कि कांग्रेस, प्रशांत किशोर से संपर्क में तो है, उन्हें लेकर बात भी कर रही है और यहाँ तक की उनके सुझावों पर चर्चा के लिए कमेटी तक बना रही है, लेकिन पार्टी में शामिल करने को लेकर कोई फ़ैसला नहीं कर पा रही है.

क्यों नहीं हो पा रहा फ़ैसला

कांग्रेस
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कांग्रेस को लंबे समय से कवर कर रहे और पार्टी के इतिहास और सियासी यात्रा पर पर किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी किसी असमंजस में नहीं है. कांग्रेस को यह देखना है कि वो राजनीतिक रूप से कैसे वापसी कर सकती है और पीके को लेकर उनका आकलन है कि वह ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जो पार्टी का प्रदर्शन बेहतर कर सकते हैं. कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष पार्टी को पीके के नाम के लिए तैयार कर रही हैं."

रशीद किदवई का मानना है कि पीके को पार्टी में शामिल करने को लेकर वक़्त इसलिए लग रहा है क्योंकि कांग्रेस पार्टी का आलाकमान नहीं चाहता है कि कुछ भी ऐसा हो जिससे ऐसा लगे कि प्रशांत किशोर को पार्टी के ऊपर थोपा गया है. इसलिए पार्टी के भीतर इसे लेकर बात और तैयारी हो रही है और समय लग रहा है.

रशीद किदवई, प्रशांत किशोर का पक्ष रखते हुए कहते हैं, "प्रशांत किशोर भी सोच-समझकर फ़ैसला लेना चाहते हैं. वह ख़ुद जल्दबाज़ी में कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहते हैं क्योंकि उनके लिए भी यह एक बड़ा बदलाव है. अभी तक उन्होंने रणनीतिकार की ही भूमिका निभाई है, अब अगर वह पार्टी में शामिल होते हैं तो एक राजनीतिज्ञ की भूमिका निभाएँगे."

रशीद किदवई मानते हैं कि दोनों ही पक्षों को कोई जल्दबाज़ी नहीं है. वे फूंक-फूंककर क़दम रख रहे हैं और इसलिए शायद इस फ़ैसले में देरी हो रही है.

हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के पॉलिटिकल एडिटर विनोद शर्मा का भी मानना है कि पीके को लेकर कांग्रेस पार्टी असमंजस में तो नहीं है, लेकिन यह ज़रूर है कि कांग्रेस में इसे लेकर डिफ़रेंसेस ऑफ़ ओपिनियन हैं. हालाँकि वह मानते हैं कि 'हंडिया पक रही है, बस थोड़ा इंतज़ार करना पड़ सकता है."

विनोद शर्मा इस देरी के पीछे एक कारण पीके की शर्तों को भी मानते हैं.

वह कहते हैं, ''प्रशांत किशोर की कुछ शर्तें हैं और इतनी पुरानी और अहम पार्टी के लिए अगर कोई शर्त ऐसी लगे जिसमें उसे एडजस्ट करना पड़ेगा और पीके मनमुताबिक काम करेंगे तो उस पर एकराय बनाना ज़रूरी है और इसी एकराय को बनाने में समय लग रहा है.''

विनोद शर्मा बताते हैं कि पार्टी के कुछ लोग पीके के नाम पर सहमत नहीं हैं और इसलिए भी असमंजस है, लेकिन साथ ही वह यह भी कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी में जो भी फ़ैसला होना होता है वह कांग्रेस अध्यक्ष पर ही होता है, और वही इस बार भी होगा.

किन मुद्दों को लेकर अटक रही है बात

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी में वैसे भी कोई फ़ैसला फटाफट स्टाइल में नहीं होता है. अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस का रवैया इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है.

प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने या ना होने के फ़ैसले में देरी के पीछे एक बड़ी वजह कांग्रेस नेताओं की बंटी हुई राय को माना जा रहा है.

बीजेपी, आप, जेडीयू, टीएमसी सहित तमाम राजनीतिक दलों के साथ प्रशांत किशोर के संबंधों को लेकर कांग्रेस में आम राय नहीं बन पा रही है.

सोमवार को प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने पर कोई फ़ैसला नहीं हो पाने की एक वजह तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ चुनाव को लेकर हुआ क़रार भी माना जा रहा है. हालांकि प्रशांत ख़ुद को आईपीएसी (इंडियन पोलिटिकल ऐक्शन कमेटी) से दूर कर चुके हैं, लेकिन माना जाता है कि कंपनी के फ़ैसलों पर अभी भी उनकी राय अहम है.

आसान शब्दों में कहा जाए तो पीके को लेकर कांग्रेस सहज नहीं नज़र आ रही है.

रशीद किदवई का मानना है कि पीके कांग्रेस के लिए एक पैकेज डील हैं. वह कहते हैं, ''मुझे लगता है कि पीके कांग्रेस के लिए एक पैकेज डील हैं. पैकेज डील से मतलब यह है कि जो ग़ैर-बीजेपी दल हैं जिनसे पीके के रिश्ते हैं और रहे हैं, उन्हें कांग्रेस गठबंधन में शामिल करने में उनका एक अहम रोल हो सकता है और उसी को लेकर कांग्रेस के भीतर कुछ ऐसे लोग हैं जो आश्वस्त नहीं हैं. और कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें लगता है कि पीके रहेंगे तो कांग्रेस में, लेकिन काम दूसरे दलों का करेंगे. इसी को लेकर ग़लतफ़हमी है."

हालांकि एक निजी चैनल से बातचीत में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ''कांग्रेस में उन्हें शामिल करने को लेकर कोई आंतरिक विरोध नहीं है. कुछ बातों को लेकर अभी संशय है लेकिन अंतिम फ़ैसला सोनिया गांधी का ही होगा.''

वहीं राहुल गांधी के देश में नहीं होने को भी इस देरी की एक वजह माना जा रहा है.

पीके अगर आए तो राह कितनी आसान या मुश्किल?

कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियां और जी-23 नेताओं की नाराज़गी और अंतरिम अध्यक्ष को लेकर उनका रुख़ किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में अगर पीके कांग्रेस में शामिल होते भी हैं तो क्या पार्टी के सदस्य उन्हें अपने बीच स्वीकार कर पाएंगे और उनकी रणनीति पर अमल करने को राज़ी होंगे?

इस पर रशीद किदवई कहते हैं कि ''जब भी कोई बाहर से पार्टी में आता है तो उस नए सदस्य और पुराने सदस्यों के बीच संवाद होता है. एक-दूसरे के अनुसार ढलने की कोशिश की जाती है, तो यह सीखने-सिखाने की एक प्रक्रिया है. पीके का अनुभव जैसा रहा है और उनकी सफलता, वही उन्हें कांग्रेस के लिए आकर्षक बनाती है.''

वह कहते हैं, ''कांग्रेस को पीके के अनुभव का अंदाज़ा है जिसमें सफलताएँ अधिक हैं और यही एक चीज़ कांग्रेस को पीके के प्रति आकर्षित कर रही है. ऐसा कहा जा सकता है कि कांग्रेस पीके का 2024 में एक अहम रोल देख रही है और इससे उसे एक सुखद एहसास हो रहा है. सुखद एहसास इसलिए भी हो रहा है कि अगर पीछे के रिकॉर्ड देखें तो हर बार की असफलता के लिए जिस तरह से राहुल गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, उससे गांधी परिवार को राजनीतिक रूप से थोड़ी सहूलियत हो जाएगी."

मतलब ये कि हार होने की स्थिति में पहले की तरह अकेले राहुल गांधी और गांधी परिवार को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा.

सोनिया गांधी
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सोनिया गांधी

रशीद किदवई मानते हैं कि प्रशांत किशोर अगर पार्टी में शामिल हो जाते हैं और शुरुआत में थोड़े-बहुत भी कामयाब होते हैं या फिर पार्टी के प्रदर्शन को बेहतर कर पाते हैं तो उन्हें पॉलिटिकल ओपनिंग ज़रूर मिलेगी.

वह कहते हैं, "नेहरू-गांधी परिवार में राजनीतिक रूप से कोई इस तरह विफल नहीं हुआ है, नेहरू, इंदिरा, राजीव गांधी, सोनिया गांधी… लेकिन राहुल गांधी की असफलताओं से कांग्रेस का आत्मविश्वास डगमगा गया है और ऐसे में अगर पीके पार्टी में आते हैं और स्थिति बेहतर होती है तो पीके के लिए भी दल के भीतर जगह मज़बूत होगी."

विनोद शर्मा कहते हैं कि पार्टी के जो नेता पीके का विरोध कर रहे हैं उनका ज़मीनी अस्तित्व नहीं है. वो अच्छी पॉलिसी बनाने में मददगार हो सकते हैं, लेकिन वे कांग्रेस को चुनाव नहीं जिता पा रहे हैं और यह बात सभी समझ रहे हैं.

वह कहते हैं, ''चुनाव जीतने के लिए पार्टी को ख़ुद को नए तरीक़े से उठाना होगा. देश में जैसा माहौल है उस तरह से तैयार करना होगा और पार्टी को ये समझना होगा."

वह मानते हैं कि ''एक बात जो कांग्रेस के संदर्भ में सबसे अधिक स्पष्ट है वो यह कि कांग्रेस को सीमित दायरों से आगे बढ़कर सोचना होगा. उसे उस तरह की ही रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा जो बाक़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपना रही हैं, अब वह चाहे पीके के साथ हो या उनके बिना.

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